''अयोध्या को उसकी पहचान दिलाने के लिए कृतसंकल्पित हूं''
   दिनांक 20-नवंबर-2019
गोरक्षपीठ गत तीन पीढ़ी से श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के केंद्र में रही है। राम जन्मभूमि के लिए भावनात्मक जुड़ाव रखने वाले आंदोलनकारी का आनंद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर दिखाई देता है और प्रशासक के तौर पर अयोध्या के विकास की प्रतिबद्धता उनकी बातों में झलकती है। योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर और वरिष्ठ संवाददाता अश्वनी मिश्र के साथ विशेष बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश :-

 
श्रीराम जन्मभूमि मामले पर सर्वोच्च न्यायालय का बहुप्रतीक्षित निर्णय आ गया है। आपकी पहली प्रतिक्रिया ?
श्रीराम जन्मभूमि मामले पर आए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से पूरा देश प्रसन्न है। इस प्रसन्नता की घड़ी में सबसे पहले मैं सभी को बधाई देता हूं और अभिनंदन करता हूं। मेरी ओर से उन सभी का भी अभिनंदन है जो न्याय, समता और सौहार्द में विश्वास करते हैं। यह फैसला न्याय और सत्य की कसौटी का एक ऐसा अनुपम उदाहरण है जिसे देश के न्यायिक इतिहास में सदियों तक स्मरण किया जाएगा। आने वाले समय के लिए यह फैसला अपने आप में एक नजीर बनेगा और सत्य और न्याय की कसौटी पर लोगों को झकझोरेगा। इस फैसले से देश ही नहीं अपितु पूरी दुनिया ने भारत के लोकतंत्र और यहां की न्यायिक व्यवस्था का लोहा माना है कि कैसे पांच सौ वर्षों से चले आ रहे एक विवाद को 45 मिनट में उच्चतम न्यायालय ने हमेशा के लिए शांत कर दिया। सबसे बड़ी बात यह कि इस फैसले से जहां लोकतंत्र और न्यायपालिका की ताकत का अहसास हुआ वहीं भारत के राजनीतिक नेतृत्व की परिपक्वता, विकास, शांति और सौहार्द के प्रति उसका स्पष्ट दृष्टिकोण भी सामने आया। मंय भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ उन सभी न्यायमूर्तियों, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी, गृह मंत्री श्री अमित शाह जी, हमारे विचार परिवार के मुख्य एवं रा.स्व.संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत जी, सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी एवं अन्य सभी वरिष्ठों का भी अभिनंदन करता हूं जिन्होंने इस न्यायिक व्यवस्था के प्रति आमजन के मन में एक विश्वास भरा और सबसे कहा कि न्यायालय के फैसले को मानना है और शांति स्थापित करनी है और अंतत: यह सब संभव हुआ।
आप कब इस आंदोलन से जुड़े?
