जेएनयू: छात्र आंदोलनों की परंपरा को शर्मसार करते वामपंथी
   दिनांक 16-नवंबर-2019
डॉ. प्रवेश कुमार

देश और दुनिया में अपने अकादमिक एवं विचार अभिव्यक्ति , छात्रों को स्वतंत्र विचारों के आदान-प्रदान के लिए विख्यात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पिछले 20 दिनों से चर्चा में हैं। छात्रावासों के शुल्क के खिलाफ छात्रों विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। पिछले 20 दिनों में छात्रों के द्वारा विश्वविद्यालय में एक आतंक , अशांति के वातावरण का निर्माण किया गया हैं , इस सब में आंदोलन को और ज़्यादा उदवलित करने का कार्य वाम समर्थित छात्र संगठनों के द्वारा किया जा रहा हैं अभी बीते 14 नवम्बर को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रशासन परिसर के समीप लगी स्वामी विवेकानंद जी की प्रतिमा को कुछ वाम समर्थित छात्रों के द्वारा क्षतिग्रस्त करने का प्रयास हुआ प्रतिमा के इर्द-गिर्द भगवा हो बर्बाद , भाजपा हो बर्बाद जैसे नारों को लिखा गया वहीं प्रशासन बिल्डिंग में घुस कर कुलपति,प्रति-कुलपति के ऑफ़िस की दीवारों पर विभिन्न भाषाओं में अपशब्द लिखे गए ।
छात्रों का अपनी मांगों के लिए लड़ना वाजिब हो सकता हैं लेकिन स्वामी विवेकानन्द की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर जिस तरह के अपशब्द वहां लिखे गए वह घोर अपमानजक है। विवेकानन्द जी ने सदैव ही देश के युवाओं को प्रभावित किया हैं वे युवाओं के लिए सदैव से प्रेरणा के पुंज रहे हैं। छात्रों की लड़ाई तो फ़ीस वृद्धि के विरुद्ध थी तो अचानक कुलपति के इस्तीफ़े और फिर स्वामी विवेकानन्द की प्रतिमा से क्या विरोध हो गया। विवेकानन्द की प्रतिमा मात्र एक ईंट-पत्थर की बनी मूर्ति नहीं हैं बल्कि ये प्रतीक भारत के प्राचीन गौरवशाली इतिहास ,भारत की सभ्यता- संस्कृति का परिचय करने वाला एक बिम्ब हैं । स्वामी जी को देखने मात्र से हमें अपने उस संस्कृति का ध्यान आ जाता जिसके कारण दुनिया ने स्वामी जी को चर्चा का पात्र बना दिया, उनके द्वारा बोले मात्र कुछ शब्दों ने ही भारत के सम्पूर्ण दर्शन को दुनिया से परिचय कराया। उन्होंने वसुधैव कुटुम्बकम के विचार का दुनिया से परिचय कराया। उन्होंने दुनिया को बताया कि सम्पूर्ण दुनिया ही परिवार हैं इसलिए सबकी चिंता करना ही भारत का विचार हैं। स्वामी जी की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त करने का प्रयास मात्र किसी प्रतिमा का क्षति पहुंचना मात्र नहीं बल्कि भारत की पुरातन परम्परा को ही नष्ट करने का प्रयास है। ये ही कार्य वामपंथी इतिहासकारों ने वर्षों में भारत के इतिहास लेखन के माध्यम से किया। इन इतिहासकारों ने क्या कभी भारत महान देश था, उसकी महान परंपरा थी, जहां दुनिया के देश उससे प्रेरणा लेते थे, ऐसा कहीं कहा क्या? तो ऐसा नहीं क्योंकि इन वामपंथी इतिहासकारों, चिंतकों के प्रेरणा स्रोत भारत में न होकर ये बाहरी देशों से ही आते थे । इन वामपंथियो का प्रभाव जे. एन. यू. जैसे शिक्षण संस्थानो में हैं जहां विवेकानन्द कभी महान नहीं हो सकते, कौटिल्या मैक्यवाली के बाद ही आते है,बल्कि यथार्थ इससे भिन्न हैं। इनके लिए धर्म रिलिजन हो जाता हैं जिससे हमारे भारत के धर्म का पूरा का पूरा विचार ही बदल जाता हैं। इसलिए इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त छात्र क्या किसी अपने शिक्षक का सम्मान करेंगे ऐसा मुझे तो नहीं लगता । जिस देश की परम्परा में गुरू को भगवान से पहले माना