विस्तारवाद का इलाज जरूरी
   दिनांक 25-नवंबर-2019
 
जम्मू-कश्मीर-लद्दाख की बदली स्थिति, माइनो-वाड्रा-गांधी परिवार की सुरक्षा और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय फीस वृद्धि जैसे मुद्दे अहम हैं, किन्तु संसद के वर्तमान सत्र में इन मुद्दों के बीच एक अन्य महत्वपूर्ण बात दब-सी गई।
अरुणाचल की ओर फिर से बढ़ते चीनी दखल-दबदबे की ओर तापिर गाओ ने ध्यान दिलाया, जो अरुणाचल पूर्व सीट से सांसद हैं। 19 नवंबर को उन्होंने लोकसभा में कहा कि चीन अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सीमा में 50-60 किलोमीटर तक घुसपैठ कर चुका है और यदि उसे नहीं रोका गया तो राज्य में दूसरा डोकलाम बन जाएगा!
दक्षिण तथा पश्चिम में लंबी तटरेखा और उत्तर में ऊंची पर्वतमाला के होने पर भी भारत में जैसी शांत स्थितियां होनी चाहिए थीं वे ऐतिहासिक कारणों से हो नहीं सकीं। पिछले सत्तर वर्ष में भारत के पाकिस्तान से चार और चीन से एक युद्ध इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि पड़ोस में उन्मादी-उपद्रवी पाकिस्तान और विस्तारवादी चीन इसके दो अलग-अलग कारक थे। सोवियत संघ के बिखराव के बाद से भारत ने उत्तरी क्षेत्र में शांत मजबूत पड़ोस की आवश्यकता को लगातार अनुभव किया है। यही वह क्षेत्र है जहां से भारत को आतंकित, अस्थिर करने वाले आतंकी तंत्र और नकली मुद्रा की सेंधमारी होती रही।
एशिया से वैश्विक सहयोग, समन्वय और समृद्धि के रास्ते खुल सकते थे, किन्तु चीन की ओर से संसाधनों पर कब्जे की होड़ और बाजारों को पंजे में रखने की सीपैक जैसी योजनाएं अब कई देशों को अखर रही हैं। दरअसल, चीन ने ताबड़तोड़ उत्पादन के बूते बाजारवाद की जो बिसात बिछाई है उसके नीचे साम्यवाद तो बहुत पहले दफनाया जा चुका है। अब तो किसी भी कीमत पर बाजार की चक्की चलाते रहने वाला 'जिन्न' है जो उसकी छाती पर चढ़ा बैठा है। विस्तारवाद का अघोषित लक्ष्य लेकर चलते हुए, आर्थिक सौदेबाजी से भू-राजनैतिक स्थितियों का पलड़ा अपने पक्ष में झुकाना ही आज चीन की विदेश-रक्षा और अर्थनीति का मूल है।
वैसे, अरुणाचल की आवाज अकेली नहीं है, कई अन्य घटनाएं हैं जो बताती हैं कि वैश्विक स्तर पर बढ़ते-बदलते भारत की राह में क्षेत्रीय मुद्दों को अवरोधकों की तरह प्रयोग करने वाले तत्व अपने काम में लगे हैं।
जम्मू-कश्मीर-लद्दाख की बदली स्थिति से पाकिस्तान के पेट में मरोड़ उठी, यह पहली और जगजाहिर बात है। दूसरी बात चीन की लद्दाख के कुछ हिस्से को अपना बताते हुए की गई आपत्ति है। तीसरी आपत्ति आश्चर्यजनक रूप से नेपाल की ओर से भारत के उस कालापानी क्षेत्र पर आई है, जिस पर नेपाल के किसी शासक की ओर से कभी कोई सवाल तक नहीं किया गया।
इन तीन बिन्दुओं के साथ जुड़ता चौथा आयाम खुफिया एजेंसियों से निकली उन खबरों में है जिनके अनुसार उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे के पास चीन सैन्य अड्डे मजबूत कर रहा है। नेपाल, तिब्बत और भारत के बीच पड़ने वाली इस जगह हैलिपैड बनाने के अलावा 20 विमानों के खड़े होने तथा रखरखाव की जगह बनाई जा रही है। लंबे समय से पाकिस्तान को भारतीय 'अघोषित शत्रु' के तौर पर ही देखते हैं। यदि कहा जाए कि मीडिया रिपोर्टिंग और बॉलीवुड की फिल्मों ने भी इस दृष्टिकोण को मजबूती दी तो गलत नहीं होगा। परंतु भू-राजनीतिक गतिविधियों से उजागर संकेत बताते हैं कि पाकिस्तान सिर्फ मोहरा है, ड्रैगन का पिट्ठू! भारत की असली चिंता पर्दे के पीछे छिपा चीन होना चाहिए। ध्यान देने वाली बात है कि जब-जब भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या रक्षामंत्री अरुणाचल की यात्रा पर गए चीन ने संवाददाता सम्मेलन बुलाकर सार्वजनिक तौर पर इन दौरों का विरोध किया।
तो भारत क्या करे! वक्त आ गया जब सीमाओं और चिंताओं को लेकर भारत को सिर्फ मुस्तैद नहीं बल्कि और ज्यादा मुखर भी होना चाहिए। इसमें राष्ट्रीय रुख की सरकार के अलावा मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग की भी बड़ी भूमिका है। लेकिन एक बात का ध्यान तो रखना होगा, भारतीय समाज को चीन या वामपंथ का मुद्दा आने पर खामोश हो जाने और समाज विभाजक मुद्दे लपकने वाले कथित बुद्धिजीवी भला क्यों चाहिए? ऐसे समझदारों का आप क्या करेंगे जिनके चेहरे जेएनयू से उठते 'आजादी' के नारों पर खिल उठते हैं मगर थ्येनआनमन चौक छात्र नरसंहार या हांगकांग में आजादी के लिए प्रताडि़त होते छात्रों के जिक्र से जिनकी 'अक्लदाढ़़' दुखने लगती है!
इतिहास से सबक लेकर चीजें ठीक की जाती हैं। 'हिन्दी-चीनी, भाई-भाई' की नीति ने भारत को और चीन के साथ पंचशील समझौते ने तिब्बत को किस तरह नुक्सान पहुंचाया यह दुनिया ने देखा है। तिब्बत की स्वायत्तता की अलख करीब-करीब भारत की आजादी जितनी ही पुरानी है। सुदूर फिलिस्तीन पर रोने वाले भारतीय बुद्धिजीवी भला कब उस तिब्बती क्षेत्र की चिंता, वहां की संस्कृति और मानवाधिकारों की बात करेंगे, जिसकी सीमा भारत से लगती है! यह समय उन नई संतुलित आवाजों को साधने-उभारने का है जिनके लिए एक भारत, श्रेष्ठ भारत का नारा मायने रखता है और जो किसी 'इज्म' के मारे नहीं है!
याद रखिए, सरकारें बहुत कुछ कर सकती हैं लेकिन राष्ट्रीय सरोकार के स्वरों के बिना सरकारें कुछ नहीं कर सकतीं।
बताइएगा।