जब बालासाहेब ने कहा था मैं किसी दुष्ट से हाथ नहीं मिला सकता
   दिनांक 27-नवंबर-2019
कभी बाला साहेब ठाकरे ने कहा था कि सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाने से अच्छा होगा कि भारत को वापस अंग्रेजों के हाथ में सौंप दिया जाए. नवंबर 2012 में उन्होंने कहा कि कांग्रेस एक कैंसर है. ऐसे ही बाला साहेब ने शरद पवार के बारे में कहा था जिस शख्स ने अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिरा दी, हम उससे कैसे हाथ मिला सकते हैं. कम से कम मैं तो नहीं मिला सकता

उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के नए मुख्यमंत्री होंगे. कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की बैसाखियों पर सवार उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन अपने पिता बाला साहब ठाकरे के सिद्धांतों और विचारों से बहुत दूर हो गए. दूर हो गए हिंदुत्व से. दूर हो गए वीर सावरकर से. आज जरा गौर करते हैं बाला साहब ठाकरे के कुछ बयानों पर इन बयानों की रोशनी में देखिएगा कि बाला साहब की शेर शिवसेना आज क्या बन गई है.
आज विश्लेषक राजनीति और संभावनाओं की बात कर रहे हैं. कह रहे हैं कि राजनीति में कोई स्थायी शत्रु या स्थायी दोस्त नहीं होता. ये सवाल 1999 में बाल ठाकरे के सामने भी आया था. एनडीटीवी ने 1999 में बाल ठाकरे का इंटरव्यू किया. सवाल था कि शरद पवार के साथ गठबंधन की क्या संभावना है. उनका जवाब था... राजनीति में संभावना. क्या मतलब. अगर यही कहा जाए कि राजनीति दुष्टों का खेल है, तो यह व्यक्ति विशेष को तय करना होगा कि वह भद्र पुरुष बना रहे या बदमाश बन जाए. अगर कोई दुष्ट बनना चाहता है, तब क्या. लेकिन मैं किसी दुष्ट के साथ खड़ा नहीं हो सकता. जब यही सवाल दोबारा पूछा गया, तो उन्होंने शरद पवार को लेकर कहा कि जिस शख्स ने अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिरा दी, हम उससे कैसे हाथ मिला सकते हैं. कम से कम मैं तो नहीं मिला सकता. मैं कभी उस शख्स से हाथ नहीं मिला सकता. (ध्यान दीजिएगा- नेता चुने जाने के बाद उद्धव ठाकरे ने मंगलवार को शरद पवार के पैर छुए हैं. हालांकि उनके पिता हाथ मिलाने को तैयार नहीं थे)
कांग्रेस और राकांपा के सामने नतमस्तक होने के लिए ऊधव ने बहुत कुछ बदला. सबसे पहले उन्होंने हिंदुत्व को तिलांजलि दी. यह हमेशा से शिवसेना का कोर इश्यू रहा है. बाला साहब ठाकरे ने सार्वजनिक रूप से कई बार स्वीकार किया कि अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने वाले शिवसैनिक थे. लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट से अय़ोध्या विवाद पर फैसला आया, तो साल भर से जल्द राम मंदिर निर्माण का राग अलाव रहे ऊधव का सुर बदल गया. शायद पहला मौका होगा कि राम मंदिर मसले पर शिवसेना के नेतृत्व से संयम के उपदेश मिले. ऊधव ने फैसला आने के बाद 24 नवंबर को अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन का ऐलान किया था. लेकिन बदले हालात में ऊधव की हिम्मत नहीं हुई कि वह अयोध्या का रुख करें. उन्हें पता है कि उनके दोस्तों को ये पसंद नहीं आएगा. ऊधव बदले तो लिबास भी बदल गया. हर महत्वपूर्ण मौके पर वह केसरिया लिबास में रहते हैं. लेकिन पिछले एक महीने से किसी ने उन्हें केसरिया कपड़ों में नहीं देखा. उन्हें पता है कि उनके नए दोस्तों को भगवा से चिढ़ है. कुर्सी के लिए ऊधव ने सोनिया गांधी की हर शर्त मानी. यहां तक कि मुस्लिमों को पांच प्रतिशत अलग से आरक्षण कोटा देने की भी शर्त. एक महीने पहले तक शिवसेना इसे तुष्टिकरण बताती थी.
उद्धव  के दोस्त शरद पवार के बारे में उनके पिता बाल ठाकरे के विचार आप पढ़ चुके हैं. अब जरा कांग्रेस के बारे में जानिए कि बाल ठाकरे ने क्या-क्या कहा. जब संसद में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में वीर सावरकर के पोट्रेट का अनावरण राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने किया, तो कांग्रेस को एतराज हुआ. ठाकरे भड़क गए. उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी किस हैसियत से सावरकर के बारे में बोल रही हैं. वह जानती ही क्या हैं. उन्हें इस देश के बारे में पता ही क्या है. जब 2004 में सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना बनने लगी, तो ठाकरे ने उनके विदेशी मूल का सवाल उठाया. ठाकरे ने कहा कि सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाने से अच्छा होगा कि भारत को वापस अंग्रेजों के हाथ में सौंप दिया जाए. नवंबर 2012 में उन्होंने राहुल गांधी और सोनिया गांधी पर खासी तीखी टिप्पणियां की. उन्होंने कहा कि कांग्रेस एक कैंसर है. (ध्यान दीजिएगा- उद्धव ठाकरे अपने पिता की सोच से अलग जाकर कांग्रेस को गले लगा चुके हैं )
बाला साहब ने न तो खुद चुनाव लड़ा, न परिवार के किसी सदस्य को लड़ने दिया. लेकिन उनका निवास मातोश्री हमेशा सत्ता का केंद्र रहा. विपक्ष में रहकर भी वह सत्ता का केंद्र थे.  वहीं उद्धव मुख्यमंत्री बनने के लिए राकांपा और कांग्रेस के दूसरे दर्जे के नेताओं के चक्कर लगाते नजर आए. एक सवाल जो आपके लिए हम छोड़ जाते हैं. सवाल ये कि बाला साहब ठाकरे के जीवित रहते क्या ये संभव था कि कांग्रेस और राकांपा के साथ मिलकर शिवसेना सरकार बनाए.