'राममंदिर का मार्ग प्रशस्त होना विश्वभर में बसे रामभक्तों की जीत
   दिनांक 26-नवंबर-2019
अमेरिका में न्यू मैक्सिको में अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ वैदिक स्टडीज के प्रणेता पद्मभूषण डॉ. डेविड फ्रॉली उपाख्य पंडित वामदेव शास्त्री ने वेदों, पुराणों और अन्य भारतीय धर्मग्रंथों का विशद् अध्ययन किया है। वे संस्कृत के उद्भट विद्वान हैं। अपने इंस्टीट्यूट के माध्यम से वे पश्चिम, विशेषकर अमेरिका में वेद, आयुर्वेद, योग और भारतीय ज्ञान भण्डार के प्रचार-प्रसार में लगे हैं। '80 के दशक में उनका भारत में उस समय हिन्दुत्व से जुड़े विषयों पर तथ्यात्मक शोध और अध्ययन करने वाले श्री रामस्वरूप और श्री सीताराम गोयल से परिचय हुआ था और तबसे वे निरन्तर उनके साथ हिन्दू धर्म और उसके विभिन्न आयामों पर गहन चिंतन-मनन, लेखन करते रहे थे। हाल ही में श्री रामस्वरूप और सीताराम गोयल के संदर्भ में एक व्याख्यान के सिलसिले में डॉ. फ्रॉली नई दिल्ली आए थे। पाञ्चजन्य के सहयोगी संपादक आलोक गोस्वामी ने उनसे श्रीरामजन्म भूमि, श्री रामस्वरूप और सीताराम गोयल व हिन्दुत्व से जुडे़ अन्य अनेक विषयों पर लंबी बातचीत की, जिसके प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं :- 

 
अदालत के अंदर और बाहर, एक लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार श्रीराम जन्मभूमि का विवाद सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद समाप्त हो गया और श्रीराम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस लंबे आंदोलन में कितने ही संतों और रामभक्तों ने अपना बलिदान दिया। आपकी क्या प्रतिक्रिया है ?
सर्वोच्च न्यायालय के एकमत से आए निर्णय के माध्यम से श्रीराम जन्मभूमि का अंतत: हिन्दुओं को पुन: प्राप्त होना न सिर्फ हिन्दुओं की, बल्कि उन सभी की ऐतिहासिक विजय है जो भारत की महान धर्माधिष्ठित सभ्यता का, श्रीराम और रामायण का सम्मान करते हैं। इनमें बौद्ध भी हैं और दक्षिणपूर्व एशिया के भिन्न-भिन्न मान्यताओं/आस्थाओं वाले लोग, अनेक मुस्लिम और पूरे विश्व के रामभक्त शामिल हैं।
श्री रामजन्मभूमि की हिन्दू समाज के हाथों में वापसी भारतीय राजनीति में कांग्रेस के दशकों के ऐसे शासन के बाद हिन्दू जागरण का नाद करती है, जिसने हर हिन्दू सांस्कृतिक स्वर को दबाने और राम मंदिर के निर्माण को रोकने की कोशिश की थी। यह उन दिव्य विभूतियों की भी जीत है जिन्होंने सदियों तक इस पवित्र स्थल के लिए संघर्ष किया, श्रीराम के लिए अपना जीवन न्योछावर किया।
अब अयोध्या उन सभी के लिए एक वैश्विक तीर्थ बननी चाहिए जो श्री राम और उनके सनातन मूल्यों का सम्मान करते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या और इसके ढांचागत विकास के लिए अच्छा काम कर रहे हैं। हाल ही में मैं दीपावली पर अयोध्या गया था। वहां सरयू के तट पर 5 लाख 51 हजार दीये जलने का अभूतपूर्व दृश्य देखकर आनंद आ गया। लगा जैसे अब श्रीराम सदा के लिए अयोध्या लौट आए हैं, एक नए रामराज्य की नींव डालने। यह भारत में एक नए युग के प्रवर्तन का संकेत है।
इसके साथ ही, भारत के लोगों को सतर्क रहने की भी आवश्यकता है, क्योंकि अधार्मिक ताकतें आसानी से हथियार नहीं डालेंगी और येन-केन-प्रकारेण पलटवार करने की कोशिशें करेंगी। हिन्दुओं को ऐसी नकारात्मक ताकतों से एक लंबे सांस्कृतिक संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा, जो भारत को फिर से उभरता नहीं देखना चाहतीं। यह सिर्फ एक राजनीतिक या सामाजिक संघर्ष नहीं, बल्कि एक बौद्धिक और आध्यात्मिक लड़ाई है।
हिन्दू हमेशा से विदेशी/विधर्मी ताकतों के निशाने पर रहे हैं, चाहे वे इस्लामवादी हों, ब्रिटिश, कम्युनिस्ट या छद्म सेकुलर ताकतें। ऐसा क्यों?
