नागरिकता संशोधन बिल पर फैलाई जा रही झूठी अफवाह ...
   दिनांक 12-दिसंबर-2019
70 सालों बाद लाखों पीड़ितों के साथ न्याय हुआ. नागरिकता संशोधन बिल दोनों सदनों में पारित हो गया, लेकिन छद्म सेकुलर नेता, वामपंथी बुद्धिजीवी और लेफ्टिस्ट पत्रकार इसे लेकर अब भी लोगों के बीच एक एजेंडे के तहत अफवाह फैलाने में लगे हैं

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वास्तव में वो सच्चे फासिस्ट हैं, पर स्वीकार नहीं करते. अपने विरोधियों को हिटलर, नाजीवादी और फासिस्ट कहने वाला एक समूह है, जो वास्तव में हिटलर के प्रोपेगैंडा मंत्री गोयबल्स का पक्का चेला है. गोयबल्स ने कहा था कि एक झूठ को सौ बार बोलो तो वो सच हो जाता है. अभी चर्चा है नागरिकता संशोधन बिल की, और इसी सीख के तहत सारी बातों के साफ़ होते हुए भी बिल के बारे में असत्य बोला जा रहा है. जैसे कि ये बिल मुसलमानों के खिलाफ है, या संविधान के खिलाफ है.
गोयबल्स के चेले
यह बिल भारत के नागरिकों के बारे में है ही नहीं. तो भारत के मुसलमानों या किसी अन्य नागरिक के खिलाफ कैसे हो सकता है? यह तो भारत में आए उन शरणार्थियों के बारे में है, जो भारत के पड़ोसी मुस्लिम देशों में इस्लाम के नाम पर सताए जा रहे हैं, और भारत के नागरिक बनना चाहते हैं. यह बिल संविधान के अनुरूप है, और कहीं भी संविधान का उल्लघंन नहीं करता. पाकिस्तान, बंग्लादेश और अफगानिस्तान में जिन भारतीय मूल के लोगों को हिंदू, सिख, बौद्ध या ईसाई होने के कारण सताया, प्रताड़ित किया या मिटाया जा रहा है, और वो शरण लेने भारत आ रहे हैं, तो उन्हें अपनाने का संविधान कतई विरोध नहीं करता. लेकिन ‘सेकुलर’ नेता, चंद बुद्धिजीवी और कुछ पत्रकार बेबुनियाद बातों को बोले चले जाते हैं.
सच की सुपारी लेकर निकले ये पत्रकार...
बिल पारित होने के बाद वामपंथी झुकाव वाले एक हिन्दी चैनल के एक एंकर, जो अंध मोदी विरोध के लिए काफी नाम कमा चुके हैं, ने इस बिल पर प्राइम टाइम शो किया. शुरुआत उन्होंने की हिटलर और उसके द्वारा लाखों यहूदियों की हत्या की चर्चा से. बताया कि कैसे लाखों यहूदियों को गैस चैम्बर्स में दम घोंटकर मारा जाता था. इस उदाहरण का नागरिकता संशोधन विधेयक से क्या लेना-देना था? क्या ये देश के मुस्लिमों को बरगलाने, उनमें भय पैदा करने की सोची-समझी साज़िश थी? ईमानदारी तो तब थी जब ये सहाफी पाकिस्तान और बंग्लादेश के बंद कट्टर समाजों में दम घोंटकर मारे जा रहे हिंदुओं, सिखों, बौद्धों की बात करते. उन मासूम बच्चियों की बात करते जिन्हें उनकी मां की गोद से छीनकर जबरन निकाह पढ़ा दिया जाता है. हिटलर के गैस चैंबर का उदाहरण उन्हें इन निर्दोष पीड़ितों के लिए कभी याद नहीं आया. उन्हें हिटलर याद आया जब इन पीड़ितों को भारत सरकार ने न्याय दिलाया. पाखंड की इससे ऊंची मिसाल ढूंढना मुश्किल है.
