पुण्यतिथि विशेष: शोषित समाज के उत्थान के लिए आजीवन प्रयासरत रहे ज्योतिबा फुले
   दिनांक 28-नवंबर-2019
भारतीय सामाजिक क्रांति के जनक कहे जाने वाले महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के सातारा जिले में माली जाति के एक परिवार में हुआ था। वे एक महान विचारक, कार्यकर्ता, समाज सुधारक, लेखक, दार्शिनक, संपादक और क्रांतिकारी थे। उन्होंने जीवन भर महिलाओं और शोषितों के उद्धार के लिए कार्य किया। इस कार्य में उनकी धर्मपत्नी सावित्रीबाई फुले ने भी पूरा योगदान दिया

महात्मा फुले का बचपन अनेक कठिनाइयों में बीता। वे महज 9 माह के थे जब उनकी मां का देहांत हो गया। आर्थिक तंगी के कारण खेतों में पिता का हाथ बंटाने के लिए उन्हें छोटी उम्र में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी। लेकिन पड़ोसियों ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उनके कहने पर पिता ने उन्हें स्कॉटिश मिशन्स हाई स्कूल में दाखिला करा दिया। मात्र 12 वर्ष की उम्र में उनका विवाह सावित्रीबाई फुले से हो गया।
ज्योतिबा के जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ वर्ष 1848 में आया जब वे अपने एक ब्राह्मण मित्र की शादी में हिस्सा लेने के लिए गए। शादी में दूल्हे के रिश्तेदारों ने जातिसूचक शब्द बोलकर उनका अपमान किया। इसके बाद उन्होंने तय कर लिया कि वे सामाजिक असमानता को उखाड़ फेंकने की दिशा में कार्य करेंगे क्योंकि जब तक समाज में स्त्रियों और निम्न जाति वालों का उत्थान नहीं होगा जब तक समाज का विकास असंभव है।
समाजोत्थान के अपने मिशन पर कार्य करते हुए ज्योतिबा ने 24 सितंबर 1873 को अपने अनुयायियों के साथ 'सत्यशोधक समाज' नामक संस्था का निर्माण किया। वे स्वयं इसके अध्यक्ष थे और सावित्रीबाई फुले महिला विभाग की प्रमुख। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य शोषितों को जातियों को शोषण से मुक्त कराना था। उन्होंने चतुर्वर्णीय जाति व्यवस्था को ठुकरा दिया। इस संस्था ने समाज में तर्कसंगत विचारों को फैलाया। सत्यशोधक समाज के आंदोलन में इसके मुखपत्र दीनबंधु प्रकाशन ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कोल्हापुर के शासक शाहू महाराज ने इस संस्था को भरपूर वित्तीय और नैतिक समर्थन प्रदान किया।
महात्मा फुले ने समाज में अछूत कहे जाने वाले लोगों को बराबरी का दर्जा दिलाने का प्रयास भी किया। उन्होंने शोषित समाज के लोगों को अपने घर के कुंए को प्रयोग करने की अनुमति दी। उनका मानना था कि यदि आजादी, समानता, मानवता, आर्थिक न्याय, शोषणरहित मूल्यों और भाईचारे पर आधारित सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना है तो असमान और शोषक समाज को उखाड़ फेंकना होगा।
ज्योतिबा के कार्य में उनकी पत्नी ने बराबर का योगदान दिया। यद्यपि वे पढ़ी−लिखी नहीं थीं और शादी के बाद ज्योतिबा ने ही उन्हें पढ़ना−लिखना सिखाया। किन्तु इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उस समय लड़कियों की दशा अत्यंत शोचनीय थी और उन्हें पढ़ने लिखने की अनुमति नहीं थी। इस रीति को तोड़ने के लिए ज्योतिबा और सावित्रीबाई ने 1848 में लड़कियों के लिए एक विद्यालय की स्थापना की। यह भारत में लड़कियों के लिए खुलने वाला पहला विद्यालय था।
सावित्रीबाई फुले स्वयं इस स्कूल में लड़कियों को पढ़ाने के लिए जाती थीं। लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था। उन्हें लोगों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। यहां तक कि उन्होंने लोगों द्वारा फेंके जाने वाले पत्थरों की मार भी झेली। परन्तु उन्होंने हार नहीं मानी। इसके बाद ज्योतिबा ने लड़कियों के लिए दो और स्कूल खोले साथ ही विधवाओं की शोचनीय दशा को देखते हुए उन्होंने विधवा पुनर्विवाह की भी शुरुआत की और 1854 में विधवाओं के लिए आश्रम भी बनाया। साथ ही उन्होंने नवजात शिशुओं के लिए भी आश्रम खोला ताकि कन्या शिशु हत्या को रोका जा सके। 28 नवम्बर 1890 को महात्मा ज्योतिबा फुले की मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों ने सत्य शोधक समाज को दूर−दूर तक पहुंचाने का कार्य किया।
महात्मा फुले ने समाज कार्य करते हुए अनेक पुस्तकें भी लिखीं। ये सभी पुस्तकें उनके कार्य को गति प्रदान करती हैं। इनमें 'तृतीय रत्न', 'ब्रह्माणंचे कसाब', 'इशारा','पोवाडा−छत्रपति शिवाजी भोंसले यांचा', अस्पृश्यांची कैफि़यत' इत्यादि प्रमुख हैं। ज्योतिबा फुले ने अपने कार्य से अनेक लोगों को प्रभावित किया। यह प्रभाव उनकी मृत्यु पर्यंत भी बना रहा। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर भी उनसे काफी प्रभावित हुए।
आज भी लोग ज्योतिबा के कार्यों से प्रभावित हो रहे हैं।