अब जेएनयू से भी उखड़ रहे हैं वामपंथियों के पांव !
   दिनांक 17-नवंबर-2019
 
जेएनयू के छात्रों ने कवरेज करने गईं महिला पत्रकार के साथ की अभद्रता, फोटो जी न्यूज से साभार.
यह बात प्रोफेसर दिवाकर मिंज ने रांची के कन्वर्जन एनजीओ रैकेट को समझाने के लिए बताई थी। रांची में कन्वर्जन में लगा समूह आदिवासियों के लिए लड़ता हुआ दिखना चाहता है। उस समाज को वह मदद सरकार से दिलाता है और उस पूरे समाज की सहानुभूति भी हासिल करता है कि कि वे नहीं हो ते तो उनकी सहायता भी न हो पाती । सरकारी नौकरी की बात हो या सरकारी योजनाओं की। कन्वर्जन समूह सक्रिय होकर अपने लोगों तक यह सारी मदद पहुंचे, यह सुनिश्चित करता है। अपने उद्देश्य को पूरा करने में जब इस एनजीओ समूह को कठिनाई महसूस होती है तो ये सड़क पर आते हैं और इस तरह पूरे मामले को पेश करते हैं जैसे पूरा आदिवासी समाज ही खतरे में है। जबकि सारा मामला उस छोटे से समूह से जुड़ा होता है, जिनका हित उनके कन्वर्जन के रोजगार से जुड़ा है।
कुछ—कुछ ऐसा ही हाल इस वक्त जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का है। जिसे वामपंथ ने दुनिया भर में अपने गढ़ के तौर पर प्रचारित किया है। जब देश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार हो। उस वक्त इस विश्वविद्यालय में आइसा (आल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) और एसएफआई (स्टूडेन्ट फेडरेशन आफ इंडिया) को 'व्यवस्था' से लड़ते हुए दिखना ही पड़ेगा। उन्हें वजह—बेवजह सरकार से लड़ते हुए दिखना है, उन्हें खुद को पीड़ित की तरह पेश करना है। छात्रों के पक्ष में यदि सरकार अपने फैसले पर पुनर्विचार करे तो उसे अपनी जीत के तौर पर पेश करना है।
यह सच है कि सरकार देश के करदाताओं से पैसा लेती है और समाज कल्याण पर खर्च करती है। उन कल्याणकारी योजनाओं का लाभ हासिल करना देश के प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। लेकिन सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल एक विचारधारा के पोषण के लिए किया जाए। एक ऐसे विचार के पोषण के लिए जिसमें नक्सल का वायरस लगा हुआ है। इसे न्यायोचित तो नहीं कहा जा सकता?
अब लाख संगठन कहे कि हमने फारमेट कर लिया है। अब वायरस फ्री हैं। लेकिन यह सब कहने में नहीं व्यवहार में भी तो दिखना चाहिए। जो आइसा के छात्र नेताओं में दिखता नहीं। सच तो यह भी है कि उन्होंने अपने व्यवहार में बदलाव ला दिया फिर वे अपने नक्सलियों से सहानुभति रखने वाले नेताओं को मुंह क्या दिखाएंगे ?