विद्वानों सी मंद मुस्कराहट लेकर अपने लचर तर्क पेश करते हुए इन महोदय ने पूछा कि क्या ये बिल इसलिए लाया गया “ताकि गन्ना किसानों की ख़बरें न चले, जेएनयू छात्रों की ख़बरें न चलें..?” एंकर महोदय ये भूल गए कि यह विधेयक लाने का फैसला कोई रातों-रात नहीं हुआ है. प्रचंड बहुमत से जीतकर आई मोदी सरकार के घोषणा पत्र में इस विधेयक का वादा था. अपने ‘प्राइम टाइम’ के दौरान ये महाशय बार-बार शरणार्थी और घुसपैठियों के बीच की रेखा को धुंधला करने का प्रयास करते रहे. भारत में आने वाले अवैध घुसपैठियों की तुलना सारी दुनिया में अपना योगदान दे रहे प्रवासी भारतीयों से कर डाली.
अफवाह गढ़ने की पत्रकारिता
फिर ये साहब बोले कि अमित शाह ने कहा कि “क्या हम पाकिस्तान बंग्लादेश से आने वाले मुसलमानों को भी नागरिकता दे दें... लेकिन अमित शाह ने ही संसद में कहा कि 566 मुसलमानों को मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत की नागरिकता दी गई.” पूरी बात को पेश इस तरह से किया गया जैसे कि अमित शाह ने कोई झूठ बोला हो. वास्तविकता यह है कि अमित शाह ने उन 566 मुसलमानों की बात की है जिन्होंने वीज़ा-पासपोर्ट आदि के साथ विधिवत रूप से भारत सरकार से नागरिकता की मांग की थी, जैसे कि प्रसिद्ध गायक अदनान सामी ने. जबकि नागरिकता संशोधन बिला लाया गया है उन हिंदू, सिख आदि के लिए जो बिना वैध कागजों के किसी तरह भागकर भारत आए हैं.
इसी झूठ को उन्होंने दूसरी तरह से पेश करते हुए कहा कि “गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने कहा है कि 1595 पाकिस्तानी नागरिकों को नागरिकता दी गई है. तो जब पहले से पाकिस्तानी नागरिकों को नागरिकता देने का प्रावधान है तो यह बिल क्यों लाया गया?” जवाब वही है. ये 1595 पाकिस्तानी नागरिक दस्तावेजों के साथ भारत आए थे, नागरिकता मांगी थी. लेकिन लाखों दूसरे पाकिस्तानी या बंगलादेशी हिंदू शरणार्थी इतने साधन संपन्न नहीं हैं. वो बेहद गरीब लोग हैं. छिपकर, जान बचाते हुए आए हैं.
इसी कार्यक्रम में आगे विदेश मंत्री बंग्लादेश यानी अबुल कलाम अब्दुल मोमिन को उद्धृत किया गया कि वो भारत सरकार से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि “बंग्लादेश में बड़ा सांप्रदायिक सौहार्द्र है यहां सब बराबर हैं...” क्या बंग्लादेश का विदेशमंत्री इस बात को स्वीकार करेगा कि उनके यहां अल्पसंख्यकों को सताया जा रहा है ? सच तो वो आंकड़े बताते हैं जिनके अनुसार बंग्लादेश में पिछले 70 सालों में हिंदू आबादी में 60 प्रतिशत की कमी आ गई है.