देखिए, मैं शुरू से गोरक्षपीठ से जुड़ा था तो स्वाभाविक रूप से आंदोलन के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष से रूप से जुड़ा रहा हूं। वर्ष 1985-86 के आस-पास से महंत अवेद्यनाथ जी महाराज के साथ आना-जाना, उनके सान्निध्य में रहना, आंदोलन से जुड़ी बैठकों में उनके साथ पीछे बैठ कर उनकी सेवा में सब कार्यक्रमों को पास से देखना एवं उन कार्यक्रमों में सम्मिलित रहने का क्रम चलता रहा। 1992 में भी हम लोग सारे घटनाक्रम के साक्षी रहे हैं। सारी चीजों को करीब से देखा है। लेकिन इस पूरे समय में मैंने जो देखा वह यह कि पूज्य गुरुदेव कभी भी कितने तनाव में रहे हों लेकिन उन्होंने धैर्य नहीं खोया। इसी तरह महंत रामचंद्रदास परमहंस जी महाराज भी थे। वह कभी-कभी रुष्ट होते थे लेकिन आंदोलन के दौरान कभी धैर्य नहीं खोते थे। 30 अक्टूबर, 1990 और 2 नवम्बर,1990 को जब अयोध्या में कारसेवकों का कत्लेआम हो रहा था तब भी मैंने देखा कि यह दोनों संत रामभक्तों को बचा रहे थे और घायल कारसेवकों की मरहम-पट्टी करने में योगदान दे रहे थे। यही है राम की मर्यादा और उनकी सीख कि किसी भी स्थिति में धैर्य नहीं खोना। सम-विषम परिस्थिति में यह अभियान आगे बढ़ा। गुरुदेव एक बात बार-बार कहते थे कि नीयत साफ होनी चाहिए। नियंता अपने आप मार्ग प्रशस्त कर देगा। हमें इस बात की प्रसन्नता है कि देर से ही सही लेकिन यह फैसला सर्वसम्मति से आया और पूरे देश और दुनिया ने इसको स्वीकारा। लेकिन यह भी है कि जिन पूज्य संतों और जिन महापुरुषों ने इस पूरे आंदोलन की रीढ़ बनकर इसे आगे बढ़ाया, वे लोग अपनी आंखों के सामने इस दृश्य को नहीं देख पाए।
फैसला सुनते समय आप क्या अनुभव कर रहे थे ?
फैसला सुनते ही मेरे दिमाग-मन में वे सभी चेहरे सामने आने लगे जो इस पूरे आंदोलन की रीढ़ थे। ये सभी लोग सम-विषम परिस्थिति में जूझते थे, लगते थे और कभी किसी बात की चिंता नहीं करते थे। इन महापुरुषों को कभी यह चिंता नहीं रहती थी कि हम कहां हैं, कैसे हैं, किस हालत में हैं। इनका एक-एक पल और क्षण रामकाज के लिए समर्पित था। इनके मन में एक ही धुन थी-जयश्रीराम और दृढसंकल्प था श्रीरामलला के जन्मस्थान पर भव्य मंदिर के निर्माण का। मुझे इस अभियान और ऐसे महापुरुषों को बहुत नजदीक से देखने, सुनने और आंदोलन के स्वर्णिम क्षणों का साक्षी बनने का सुअवसर प्राप्त हुआ। देखिए, यह आंदोलन एक ऐसा आंदोलन था जिसने पूरे देश को अपने साथ जोड़ा। सुखद स्थिति यह होती अगर यह फैसला जल्दी आ जाता तो इस आंदोलन के शिल्पी इन क्षणों को देख और महसूस कर पाते।
आंदोलन के दौरान सहभागिता की दृष्टि से जनजागरण या अन्य कोई विशेष आयाम आपके पास था उस समय ?