आइसा चारू मजूमदार के व्यवस्था परिवर्तन के सिद्धान्त पर विश्वास रखती है। सीपीआई (एमएल) की छात्र इकाई है। 25 मई 1967 का दिन नक्सलबाड़ी के खूनी संघर्ष के उलगुलान का दिन था। 25 मई 2017 को जब इस खूनी संघर्ष ने अपने 50 साल पूरे किए, मैं नक्सलबाड़ी में था। नक्सलबाड़ी चौक पर चल रहे कार्यक्रम में एक भी वक्ता ऐसा नहीं था, जिसने कानू सान्याल का नाम लिया हो। ऐसा लगा मानों नक्सलबाड़ी से जिस कानू ने संघर्ष की इबारत लिखने का सपना देखा, पूरा आंदोलन उसे भूल कर, इस पूर संघर्ष को खूनी खेल बनाने वाले चारू मजूमदार को समर्पित कर दिया हो। यह देखना अच्छा नहीं लग रहा था सो वहां से उठकर हातीशिला, कानू सान्याल के घर चला गया। 81 वर्ष की आयु में 2010 में कानू ने पूरे आंदोलन की दुर्गति से निराश होकर आत्महत्या कर ली। जिस पार्टी कार्यालय में कानू ने आत्महत्या की, वहां खूनी संघर्ष के पचास साल होने पर अंधेरा पसरा हुआ था। यह सब देखकर यह समझना मुश्किल नहीं था, कानू के सपनों का नक्सलबाड़ी आंदोलन अलग था। नक्सबाड़ी के नरसंहारियों का महिमामंडन करने वाले वास्तव में चारू मजूमदार के लोग हैं। उसी चारू की राजनीति में आइसा का विश्वास है। आइसा के लोग कानू के लोग नहीं हैं।
कानू सान्याल ने नवम्बर 2004 छत्तीसगढ़ के पत्रकार आलोक प्रकाश पुतूल को एक साक्षात्कार में कहा— “अपने समय में चाहे नक्सलबाड़ी मुहिम कितना भी रोमांचकारी क्यों न हो, वामपक्ष का यह भटकाव सैद्धांतिक और राजनीतिक रुप से हमें खत्म कर देता है। हथियारबंद क्रांति करने का दावा करने वाले और मुझे संशोधनवादी बताने वाले अपने अनुभवों से कुछ सीखना नहीं चाहते। उन्हें ये भ्रम है कि वे इतिहास का निर्माण करते हैं, जबकि सच तो ये है कि जनता को छोड़ कर कोई क्रांति नहीं की जा सकती।”
अपने छत्तीसगढ़ दौरे में आलोक से बातचीत करते हुए ''नक्सलवादियों का दावा है कि जनता उनके साथ है'' के जवाब में कानू कहते हैं— “बंदूक के बल पर कुछ लोगों को डरा-धमका कर अपने साथ होने का दावा करना और बात है और सचाई कुछ और है। कानू यह भी कहते हैं कि अगर जनता नक्सलियों के साथ है तो फिर वो भू सुधार जैसे आंदोलन क्यों नहीं करते? आज ये बंदूक के बल पर जनता के साथ होने का दावा कर रहे हैं, कल कोई दूसरा बंदूकवाला भी यही दावा कर सकता है। अगर हथियारबंद गिरोहों के बल पर क्रांति का दावा किया जा रहा है, तो चंदन तस्कर और दूसरे डाकू सबसे बड़े क्रांतिकारी घोषित किए जाने चाहिए। भय और आतंक पर टिका हुआ संगठन ज़्यादा दिन तक नहीं चल सकता।"
आज कानू की भविष्यवाणी सच साबित हो रही है। वामपंथ का पूरा विचार ही देश भर से खत्म हो रहा है। जाधवपुर, टिस, जेएनयू जैसे मुट्ठी भर संस्थानों में बैठे कुछ छात्र इस सचाई को मानने को तैयार नहीं हैं।
कानू के गहरे अवसाद में जाने की वजह आंदोलन का इस तरह खत्म हो जाना भी था। इसी दुख में कानू कहते हैं— ''बंदूक लेकर जब हम आतंक फैलाते चलते थे तो हमें भी लोग समर्थन देते थे लेकिन आतंकवाद के रास्ते में हट जाना हमारे लिए घातक सिद्ध हुआ। इतिहास ने हमें जो मौका दिया था, हम उसका इस्तेमाल नहीं कर पाए।''
कानू के ही शब्द हैं — '' इस उम्र में आने के बाद यह दुख लगातार सालता है कि हम कुछ नहीं कर पाए।''बहरहाल, आज सीपीआई एमएल की छात्र इकाई आइसा के छात्र नेता कानू का नाम लेने से भी परहेज करते हैं।
आइसा 1990 में स्थापित हुआ। अब यह सवाल हो सकता है कि इतने नए संगठन को एक हिंसक आंदोलन से जोड़ना क्या उचित होगा? यहां महत्वपूर्ण है कि आइसा की राजनीति जिन दीपांकर भट्टाचार्य और कविता कृष्णन ने प्रेरणा पाती है, उनकी सहानुभूति किस तरफ है, यह किसी से छुपा है क्या? नाम बदल लेने से राजनीति कब बदल जाती है?
