तो इसलिए आरसेप में शामिल नहीं हुआ भारत...
   दिनांक 05-नवंबर-2019
 
भारत सरकार ने रीजनल कांप्रिहेंसिव इकनोमिक पार्टनरशिप में शामिल नहीं होने का फैसला किया है। इस फैसले के गंभीर आर्थिक और राजनीतिक परिणाम हैं। रीजनल कॉम्प्रीहेन्सिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (RCEP) यानी आरसेप समझौता एक ऐसा प्रस्त‍ावित व्यापक व्यापार समझौता है, जिसके लिए आसियान के 10 देशों के अलावा 6 अन्य देश-चीन, भारत, दक्ष‍िण कोरिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच बातचीत चल रही थी। इसके लिए बातचीत साल 2013 से ही चल रही थी। मोटे तौर पर इस आरसेप का उद्देश्य एक एकीकृत बाजार बनाने का था, यानी आरसेप के तमाम सदस्य देशों को एक दूसरे के बाजार में जाने मे आसानी सुनिश्चित की जा सके, ऐसी आरसेप से उम्मीद थी। भारत के अलावा आरसेप में 15 दूसरे देश हैं। जाहिर है, अब समझौते में 15 देश रहेंगे, भारत नहीं रहेगा। यूं भारत के इस समझौते में ना रहने से इस समझौते के आर्थिक और राजनीतिक महत्व में कमी आयेगी फिर भी इस समझौते का अपना अलग महत्व है। अगर भारत आरसेप में शामिल हो जाता तो फिर समग्र तौर पर आर सेप देशों का बाजार इतना बड़ा हो जाता कि दुनिया की लगभग आधी आबादी इन देशों की निवासी होती और ग्लोबल सकल घऱेलू उत्पाद में इसका योगदान एक तिहाई होता।

बाजार है, पर सिर्फ बाजार नहीं
भारत के पास बहुत ब़ड़ा बाजार है, आबादी के मामले में दुनिया का दूसरे नंबर का मुल्क होने के कई फायदे हैं। आबादी मतलब बाजार, जिसमें घुसने के लिए कई देश, कई कंपनियां उत्सुक होंगी, स्वाभाविक है। भारत की सेवा क्षेत्र में महाऱथ है, यानी भारत सेवा क्षेत्र में कई देशों में जाकर निवेश कर सकता है, वहां मुनाफा कर सकती हैं भारतीय कंपनियां।
भारत की समस्या यह है भारत के पास एक मजबूत मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर या निर्माण सेक्टर ऐसा नहीं है जो सस्ती रेट पर बढ़िया आइटम तैयार कर सके। कुल मिलाकर स्थिति ऐसी है कि भारत जिन क्षेत्रों में आरसेप के देशों में जाकर बढ़िया कर सकता है, वहां उसे घुसने की इजाजत नहीं है, पर भारत में घुसने की इजाजत वो तमाम देश और कंपनियां चाहते हैं, जो यहां बेपनाह सस्ते आइटम बेच सकते हैं। चीनी कंपनियां इस सूची में सबसे ऊपर हैं। यहां यह नोट किया जा सकता है कि अब भी जबकि आरसेप समझौता नहीं है, तब भी भारत में बिकने वाले दस स्मार्टफोनों में से करीब सात चाइनीज ब्रांड के हैं। आरसेप जब चाइनीज आइटमों को घुसने की लगभग खुली छूट देगा, तब भारत में बनने वाले आइटमों की हालत क्या होगी, यह सोचा जा सकता है। सच यह है कि अधिकांश व्यापार समझौतों से भारत लाभ नहीं उठा पाया है, वह क्यों नहीं उठा पाया है, यह अलग विश्लेषण का विषय है। एसियान देशों के साथ हुए व्यापार घाटे के आंकड़े देखें, तो साफ होता है कि ग्लोबल कारोबार के मामले में भारत पिट रहा है।
घाटा ही घाटा
2009-10 में एसियान देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा करीब 8 अरब डॉलर का था, यह 2018-19 में बढ़कर 22 अरब डॉलर हो गया। यानी भारत एसियान देशों से लगातार ज्यादा आयात कर रहा है, और निर्यात कम ही कर पा रहा है। आरसेप में मूलत एसियान देश ही शामिल हैं, चीन आरसेप में अतिरिक्त खतरा है। अकेले चीन के साथ पचास अरब डॉलर से ज्यादा का व्यापार घाटा है। आरसेप समझौते का मतलब है कि चीन से तमाम आइटम आना बहुत सस्ता और आसान हो जाएगा। चीन से आनेवाले 80-90 प्रतिशत आइटम सस्ते हा जाएंगे यानी ये सस्ते चाइनीज आइटम घरेलू भारतीय उत्पादों को उस तरह से बाजार से बाहर कर देंगे।
न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया से डेयरी उत्पाद सस्ते आकर भारत के आइटमों के लिए खतरा पैदा करते। देश के बड़े डेयरी संगठन अमूल ने पीएम मोदी को इस बात के लिए धन्यवाद दिया कि उन्होंने देश के दस करोड़ दूध कारोबारियों के हितों की रक्षा की। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड बहुत सस्ते डेयरी उत्पादों से भारत को पाटने क्षमता रखते हैं, अगर आरसेप समझौता हो जाता तो।
टैक्सटाइल, रसायन, प्लास्टिक के कारोबार के लोगों की भी यही चिंता है कि सस्ते चीनी आइटम कहीं भारतीय अर्थव्यवस्था को तबाह ना कर दें। चीन सस्ते आइटम बेचता है और तमाम वजहों से बेचता है। पर चीन अपने यहां आसानी से विदेशी कंपनियों को इजाजत नहीं देता, तमाम चीनी ब्रांड के फोन यहां बिक सकते हैं, पर भारत की टेलीकाम कंपनियों को व्यापक और सस्ती सेवाएं बेचने की इजाजत चीन नहीं देगा। यानी चीन एक हद तो मुक्त व्यापार का समर्थक है, पर एक हद के बाद वह कतई तानाशाह देश की तरह बरताव करता है।
दम-खम बढ़ाना जरूरी
हाल में प्रख्यात अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला की अध्यक्षता में एक रिपोर्ट आयी है इस विषय पर कि निर्यात कैसे बढ़ायें। इसमें सुरजीत भल्ला की सिफारिशों का एक आशय यह भी है पहले हमें अपना घर दुरुस्त करना होगा। तमाम तरह के ग्लोबल समूह बन रहे हैं,जो आपस में व्यापार कर रहे हैं। हम लंबे समय तक अपने कारोबारियों को यह कहकर नहीं बचा सकते कि अभी हमारेवाले तैयार नहीं हैं, उनकी लागत महंगी है। उनकी क्वालिटी बढ़िया नहीं है। आरसेप में ना शामिल होना राष्ट्रहित का फैसला है, पर कंपनियों को बेहतर ना बनाना, उन पर बेहतर बनने का दबाव ना डालना कतई राष्ट्रहित का फैसला नहीं है। आरसेप एक दोधारी तलवार है, इसके पास जाना खतरनाक है, पर इसके मुकाबले के लिए लंबे वक्त तक तैयारी भी न करना भी खतरनाक है। खुली अर्थव्यवस्था में खुले होने की बहुत चुनौतियां होती हैं। इन चुनौतियों को झेलना ही होगा।