बिल्कुल, 1990 के पहले और 1992 के बाद जब आंदोलन का स्वर थोड़ा शिथिल होता हुआ दिखाई दिया तो मैंने अशोक जी के साथ बैठकर इससे जुड़ी योजना-रचना तैयार करने में अपना योगदान दिया। इसी तरह 1996-97 के बाद आंदोलन को लेकर शांति थी, कहीं कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, आंदोलन थोड़ा शिथिल पड़ा था। सवाल यह था कि आंदोलन आगे कैसे बढ़े? आगे का कार्य कैसे होगा? ऐसे मौके पर जनचेतना को जागृत करने के लिए, आंदोलन की लौ को तेज प्रदान करने के लिए मुझे हिन्दू वाहिनी का गठन करना पड़ा था। यह दो कारणों से आवश्यक था। एक तो भारत-नेपाल की सीमा सुरक्षा की दृष्टि से। क्योंकि दुर्भाग्य से 1990 के बाद जो सेकुलर सरकारें देश के अंदर आईं और 2004 के बाद से 2014 तक रहीं, उनके मन में राष्ट्रीय सुरक्षा का कोई भाव नहीं था। दूसरा, श्रीरामजन्मभूमि आन्दोलन, जो कि अनुष्ठान रूप में था तो स्वाभाविक था कि इससे जुड़े संत-महंत और महापुरुषों के ईद-गिर्द मारीच-ताड़का और सुबाहु जैसे राक्षस आतंक मचाने के लिए तैयार थे। मुझे इन सभी चीजों का अहसास हो रहा था। यह भी देख रहा था कि कई चीजें घटित हो रही हैं लेकिन शासन-सत्ता मौन साधे हुए है। इन सब स्थितियों में श्रद्धेय अशोक जी से चर्चा हुई कि क्या किया जाना चाहिए? उन्होंने कहा, हमें चुप नहीं बैठना चाहिए। आज कोई राजा-महाराजा नहीं हैं जो राक्षसों का संहार करने के लिए राम-लक्ष्मण दे देंगे। हमें इसी समाज से राम-लक्ष्मण निकालने होंगे। इसके बाद मैंने उस अभियान को अपने हाथों में लिया और सफलतापूर्वक इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। जब भी अयोध्या में कोई आंदोलन होता था तो अशोक जी के आह्वान पर हजारों की तादाद में रामभक्त अपना झंडा-डंडा लेकर पहुंचते थे। इसी तरह कार्यक्रम चलते रहे, आगे बढ़ते रहे।
जिस अयोध्या को एक सांस्कृतिक नगरी के रूप में देश और दुनिया में पहचान मिलनी चाहिए थी, उसकी उपेक्षा की गई। देश के सेकुलर दलों के नेता श्रीरामजन्मभूमि के दर्शन करना तो दूर, अयोध्या का नाम तक लेने से डरते थे। फैसले के बाद तस्वीर साफ है तो अयोध्या को उसकी खोई हुई पहचान कब तक मिलेगी ?
आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं कि आजादी के बाद से अयोध्या की उपेक्षा लगभग सभी सरकारों ने की। इस कालखंड में भाजपा की सरकारों को बहुत कम समय मिला, लेकिन शेष सरकारों को भरपूर समय मिलने के बावजूद उनके द्वारा उपेक्षा की गई। राज्य का मुख्यमंत्री बनने के बाद मेरा बेधड़क होकर अयोध्या आना-जाना शुरू हुआ। इस दौरान मैंने देखा कि राम की अयोध्या की स्थिति तो बहुत ही खराब है। बिजली नहीं है। सड़कें गड्ढों में तब्दील हैं। बिजली के तार हर जगह लटक रहे हैं। इससे अयोध्यावासी ही नहीं, बंदर तक चपेट में आ रहे थे। कोई पर्व-त्योहार पड़ता था तो गंदगी का ढेर लगा रहता था। रामजी की पैड़ी गया तो देखा कि पम्प करके पानी आता था, वहीं सड़ता था, उसी सड़े हुए पानी में श्रद्धालुओं को स्नान करने के लिए मजबूर होना पड़ता था। ऐसा प्रतीत होता था कि अयोध्या वनवास काट रही है। ऐसी स्थिति को देखकर मैंने अधिकारियों से कहा कि अयोध्या जी में सरयू जी का वही महात्म्य है जो हरिद्वार में गंगाजी का है। अगर हरिद्वार में गंगा जी की एक धारा हर की पैड़ी रूप में निकल सकती है तो रामजी की पैड़ी में भी सरयू जी की धारा निकल सकती है। इसी दीपावली से हमने इसे प्रारंभ कर दिया है। अब श्रद्धालु यहां आराम से सरयू जी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