भारत के आकार और इसके संसाधनों की अकूत दौलत की वजह से कई विदेशी ताकतों या उनकी विचारधाराओं का उद्देश्य रहा है भारत को जीतना, इस पर राज करना अथवा ऐसा पूरी दुनिया पर अपने दृष्टिकोण को थोपने या कन्वर्ट करने के एक बड़े दुष्चक्र के तहत भी होता रहा है। वे जानते हैं कि भारत पर हावी होने के लिए यहां की उस हिन्दू बहुल आबादी पर अपना प्रभुत्व जमाना जरूरी है जो भारत देश, यहां की संस्कृति और भूमि की रक्षा करती है। ऐसे में स्वाभाविक ही हिन्दू ऐसे दुष्चक्रों का निशाना बनते रहे हैं।
पूरे इतिहास में हिन्दू धर्म ही है जिसने इस सबको झेला है और फिर भी कायम रहा है जबकि ग्रीस, रोम और पर्शिया जैसी कई महान सभ्यताएं काल के गाल में समा गईं। केवल भारत ही है जिसने मानवता की प्राचीन आध्यात्मिक विरासत को सहेजे रखा है, जो किसी भी मान्यता विशेष के राज के पहले और बाद में भी अस्तित्व में थी। भारत की इसी उच्च सभ्यतामूलक शक्ति के उदय का भय इसे बर्बाद या तेजहीन बनाने की कोशिश में लगे दूसरे समूहों को उसके विरुद्ध दुष्चक्र रचते रहने के लिए उकसाता रहा है।
दो महान मनीषियों यथा, रामस्वरूप जी और सीताराम जी ने अपना पूरा जीवन हिन्दुत्व के बौद्धिक योद्धाओं के नाते समर्पित कर दिया। आपके अनुसार हिन्दुओं को जाग्रत करने में इन दो ऋषि-सम मनीषियों का सबसे बड़ा योगदान क्या है? उनके ऐसे कुछ लेख या शोध पत्र कौन से हैं जो इस नाते आपको ध्यान आते हैं  ?
इस दृष्टि से मुझे सीताराम गोयल जी की दो खंडों में लिखी पुस्तक-'हिन्दू टेम्पल्स: व्हाट हैपन्न्ड टू देम'-सबसे पहले ध्यान आती है। इसमें इस्लामी आक्रमणों के संदर्भों सहित मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा तोड़े गए कई हिन्दू मंदिरों का सिलसिलेवार ब्योरा है, इसलिए विध्वंस की उन घटनाओं को झुठलाया नहीं जा सकता। बहुत से लोग इस पुस्तक को खरीद रहे हैं और जान रहे हैं कि सदियों से हिन्दू मंदिरों के साथ क्या होता रहा है। इसमें ऐसा आंखें खोलने वाला विवरण है कि जिसे पढ़कर लोग सकते में रह जाते हैं। ये इतिहास के वे अकाट्य तथ्य हैं जो लोगों से छुपाए जाते रहे थे। सीताराम जी की कई और महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं जिनमें हिन्दुओं को कन्वर्ट करने के इस्लामी और ईसाई षड्यंत्रों की गहन जानकारी है।
जहां तक रामस्वरूप जी का प्रश्न है, उनकी सबसे उल्लेखनीय पुस्तक है-'हिन्दू व्यू ऑफ क्रिश्चियेनिटी एंड इस्लाम', जो शायद ईसाई और इस्लामी मजहबी विचार पर सबसे गहन टीका है। इसमें बताया गया है कि उनमें हिन्दुओं और बाकी अन्य सभी को अपनी संकुचित सोच में कन्वर्ट करने की गलत धारणा इतनी गहराई से क्यों पैठी है।
सभी पंथ एक से नहीं हैं, जिसे उनके कई तरह के मजहबी आख्यानों और पंथों के सर्वोच्च सत्य पर विशिष्ट मिल्कियत के दावों से आसानी से समझा जा सकता है। रामस्वरूप जी ने इस पूर्वाग्रही मानसिकता और भावनात्मक दृष्टिहीनता को, ऐसे विशिष्टता वाले दावों से परे, सिर्फ एक बौद्धिक या ऐतिहासिक परीक्षण ही नहीं, योगी की सी गहन दृष्टि का उपयोग करते हुए उजागर किया है। उन्होंने हिन्दुओं के विरुद्ध झूठे आरोपों का प्रतिकार करने के लिए हिन्दुओं में अपनी खुद की गहन वैदिक शिक्षाओं की समझ का विवेक जगाया है। धर्म और अध्यात्म पर हिन्दू दृष्टिकोण को समझने के इच्छुक लोगों को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।
कुछ समय से, हिन्दुत्व के नवजागरण में थोड़ी गति आती दिखी है। आप क्या कहेंगे ?