पर वो तो सेकुलर पत्रकार हैं. उन्हें इससे क्या. वो तो दिल की तड़प छिपा न सके और बोले कि “ नानावती कमीशन ने गुजरात दंगों में मोदी जी को क्लीन चिट दे दी है. जर्मनी आज तक नाजियों को खोजकर सजा दे रहा है, और हमारे यहां क्लीन चिट दी जा रही है.” गोयबल्स के चेलों की यही पहचान है. यूपीए सरकार के अंतर्गत सीबीआई पूछताछ, उच्च न्यायालय की क्लीन चिट, नानावती कमीशन की क्लीन चिट, गुजरात के मुस्लिम बहुल इलाकों से भी भाजपा को चुनावों में अच्छा वोट मिलना... इस सब के बाद भी वो कुछ नहीं मानेंगे... दोहराए चले जाएंगे. नाज़ीवादी, फासिस्ट चिल्लाते रहेंगे . शान से झूठ बोलेेंगे . इनकी सोच, उनका झुकाव एकदम साफ़ है. बिल पारित होने पर ठंडी आह के साथ बोले “अब तो क़ानून बन गया है, जब 370 पर क़ानून वापस नहीं लिया तो इस पर क्या लिया जाएगा “
एक अन्य पत्रकार बरखा दत्त ने जब ट्वीट किया कि यह बिल हमें पाकिस्तान की तरह (कट्टरपंथी)बनाता है, तो तारेक फतह ने जवाब दिया कि आज तक भारत से कोई भी अल्पसंख्यक धार्मिक उत्पीड़न के कारण भागकर पाकिस्तान नहीं गया.
नासमझी का दिखावा करते नेता
जो किसी बात को नहीं समझ रहा हो उसे समझाया जा सकता है, लेकिन जो न समझने का दिखावा कर रहा हो, उसे नहीं. कांग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद ने पूछा कि सिर्फ चार हजार ने शरणार्थियों ने आवेदन दिया है तो करोड़ों की संख्या कहाँ से आ रही है? गुलाम साहब अमित शाह के उस बयान का हवाला दे रहे थे कि इस बिल को लाने से लाखों-करोड़ों को राहत मिलेगी. तथ्य यह है कि चार हजार शरणार्थी वो हैं, जिनके पास नागरिकता के लिए आवेदन देने के लिए वैध दस्तावेज थे. उन्हें (पुराने क़ानून के अनुसार) देश में रहते 11 साल हो गए थे.
कपिल सिब्बल बोले कि “ आप कैसे तय करोगे कि कौन उत्पीड़न के कारण यहां आया है. जो आए हैं उन लोगों ने कभी नहीं कहा कि उनका उत्पीड़न हुआ है.” ये वही कपिल सिब्बल हैं जो यूपीए के दिनों में देश को समझा रहे थे कि न तो कोयला घोटाला हुआ है और न ही 2जी घोटाला. ये सब मन की कल्पना है.
अमित शाह ने सिब्बल को जवाब दिया कि “बंगाल जाइए, असम जाइए उन लोगों से मिलिए, (उत्पीड़न की) कहानियां हैं. दुनियाभर के अखबारों में, हमारे यहां के अखबारों में छपा है. मानवाधिकार संगठनों की कई रिपोर्ट हैं. दिल्ली में (आदर्श नगर में) अफगानिस्तान से आए 21 हजार सिख रहते हैं...” जब विपक्ष में से किसी ने टोका कि आपको कैसे पता चला (कि वो उत्पीड़ित है ?) तो शाह ने तपाक से उत्तर दिया क्योंकि हमारे आंख-कान खुले हैं. वोट बैंक की राजनीति ने हमा
रे आंख-कान बंद नहीं किए. इसलिए हमें मालूम पड़ता है.
पर कपिल सिब्बल के पास अपनी पार्टी की तय लीक थी. वो नागरिकता संशोधन विधेयक को सांप्रदायिक बताते रहे और अंत में इसे तीन तलाक़, 370 और लव जिहाद से इसे जोड़ने लगे.
उन्हें कुछ तो बोलना था...