रही बात अयोध्या की पहचान की, तो निश्चित रूप से मैं अयोध्या को उसकी पहचान दिलाने के लिए कृतसंकल्पित हूं। यह पहचान मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जन्मस्थान के रूप में अयोध्या को मिलनी ही चाहिए अपितु मानवता के कल्याण की प्रथम भूमि होने के कारण मिलनी चाहिए। हमने दीपोत्सव का आयोजन इसी भाव के साथ अयोध्या में प्रारंभ किया। मुख्यमंत्री बनने के बाद हमारे अधिकारियों ने पूछा कि आप दीपावली के दिन कहां रहेंगे? दरअसल यह सवाल इसलिए था क्योंकि मैंने गोरखपुर के आस-पास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कुछ वनवासी गांवों को गोद लिया था। आजादी के बाद से उन गांवों में सरकार ने कोई सुविधाएं नहीं दी। सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, स्वास्थ्य, राशन कार्ड का जहां अभाव था वहीं सरकार की ओर से भी मिलने वाली अन्य सुविधाओं से यह समाज वंचित रहता था। इन लोगों को उनके भरोसे ही छोड़ दिया गया था। तो मैंने अपने ट्रस्ट के माध्यम से एक व्यवस्था दी कि उन लोगों को गोद लेंगे, उनकी व्यवस्था करेंगे, शिक्षा उपलब्ध कराएंगे। मैं 15 वर्षों से वहीं जाता था और दीपावली इनके बीच ही मनाता था। मैंने अपने अधिकारियों से कहा, देखिए, मैं मुख्यमंत्री पहली बार बना हूं। अगर नहीं जाऊंगा तो लोग मुझसे कहेंगे कि जो व्यक्ति 15 वर्षों से आता था, मुख्यमंत्री बनने के बाद नहीं आया। इसलिए दीपावली को मैं वहीं जाऊंगा। लेकिन दीपावली के पहले दिन कोई कार्यक्रम हो सकता है। यह कार्यक्रम मुख्यमंत्री आवास पर नहीं होगा, कहीं और होना चाहिए। मैंने अपने कुछ अधिकारियों को अयोध्या भेजा और कहा कि पता करो कि अयोध्या में दीपावली कैसे मनाई जाती है। जब अधिकारी लौटकर आए तो उन्होंने बताया कि अयोध्या में दीपावली सामान्य रूप से मनाई जाती है। इसे सुनकर मैंने कहा कि दीपावली का संबंध तो अयोध्या से ही है। फिर ऐसी स्थिति? सब जानकारी जुटाकर मैंने कहा कि तैयारी करो। पूज्य संतों से बातचीत हुई। सभी संगठनों से बातचीत हुई। पहली बार आयोध्या की दीपावली, दीपोत्सव रूप में लोगों के सामने थी, जिसे काफी सराहना मिली। अगले वर्ष हमने उसके साथ कोरिया को जोड़ा। इस साल फिजी को जोड़ा। यह सब बहुत अच्छे एवं सफल आयोजन रहे। विभिन्न देशों की राम लीलाओं को हमने इसमें बुलाया। देखिए, राम तो विशाल भारत का हिस्सा रहे। लेकिन राम की संस्कृति दुनिया के अंदर कहां-कहां नहीं गई है। इंडोनेशिया की रामलीला, थाईलैंड की रामलीला, कम्बोडिया की रामलीला, लाओस की रामलीला, जापान की रामलीला, रूस की रामलीला, त्रिनिदाद की रामलीला, फिजी की रामलीला, मॉरिशस की रामलीला। कौन ऐसा देश है जिसके पास रामलीला नहीं है? ये सभी देश बड़े शान से व राम की गाथा को गाते हैं, उसके साथ जुड़ते हैं। इस संबंध में मैंने अयोध्या शोध संस्थान से कहा कि जहां-जहां राम हैं दुनिया के अंदर, उन पर शोध करो। साहित्य का संकलन करो। उन देशों की रामलीलाओं को यहां बुलाओ और यहां की रामलीला को वहां भेजो। यह सिलसिला पिछले तीन साल में प्रारंभ हुआ है।
