नया सूर्योदय
   दिनांक 04-नवंबर-2019
पौने छह सौ भारतीय रियासतों को एकता के सूत्र में पिरोने वाले सरदार पटेल को इससे बड़ी श्रद्धांजलि क्या होगी कि भारत के अभिन्न भाग को इससे अलग-थलग करने वाली बेड़ियां ‘लौह पुरुष’ के जन्मदिवस पर ही एक झटके से टूट  गईं
 
 जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लिए यह नया सूर्योदय है। इस ‘उजाले’ की घोषणा करीब तीन माह पहले की गई थी। अब जम्मू-कश्मीर (विधानसभा के साथ) और लद्दाख (बिना विधानसभा वाला) नए केंद्र शासित प्रदेश हो गए। देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी संसद के फैसले अब इस क्षेत्र में भी लागू हो सकेंगे। निहित स्वार्थों की राजनीति और मीडिया में एकपक्षीय बात करने वाले तत्वों को छोड़ दिया जाए तो इसमें दो राय नहीं कि पूरे देश ने अनुच्छेद 370 की फांस निकलने पर हर्ष व्यक्त किया। स्वयं जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हजारों-लाखों लोगों के लिए यह निर्णय राहत की सांस लेकर आया।
जो जम्मू-कश्मीर पांच अगस्त से पहले अबूझ पहेली सरीखा था अब उसके दो अहम पहलू हैं। पहला- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में उस बदलाव का जमीन पर दिखाई देना, जिनकी राह में 370 और 35-ए रोड़े अटका रहे थे। घाटी में हिन्दू, सिख, गुज्जर, बक्करवाल, शिया आदि समुदायों की हालत सुधारना और विकास की मुख्यधारा में इन सबकी भागीदारी सुनिश्चित करना।
दूसरा- इस कदम के बाद अंतरराष्ट्रीय फलक पर गतिविधियों का आकलन करते हुए भारतीय पक्ष की सक्रियता बढ़ना।
पहले बिंदु पर यदि प्रांतीय प्रशासन की दृष्टि से देखा जाए तो लद्दाख और जम्मू-कश्मीर दोनों ही स्थानों से आ रही शांति-व्यवस्था और पुराने घपलों की कलई खुलने की खबरें सकारात्मक बदलाव की पुष्टि कर रही हैं। जम्मू और लद्दाख में तो लोगों ने नई प्रशासनिक व्यवस्था की घोषणा होने के बाद इसके समर्थन में सार्वजनिक रूप से उत्सव-आयोजन किए। अलगाववादी तत्वों की धरपकड़ और भड़काऊ बयान देने वाले नेताओं की नजरबंदी के बावजूद घाटी कुछ सहमी जरूर लगी। फोन-मोबाइल पर शुरुआती पाबंदी से लोग कुछ असहज हुए किन्तु स्थितियों को काबू में रखने के लिए यह अत्यंत असरदार साबित हुई। राज्य सरकार ने अगले कुछ माह में करीब 70 हजार युवाओं को नौकरी देने की योजना तैयार की है। खास बात यह कि इसमें हर गांव के युवकों को मौका देने का प्रयास किया गया है।
पहाड़ी दर्रों और गुफाओं से लोगों को अपने इशारों पर नचाने वाले इस्लामी आतंकी अब बौखलाहट में बिलों से बाहर आ रहे हैं। राज्य के लिए निर्णायक साबित होने वाली इस घड़ी में एक ओर जनता के हितों की बात करने वाली सरकार है और दूसरी ओर सूबे को आतंक के पंजे में जकड़े रखने वाला तंत्र अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। बागवानों की गाढ़ी मेहनत बेकार होने से बचाने के लिए सरकार नाफेड के जरिए सेबों की ड्योढ़े दाम पर खरीद के लिए 8,000 करोड़ रुपए का पैकेज लाई है। दूसरी ओर आतंकी सेब ढुलाई के लिए आने वाले ट्रक ड्राइवरों, दुकान खोलने वाले दुकानदारों, मजदूरों को निशाना बनाने पर उतर आए हैं और अंतत: लोगों की आंखों में खटक रहे हैं।
सचाई यह है कि घाटी में अलगाववाद से सहानुभूति रखने वाला शासकीय तंत्र, छिन्न-भिन्न होने के बाद आतंकवाद का चिराग पूरी तरह बुझने से पहले अंतिम तौर पर भभक रहा है। घाटी डर और हिंसा के माहौल से बाहर निकले, इसके लिए प्रशासनिक सतर्कता और उपद्रवी तत्वों पर सख्ती का दौर कुछ और लंबा चलेगा, इसमें कोई संशय नहीं है।
यदि अंतरराष्ट्रीय फलक की बात करें तो संयुक्त राष्ट्र संघ में इस्लामी राग अलापने के बाद इमरान की तकरीर खुद उनके गले की हड्डी बन गई। जहां विश्व बिरादरी ने उनके भाषण को दूसरे देश की प्रभुसत्ता में दखल और परमाणु युद्ध की धमकी के तौर पर देखा, वहीं उनके देश की कट्टर जमातों ने भारतीय प्रधानमंत्री की सफल कूटनीतिक यात्राओं और इस्लामी देशों से भी समर्थन जुटा लेने के बाद इमरान सरकार के खिलाफ बगावत का मोर्चा खोल दिया। विश्व समुदाय के लिए अब कश्मीर से बड़ा मुद्दा इस्लामी आतंकवाद का है जिसका सरपरस्त पाकिस्तान है और दुनिया जिसके विरोध में कमर कसे खड़ी है। ऐसे में सबसे बड़ी दुविधा चीन जैसे देशों की है, जो अपने आर्थिक-विस्तारवादी कदमों के कारण पाकिस्तान को दुलारते हैं। मगर अपने बगल-बच्चे से लिपटे आतंकवाद के जिन्न की वजह से उसे अपनी गोदी में भी नहीं बैठा सकता। यही कारण है कि वैश्विक आर्थिक कार्यकलापों पर निगरानी रखने वाले कार्यबल (एफएटीएफ) में आतंकियों को पोसने के मुद्दे पर पाकिस्तान के घिरने (और केवल फरवरी, 2020 तक की मोहलत मिलने) से चीन भी अपनी आर्थिक योजनाओं के भविष्य को लेकर भारी उलझन में है।
बहरहाल, बदलते जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की कहानी भारतीय नेतृत्व की दूरदर्शी सोच को रेखांकित करती है। अब यहां न तो स्थानीय स्तर पर कट्टरता के लिए कोई जगह है, न भारत के आंतरिक मामलों को उलझाकर, आतंकवाद की अनदेखी कर नए क्षेत्रीय आर्थिक-भौगोलिक समीकरण गढ़ने की गुंजाइश।