समग्रता में देखें तो हिन्दुत्व का नवजागरण वर्षों के प्रतिरोधों और अवरोधों के बाद तेजी से बढ़ रहा है। और ऐसा भारत और भारत के बाहर भी देखने में आ रहा है। आने वाले वक्त में इसका वैश्विक स्तर पर बढ़ते जाना अवश्यंभावी है। हालांकि विरोध करने वाले तो रहेंगे ही, पर अब हिन्दू शक्तियां बौद्धिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तरों पर इसका प्रतिकार करने में सक्षम हैं और उन्हें पूरी निष्ठा से इसमें लगे रहना चाहिए। रामजन्म भूमि का फिर से प्राप्त होना इस उभार का एक अच्छा संकेत है, ये आशातीत है। ऐसा आभास होता है कि न्यायालय सबरीमला को भी एक अलग तरह से देखते हुए हिन्दू अधिकारों और भावनाओं को ज्यादा सम्मान देगा तथा कानून और संविधान के तहत हिन्दुओं को फिर से धार्मिक समानता देगा। मोदी सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर का फिर से एकीकरण करना और अनुच्छेद 370 को हटाना राष्ट्रीय जागरण का एक और संकेत है।
आपने सदा ही आयुर्वेद, वेदान्त, हिन्दू धर्म ग्रंथों के माध्यम से नैतिक जीवन का मार्ग दिखाया है। लेकिन आज भी इसका उतना व्यापक असर नहीं दिखता। भारत के लोग अब भी पश्चिमी जीवन शैली का अंधानुकरण करने को उत्सुक दिखते हैं। क्या ऐसा इसलिए कि शिक्षा में 'भारत' नहीं है ?
मुझे लगता है, वक्त बदला है। भारत में आज अधिकांश लोग हिन्दू परंपराओं को मानने वाले हैं। लाखों लोग रोजाना मंदिर और दूसरे तीर्थों पर जाते हैं। त्योहार मनाते हैं। जबकि पश्चिम में ईसाइयत साफ तौर पर पतनोन्मुख है, चर्च जाने वाले लोगों की संख्या बहुत कम रह गई है। भारत में प्रयागराज के विशाल कुंभ मेले को देखिए, जहां इस साल कीशुरुआत में 20 करोड़ से ज्यादा श्रद्वालु पहंुचे थे। योग और आयुर्वेद सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि अपने आध्यात्मिक आयामों और आयुष्य शक्ति के लिए विश्व में खासा नाम कमा रहे हैं। हिन्दू पुनरोत्थान जारी रहने वाला है। भारत में इसने निर्णायक मोड़ लिया है और अब ये आगे ही बढ़ता जाएगा। लेखकों की नई पीढ़ी इसके नजरिए को नये आयामों के साथ प्रस्तुत कर रही है। लेकिन इसे शिक्षा व्यवस्था और पाठ्यपुस्तकों में शामिल करना होगा, जिसमें आज भी राष्ट्रविरोधी और हिन्दू विरोधी दृष्टिकोणों वाला जबरदस्त मार्क्सवादी झुकाव दिखता है जिसे बदलने की जरूरत है।
ऐसी चर्चा है कि शैव मत की उपासना स्थली रहे जम्मू-कश्मीर में इस्लामी जिहादियों द्वारा लंबे समय से ध्वस्त किए जाते रहे हिन्दू मंदिरों का जीर्णोद्वार कराया जाएगा। इस पर क्या कहेंगे ?
निश्चित ही जम्मू-कश्मीर में हिन्दू मंदिरों को सदियों की असहिष्णुता ने ध्वस्त किया है। आज जम्मू-कश्मीर अपनी सांस्कृतिक और योग की विरासत को फिर से आत्मसात कर रहा है, ऐसे में वहां मंदिरों का पुनरुद्धार होना ही चाहिए। लेकिन पूरे भारत में ऐसे अनेक मंदिर हैं जिन्हें ध्वस्त किया गया था। हिन्दू मंदिरों को सम्मान के साथ सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के तौर पर फिर से वही दिव्यता दी जानी चाहिए। भारत के मुसलमानों को खिलजी, बाबर, औरंगजेब और पहले की सदियों के आक्रांताओं के साथ अपनी पहचान बताना छोड़ देना चाहिए, वैसे ही जैसे ब्रिटिश शासन को ईस्ट इंडिया कंपनी, उपनिवेशवादी शासकों और उनके द्वारा किए जबरदस्त दमन के गुणगान गाना बंद करना चाहिए।