इसके साथ ही विवाद के कारण संपूर्ण अयोध्या उपेक्षित थी। हमने अयोध्या की तरफ ध्यान दिया और अधिकारियों से कहा कि यहां लटके हुए तार क्यों हैं? इनको भूमिगत करिए। एलईडी स्ट्रीट लाइट अयोध्या में क्यों नहीं लग सकती? सफाई यहां क्यों नहीं हो सकती? यहां के घाट ठीक क्यों नहीं हो सकते? अयोध्या को हमने नगर निगम बनाया। फैजाबाद जिले का नाम बदलकर अयोध्या किया। पंचकोसी की परिक्रमा, चौदहकोसी की परिक्रमा, चौरासीकोसी की परिक्रमा-इन सभी को बुनियादी सुविधाओं से जोड़ने का काम शुरू कराया। व्यापक कार्ययोजना बनाई, सड़कों को ठीक करना शुरू किया, घाटों का सौंदर्यीकरण करना शुरू किया। बस अड्डे, मेडिकल कॉलेज, एयरपोर्ट पर कार्ययोजनाओं को आगे बढ़ाया। सरयू में सीधे सीवेज जाता था, उसे रुकवाने के लिए एसटीपी पर कार्य किया। कुल मिलाकर अयोध्या के विकास को लेकर काफी चीजें चल रही हैं। अभी हमने वहां के लिए एक आयुष विश्वविद्यालय की भी व्यवस्था तैयार की है। इधर भगवान राम का भव्य मंदिर भी बनेगा, एक आधुनिक संग्रहालय भी बनेगा। इसमें मनु से लेकर आज की अयोध्या तक और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जन्म से लेकर रामराज्य की स्थापना तक, राम जन्मभूमि आंदोलन से लेकर मंदिर निर्माण तक की सारी चीजें उसके अंदर एक नए ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाएगा। इस दिशा में कार्य आगे बढ़ रहा है। मुझे लगता है कि एक योगी के रूप में श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन के साथ जुड़ना मेरे लिए गौरव की बात रही है और एक मुख्यमंत्री के रूप में अयोध्या को उसकी पहचान दिलाने में योगदान करना मुझे लगता है कि मेरे जीवन का एक स्वर्णिम पल है।
लखनऊ में लक्ष्मण जी की बड़ी मूर्ति लगने वाली थी। क्या लक्ष्मणपुरी को भी उसकी पहचान देने की कोई योजना है ?
देखिए, अभी हमारा पूरा ध्यान अयोध्या पर है। वहां सभी को स्थान मिलेगा ही।
अयोध्या को लेकर वामपंथी और सेकुलर अपने तर्क गढ़ते थे। फैसले के बाद उन्हें आपका क्या जवाब है?
देखिए, सबका जवाब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में आ गया है। और मुझे लगता है कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं रामलला को एक साक्षी रूप में स्वीकार करके सभी प्रश्नों का उत्तर दे दिया है।
आपके शब्दों में राम कौन हैं? राम की परिभाषा क्या है ?
देखिए, राम, राम हैं। राम को किसी परिभाषा में नहीं बांधा जा सकता। राम भारत के अंदर एक दैवीय विभूति एवं विग्रह तो हैं ही लेकिन मानवीय चरित्र का कोई ऐसा पक्ष नहीं, जो भगवान के उस आदर्श रूप में, जीवन चरित्र में न हो। इस चरित्र में सारी समस्याओं का समाधान है। सम्पूर्ण मानव जीवन में घटित होने वाली हर घटना और चुनौती का समाधान अगर कहीं है तो वह भगवान राम के चरित्र में है। यही कारण है कि रामलीलाएं तो हर साल होती हैं। इसमें एक छोटे बच्चे से लेकर वृद्ध तक शामिल होते हैं लेकिन जिस मंत्रमुग्ध भाव के साथ वह सुनता है वह अद्भुत है। वह यह सब संवाद इसलिए ध्यान से सुनता है क्योंकि उसे पता है कि एक-एक संवाद में जीवन के रहस्य और चुनौतियों का समाधान छिपा हुआ है।