जब जेएनयू को लेकर चल रही बहसों को देखता हूं। विचार आता है कि यह वामपंथ का विचार प्रभावी होने के बावजूद सिमटता क्यों जा रहा है? वास्तव में वामपंथ का पूरा आंदोलन समाज से कट गया है। इस आंदोलन को दक्षिण अफ्रीका की गरीबी से लेकर इथोपिया के कुपोषण तक की चिन्ता है। ईरान—इराक—सीरिया में चल रही गतिविधियों पर इनकी पैनी नजर है। वे अपनी तमाम चिन्ताओं के साथ महंगी शराब और अच्छी सिगरेट के लिए दुनिया भर के फेलोशिप जुटाने में लगे हैं। इन सबके बीच उन्हें देश की गरीबी का ध्यान अचानक उस वक्त आता है, जब छात्रावास की फीस 30 रुपए से बढ़ाकर 300 रुपए कर दी जाती है। यदि वास्तव में उनकी लड़ाई गरीबी के खिलाफ और अच्छी शिक्षा के लिए है फिर यह सारी सुविधाएं महज दो—चार विश्वविद्यालयों तक सिमट कर क्यों रह जानी चाहिए? क्योंकि इन मुट्ठी भर विश्वविद्यालयों में उन छात्रों का बहुमत है, जिन्हें आइसा—एसएफआई वाले 'अपने लोग' कहते हैं। जब 'स्व' से आगे सोचने के लिए कुछ शेष ना हो तो आज के दौर में हासिल 'वामपंथी' होना ही होता है।
वामपंथी संगठनों के पास अपनी बात कहने के लिए सक्षम कैडर है और उसे ठीक तरीके से देश भर में फैलाने के लिए एक मजबूत तंत्र भी। जिसमें पत्रकार, नाटककार, प्राध्यापक, एनजीओकर्मियों का एक बड़ा नेटवर्क शामिल है। इसके माध्यम से कोई भी बात वे बार—बार कहकर समाज के मन में इस तरह बिठा देते हैं कि हम इस बात का कोई दूसरा पक्ष हो सकता है, इस पर विचार ही नहीं कर पाते। पिछले कुछ दिनों से जेएनयू में पढ़े छात्रों की गरीबी और उस गरीबी से निकल कर सफल हुए लोगों के ऐसे ही किस्से पढ़ने को मिल रहे हैं। यह सब पढ़कर ऐसा लग रहा है कि गरीबी सिर्फ जेएनयू के वामपंथी छात्रों के हिस्से है बाकि सारा देश समृद्ध है।
यहां सूचना सेवा के अधिकारी ऋतेश पाठक का यह लिखा समीचीन है — ''10वीं-12वीं के बच्चों में तुनक ज्यादा होती है। 12वीं की परीक्षा दे चुका बच्चा तुनक गया था। घर छोड़ भाग गया। दिल्ली विश्वविद्यालय के पास पटेल चेस्ट के विपरीत दिशा में बने बाजार में पीसीओ पर नौकरी करने लगा, फिर टाइपिंग। टाइपिंग में उसकी शुद्धता ने शोधार्थियों को प्रभावित किया। उसका एडमिशन दिल्ली विवि में हुआ। बिना घर से खर्च लिए और बिना सरकारी हॉस्टल/स्कॉलरशिप के ग्रेजुएट हुआ, आज अग्रणी मीडिया घराने में अच्छा नाम है। अच्छे सामाजिक सरोकार हैं। लेकिन वह कभी खुद पर बीती गरीबी के ढिंढोरे नहीं पीटता है ।''