लालू यादव का गुणगान करते हुए उनकी पार्टी के मनोज झा खड़े हुए. बिल के विरोध में उन्होंने तर्क दिया कि “ हमने कहा था कि आप धार्मिक अल्पसंख्यक मत बोलो. उत्पीड़ित अल्पसंख्यक बोलो, हमारी बात को दरकिनार कर दिया गया..” ये इतना बेसर-पैर का तर्क है, कि विरोध में सिर्फ कुछ बोलने की गरज से बोला गया लगता है. क्या सरकार ऐसा क़ानून बनाए कि पाकिस्तान से आया हिंदू पहले अपने उत्पीड़न के सबूत पेश करे ? क्या मांगेगे उससे, बलात्कार का सबूत ? पाकिस्तान पुलिस द्वारा लिखी गई एफआईआर की प्रति ? इमरान खान का दिया हुआ सर्टिफिकेट ? और उसके साथ वहां की सरकार ने न्याय नहीं किया इसका सबूत कौन देगा? वहाँ की सरकार ? या जनरल बाजवा ? झा आगे बोले “आपने बिल में नास्तिकों के लिए कोई व्यवस्था ही नहीं की है..” कितने लोग हैं जो स्वयं को नास्तिक कहते हैं, और इस आधार पर प्रताड़ित होते हैं ? पाकिस्तान या बंग्लादेश में जिसका नाम हिंदू या सिख है वो प्रताड़ित होता है, फिर भले ही वो नास्तिक हो.
पूर्वोत्तर को सुलगाने की साज़िश
नागरिकता संशोधन बिल को लेकर पूर्वोत्तर के लोगों में अफवाह फैलाई जा रही है. उनकी अपनी कुछ पुरानी समस्याएं और मांगें है. उनको भी इस विधेयक में स्पष्ट किया गया है कि असम समेत सारे पूर्वोत्तर को दिए गए संरक्षण को आगे बढाते हुए शिड्यूल 6 में इन सातों राज्यों को नोटीफाइड किया गया है. जनजातीय इलाकों में ये क़ानून लागू नहीं होगा. इसी तरह बंगाल पूर्वी सीमा नियमन क़ानून 1973 के तहत इनर लाइनपरमिट के इलाके यानी मिजोरम, अरुणाचल, अधिकांश नागालैण्ड और मणिपुर में भी ये प्रावधान लागू नहीं होंगे. 1985 के केंद्र सरकार व असम के बीच तय हुए असम एकॉर्ड के क्लॉज़ 6 के तहत असम की मांगों के लिए गठित समिति से बात करके असम वासियों की सभी आशंकाओं का समाधान किया जाएगा, उपाय किये जाएंगे. (1985 में राजीव गांधी ने ये वादा तो कर दिया था, असम के लोग बहुत खुश भी हुए, लेकिन राजीव ने यह समिति कभी नहीं बनाई, 35 साल बाद मोदी सरकार ने यह समिति गठित करवाई, जिसमें असम के सभी वर्गों को जोड़ा, उन संगठनों असम गण परिषद और आसू को भी जिसने असम में ये सारा आन्दोलन चलाया था). लेकिन एक वर्ग वहां पर प्रायोजित प्रदर्शन कर रहा है, जिन्हें एक प्रचार तंत्र द्वारा मीडिया में प्रचारित किया जा रहा है. बिल के विरोध में बोलने वाले अन्य नेता ‘ असंवैधानिक’ और ‘ मुस्लिम विरोधी’ जैसे शब्द दोहराते रहे.
‘नागरिकता’ का जन्म
इस बीच.... दिल्ली के मजनू का टीला इलाके के पाकिस्तानी हिंदुओं का एक शरणार्थी कैम्प है. यहां 10 दिसंबर को एक कन्या का जन्म हुआ. 11 तारीख को जब ये बिल पारित होने को था, तो उसके मां-बाप ने उसका नाम ‘नागरिकता’ रखा. प्रफुल्लित मां ने कहा कि ये भारत की बेटी है. मजनू का टीला में इन शरणार्थियों ने नाच गाकर, ढोल बजाकर नागरिकता संशोधन विधेयक का उत्सव मनाया. उनके लिए ये दिन जिंदगी का सबसे बड़ा त्यौहार बनकर आया है.