गया उसी देश में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठा प्राप्त संस्थान में पिछले 20 दिनों से सभी छात्रावासों के वार्डन भय की स्थिति में हैं ? किस प्रकार रात 1 बजे उनके घरों पर कुछ छात्रों के समूह द्वारा हमला किया जाता हैं और कहा जाता हैं आप हमारे साथ होस्टल मेस में चलें। जब वार्डन दबाव में मेस में जाता हैं तो उसे ख़ूब बेइज्जत किया जाता है और जबरन उनसे इस्तीफ़े की मांग की जाती है। विश्वविद्यलय के डीन छात्र कल्याण की अचानक तबियत ख़राब हो जाती हैं तो उनकी एम्बुलेंस को ज़बरन रोका जाता है। 32 घंटों तक एक महिला डीन को बंधक बना कर रखा जाता है । फिर जब पुलिस उनको निकालने की कोशिश करती हैं तो महिला डीन के कपड़े फाड़ने तक का प्रयास किया जाता हैं, क्या इसको हम छात्र आंदोलन कह सकते हैं ।
भारत एवं विश्व में छात्र आंदोलनों का अपना बड़ा महत्व रहा है। हम कैसे भूल सकते हैं कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन को देश भर में प्रभावी बनाने में छात्रों की कितनी बड़ी भूमिका रही है । लखनऊ से लेकर बिहार और तमिलनाडु तक में छात्रों ने ही सबसे पहले अंग्रेजों के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ को उठाया। महात्मा गांधी हों या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार या बाबा साहेब आंबेडकर, सभी ने छात्रों को अधिकाधिक प्रभावित किया और भारत की आज़ादी के संघर्ष एवं समता आधारित समाज-निर्माण के लिए उन्हें तैयार किया । वहीं, जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में कांग्रेसी दमन के ख़िलाफ़ बड़ा आंदोलन विद्यार्थी परिषद समेत तमाम छात्रों ने ही किया , जिसका परिणाम 1977 में कांग्रेस को अपनी सत्ता गवानी पड़ी । इस देश में विभिन्न सामाजिक समस्याओं के उन्मूलन के लिए समाज में छात्रों की ही बड़ी भूमिका रही है। कश्मीर समस्या 370 को हटाने को लेकर छात्रों ने आंदोलन किया। भारत का अटूट हिस्सा जम्मू कश्मीर हैं तो अलग संविधान अलग निशान क्यों है? इसमें अग्रणी भूमिका भले से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की रही, पर देश भर के छात्रों ने इसका समर्थन किया। देश निर्माण में छात्र आंदोलनों की बड़ी भूमिका रही हैं , परंतु जाधवपुर विश्वविद्यलय , जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में घटी कुछ घटनाओं ने इस सारे छात्र आंदोलन को, छात्रों के देश निर्माण में भूमिका को , कहीं न कहीं शर्मसार भी किया हैं। किसी भी प्रकार की ग़ैर वाजिब फ़ीस वृद्धि का विरोध लाज़मी है, वो छात्रों को करना भी चाहिए, लेकिन छात्रों को संवाद का रास्ता आंदोलन से पूर्व अपनाना चाहिए, ऐसा ही छात्र-आंदोलन में सदैव से होता रहा हैं। हां, अगर प्रशासन नहीं सुनता, नहीं बात करता तो गांधीवादी तरीक़े से आंदोलन किया जाना चाहिए। रैली, धरने आदि ख़ूब करें ये उनका लोकतांत्रिक अधिकार हैं, इतिहास गवाह है अहिंसक आंदोलनो ने तो इस देश को अंग्रेज़ी शासन से मुक्ति दे दी थी तो अपने देश में छात्र आंदोलन में हिंसा की क्या आवश्यकता है। छात्रों को मर्यादित ढंग से अपने आन्दोलन को साकार रूप देना चाहिए, न कि किसी बर्बता का सहारा लेना चाहिए। प्रशासन को भी छात्रों से बात करके कोई उचित समाधान निकालना चाहिए। ताकि देश के ग़रीब छात्र भी उत्तम शिक्षा हासिल कर सकें और दीन दयाल जी के अन्त्योदय के सपने को कारगर बनाने में सहायक हो सके।

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं )