शिव और शक्ति की धरा कश्मीर में तोड़े गए सैकड़ों मंदिर
   दिनांक 06-नवंबर-2019
दीपिका भान
कश्मीर घाटी में अब भी सैकड़ों मंदिर हैं। पिछले 70 साल में इन मंदिरों के अवशेषों को मिटाने की पूरी कोशिश की गई। अनुच्छेद 370 और 35ए की विदाई के बाद उन मंदिरों को सहेजने का काम किया जाना चाहिए

                           अनंतनाग स्थित मार्तण्ड सूर्य मंदिर, जो अब खण्डहर में बदल गया है
 
जम्मू-कश्मीर में बीते 30 साल आतंकवाद ने जमकर हिन्दू और कश्मीर की हिन्दू पहचान पर कुठाराघात किया। इस कारण यहां के हजारों साल के इतिहास को नजरअंदाज कर दिया गया है। जबकि कश्मीर सिर्फ पिछले 30 साल की कहानी नहीं है और न ही 70 साल की। घाटी के कई हिस्सों में बिखरे हुए इतिहास के अवशेष यह बात सिद्ध करते हैं कि इस जगह की कहानी बेहद प्राचीन और गौरवमय है। लेकिन इस इतिहास को नष्ट और नजरअंदाज करने की कोशिश लगातार हो रही है।
कश्मीर में इस तरह की धारणा बनाने की कोशिश की जाती रही जिससे कि घाटी के हिंदू इतिहास को नकारा जाए और सिर्फ इस्लाम का वर्चस्व रह जाए। इसी योजना के तहत घाटी के मूल निवासी कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया गया और पूरे समुदाय को घाटी से निकाल दिया गया। कारण यह था कि कश्मीरी पंडित घाटी के 5,000 साल पुराने इतिहास के वंशज हैं। उनके मंदिर, जीवनशैली और संस्कृति असली कश्मीर को दर्शाती है।
कश्मीर में इस्लाम 13वीं शताब्दी में आया और उसने बलपूर्वक लोगों का कन्वर्जन कराया। कई मंदिर तोड़े गए और हजारों साल की संस्कृति को नष्ट करने के लिए मुस्लिम हमलावरों ने कोई कसर न छोड़ी। अत्याचारी और विनाशकारी नीति के बावजूद मुस्लिम शासक कश्मीर के इतिसास को पूरी तरह से नष्ट नहीं कर पाए।
आज भी कश्मीर में हजारों साल पुरानी धरोहर मौजूद हैं, जिसके बारे में देश बहुत कम जानता है। घाटी में इस्लामवादी हुकूमतों के रहते गुलमर्ग, पहलगाम, सोनमर्ग, डल झील और मुगल बागानों के अलावा किसी अन्य जगह को कभी भी महत्व नहीं दिया गया। अमरनाथ यात्रा को छोड़कर कश्मीरी पंडितों के अन्य धार्मिक स्थानों को महत्व नहीं दिया गया। यहां तक कि हजारों साल पुराने मंदिरों के रखरखाव के लिए कुछ भी नहीं किया गया। अनुच्छेद 370 की आड़ में यहां भारतीय पुरातत्व विभाग को काम नहीं करने दिया गया। बाकी कसर आतंकवाद ने पूरी कर दी।
आतंकवाद के कारण कश्मीर घाटी इस्लाम का अखाड़ा बना दी गई, लेकिन वास्तव में वह महान राजा ललितादित्य (राज्यकाल 724-761 ई.) की भूमि है। इस हिंदू राजा ने अरबी और तुर्क आक्रमणकारियों को छठी के दूध की याद दिलाई थी। कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ में इनके पराक्रम का बखान किया गया है। ललितादित्य ने कश्मीर में कई अद्भुत मंदिर बनवाए, जिनके अवशेष आज भी घाटी में हैं। मार्तण्ड सूर्य मंदिर कश्मीर के अनंतनाग में स्थित है। यह मंदिर भगवान सूर्य को समर्पित है। इन्होंने ही गांदरबल जिले में स्थित वांगथ मंदिरों का निर्माण कराया था। यहां लगभग 200 मीटर की दूरी पर एक-दूसरे की तरफ मुख किए हुए कई मंदिरों का एक समूह है, जो भगवान शिव को समर्पित है। पर हमलावरों और समय ने इन मंदिरों को खण्डहर में तब्दील कर दिया है। दुर्भाग्य की बात है कि जम्मू-कश्मीर में इस महान महाराजा की कोई चर्चा नहीं होती और न ही देश को इस वीर पुत्र के बारे में कोई खास जानकारी है।
जिस तरह से महाराजा ललितादित्य को कश्मीर और देश के इतिहास में कोई खास स्थान नहीं मिला, उसी तरह से कश्मीर की अंतिम हिंदू शासक कोटा रानी की भी इतिहासकारों ने उपेक्षा की है। जबकि 14वीं शताब्दी में कोटा रानी ने अपनी अंतिम सांस तक घाटी को इस्लामी आक्रमणकारियों से बचाने का प्रयास किया था।
कश्मीर में ऐसे कई मंदिर हैं, जिनकी कहानियां अद्भुत हैं। एक प्राचीन कहानी के अनुसार कश्यप ऋषि ने सतीसर से पानी निकाला था, लेकिन कुछ हिस्से में गहरा जल जमाव बना रहा। इस झील में जलोद्भव नाम के एक राक्षस ने आश्रय लिया। उसने अपने आतंक से निवासियों का जीना दूभर कर दिया था। निराशा से भरे लोगों ने देवी दुर्गा से सहायता के लिए प्रार्थना की। राजतरंगिणी के अनुसार, मां दुर्गा ने अपने भक्तों की पुकार सुनी और एक पक्षी का रूप धारण कर अपनी चोंच में एक कंकड़ लिया और इसे झील पर गिरा दिया। कंकड़ आकार में बढ़ गया और उसने एक पहाड़ी का रूप लिया जिससे राक्षस कुचला गया। इस प्रकार बनी पहाड़ी को हरि पर्वत या शरिका पर्वत का नाम मिला और इस प्रकरण से कश्मीर अस्तित्व में आ गया। इस पहाड़ी पर स्थित प्राचीन मंदिर माता देवी का निवास स्थान है जिससे चक्रेश्वरी या शारिका भगवती के नाम से जाना जाता है।
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार 4,000 साल पहले देवी मां ने श्रीलंका से आकर कश्मीर के तुलमुल में एक नया निवास पाया था। पौराणिक कथा के अनुसार, एक कश्मीरी कृष्ण पंडित को सपने में देवी मां ने इस पवित्र स्थान के बारे में बताया। कहा जाता है कि इस मंदिर की खोज में कृष्ण पंडित की मदद एक सांप ने की थी। कल्हण की राजतरंगिणी और अबुल फजल के अकबरनामा में तुलमुल में स्थित खीरभवानी के मंदिर का जिक्र किया गया है। 1898 में स्वामी विवेकानंद तुलमुल मंदिर में दर्शन के लिए आए थे। उन्होंने बाद में अपने भक्तों को बताया कि उन्हें यहां पर एक अलौकिक अनुभूति हुई।
घाटी के अधिकतर लोग शिव और शक्ति-पूजक माने जाते हैं। आदि शंकराचार्य ने घाटी में आकर शक्ति पंथ (देवी की महानता) को स्वीकार कर लिया और शक्ति की उपासना में ‘सौंदार्यलहरी’ लिखी। भारत की ज्ञान-परंपरा में कश्मीर का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। शारदापीठ, जो पाकिस्तान अधिक्रांत कश्मीर में स्थित है, संपूर्ण भारत की ‘सर्वज्ञ पीठ’ मानी जाती है। कश्मीर ने आचार्य अभिनवगुप्त, वसुगुप्त, कल्हण, बीलहण, लल्लेश्वरी, रूपाभवानी समेत अनेक महान, आध्यात्मिक व्यक्तित्व कश्मीर ने देश को दिए हैं, लेकिन इन सबका आधुनिक इतिहास में कोई खास उल्लेख नहीं है। कश्मीर में शैवदर्शन, शक्तिदर्शन, तांत्रिक, बौद्ध जैसी परंपराओं का संगम रहा है। देश को शारदा लिपि दी, लेकिन आज यह लिपि लुप्त होने के कगार पर है।
पिछले 70 साल में कश्मीर में हिंदू परंपरा को नकारने के लिए हरसंभव कदम उठाए गए। अनुच्छेद 370 की आड़ में घाटी की संस्कृति को नष्ट करने की कोशिश की गई। कश्मीर में आज भी ज्यादातर नगरों और गांवों के नाम संस्कृत में हैं, लेकिन पाकिसतान परस्त अलगाववादियों ने इन नामों को मुस्लिम नामों में बदलने की पूरी कोशिश की। जैसे कि दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग को अब ‘इस्लामाबाद’ कहा जाने लगा, शंकराचार्य पहाड़ी को ‘सुलेमानटेंग’ का नाम देने की कोशिश की गई। आतंकवाद के द्वारा घाटी में संस्कृति और हिंदू परंपरा को नष्ट करने की पूरी कोशिश की गई। इस प्राचीन परंपरा को संजोए रखने वाले कश्मीरी पंडित समुदाय को ही घाटी से निकाल दिया। घाटी से बाहर अपनी परंपरा को बचाए रखने की चुनौती इस समुदाय के सामने है। लेकिन वक्त बदलने के बाद अब एक आस जगी है। लगने लगा है कि मजहबी जिहाद में रौंदा गया कश्मीर फिर से अपनी हिन्दू पहचान के साथ उभरेगा।