वामपंथी छात्र संगठनों के पास करने के लिए अधिक कुछ रह नहीं गया है। 46 सालों के बाद पिछले साल दीक्षांत समारोह जवाहर लाल नेहरू विवि में रखा गया था। पिछले साल भी वामपंथी छात्र संगठनों ने इसका विरोध किया था। सचाई यह है कि विवेकानंद की मूर्ति पर अपशब्द लिखना हो या फिर दीक्षांत समारोह का विरोध करना, यह सिर्फ विश्वविद्यालय परिसर में अपनी उपस्थिति को जाहिर करने का वामपंथी हथकंडा है।
कुछ समय पहले रोमिला थापर से जवाहर लाल नेहरू विवि ने उनका बायोडाटा मांगा था। इस छोटी सी बात पर जेएनयू के अंदर वामपंथी शिक्षक संघ ने अपना विरोध जता दिया। एमेरिटस प्रोफेसर थापर से बायोडाटा मांगे जाने को शिक्षकों ने उनके सम्मान से जोड़ दिया। जबकि इसकी आवश्यकता नहीं थी। यह जगजाहिर है कि थापर वामपंथी रूझान वाली इतिहासकार हैं। वे 1970 में जेएनयू से जुड़ी थीं और 1992 तक प्राचीन भारतीय इतिहास की प्रोफेसर रहीं। पुन: वह 1993 से बतौर एमेरिटस प्रोफेसर सेवाएं दे रहीं हैं। थापर से बायोडाटा मांगे जाने को मुद्दा बनाने वाले इस बात को नहीं समझ पाए कि विश्वविद्यालय प्रशासन सेवा विस्तार के पूर्व उनके काम का मूल्यांकन करना चाहता है। जेएनयू अधिनियम के मुताबिक अगर कोई एमेरिटस प्रोफेसर 75 वर्ष की आयु पूरी कर लेता है, तो उसके काम के मूल्यांकन का अधिकार विश्वविद्यालय प्रशासन के पास है। सीवी मंगाना उसी प्रक्रिया का हिस्सा था।
इस बात को देश के लोगों को समझना चाहिए कि वामपंथी संगठनों, बुद्धिजीवियों का कांग्रेस के साथ नाभिनाल का संबंध है। जब केन्द्र में कांग्रेस की सरकार नहीं है तो जेएनयू के वामपंथी खेमे में थोड़ा असंतोष तो रहेगा। जो समय—समय पर यूं ही दिखाई भी देगा। लेकिन जेएनयू को जेएनयू सिर्फ वामपंथी छात्र नहीं बनाते। वहां कई और रंग और विचार जीवित हैं, जिससे मीडिया आपका परिचय नहीं कराता। इसे इसलिए लिख रहा हूं कि यह बात बार—बार वामपंथ के अफवाह तंत्र ने स्थापित करने की कोशिश की है कि जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय आइसा—एसएफआई का गढ़ है, इसलिए बार—बार एक खास विचारधारा द्वारा वह हमले का शिकार हो रहा है। लेकिन उसका आरोप अब धीरे—धीरे बीते दिनों की बात होती जा रही है। उनका प्रभाव भी विश्वविद्यालय के छात्रों पर कम हुआ है। अब यह शोध का विषय हो सकता है कि इस बात को अपनी जिद में वामपंथी छात्र संगठन समझ नहीं पा रहे या फिर यह बात वे समझ गए हैं, इसलिए खिसिया कर खम्भा नोच रहे हैं।
जेएनयू की छात्रा निधि त्रिपाठी को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने अपना राष्ट्रीय महासचिव चुना है। इसके बाद भी यदि वामपंथी छात्र संगठन यह झूठ फैला रहे हैं कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रति विचारधारा विशेष पूर्वाग्रह से ग्रस्त है तो यह बात हास्यास्पद ही मानी जाएगी।