अब देश मांगे समान नागरिक संहिता
   दिनांक 12-दिसंबर-2019
सभी को बांधने वाला सूत्र एक हो. यह सूत्र यहीं का हो. मक्का-मदीना या रोम का सूत्र यहां नहीं चलेगा. असल में कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिंदू मुसलमान में बांटा. जबकि किसी भी धर्म को कानून से ऊपर उठकर फैसले कर देने का मतलब सांप्रदायिकता है. असल में धर्मनिरपेक्ष विचार का तकाजा है कि सभी के लिए समान कानून हो

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तीन तलाक, अनुच्छेद 370 की समाप्ति और नागरिकता संशोधन कानून. शायद ही किसी सरकार ने इतनी तेज रफ्तार के साथ अपने चुनावी घोषणापत्र को अमली जामा पहनाया हो. जिस दृढ़ता के साथ नरेंद्र मोदी सरकार आगे बढ़ रही है, देश की आकांक्षा अब समान नागरिक संहिता की है. यह देश मजहबी आधार बने पर्सनल कानूनों से पीड़ित है. उच्चतम न्यायालय भी एकाधिक मौकों पर सरकार से समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए कह चुका है. यह ऐसा विचार है, जो संविधान में तो है, लेकिन तुष्टिकरण और मुस्लिम परस्ती की राजनीतिक सोच ने इसे साकार नहीं होने दिया.
संविधान सभा में बाबासाहेब डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने भरसक कोशिश की कि समान नागरिक संहिता लागू हो जाए. लेकिन उन्हें मुस्लिम प्रतिनिधियों का सबसे मुखर विरोध झेलना पड़ा. मजहब के आधार पर विभाजित देश में मुस्लिम प्रतिनिधि इस जिद पर अड़े थे कि वे तो शरियत से हिसाब से अपने मसले सुलझाएंगे. आंबेडकर ने कहा- मुझे निजी तौर पर ये बात समझ नहीं आती कि मजहब को इतना व्यापक और मंहगा क्षेत्राधिकार कैसे दिया जा सकता है कि किसी का पूरा जीवन उससे संचालित हो और विधायिका को उसमें अतिक्रमण का अधिकार तक न हो. आखिर स्वतंत्रता से हमें हासिल क्या हुआ. हमें स्वतंत्रता का इस्तेमाल अपने सामाजिक ढांचे को सुधारने में करना चाहिए. जो कि तमाम किस्म की असमानता, भेदभाव और इसी तरह की चीजों से भरा पड़ा है. ये सब हमारे मूलभूत अधिकारों का हनन है. लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की नीयत कभी भी समान नागरिक आचार संहिता के पक्ष में नहीं थी. तमाम मसलों की तरह इस पर भी उन्होंने आंबेडकर के सामने हाथ झाड़ लिए.
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का भी यही मत था. उनका विचार था कि भारत के एकीकरण का एक महत्वपूर्ण पहलू है कि देश के नागरिक धर्म से ऊपर उठकर एक कानून से बंधे हों. उनका कहना था कि सभी को बांधने वाला सूत्र एक हो. यह सूत्र यही का हो. मक्का-मदीना या रोम का सूत्र यहां नहीं चलेगा. असल में कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिंदू मुसलमान में बांटा. जबकि किसी भी धर्म को कानून से ऊपर उठकर फैसले कर देने का मतलब सांप्रदायिकता है. असल में धर्मनिरपेक्ष विचार का तकाजा है कि सभी धर्मों के लिए समान कानून हो.
संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 में स्पष्ट कहा है कि देश को पूरे भारत में सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने की दिशा में कार्य करना चाहिए. संविधान सभा में भी इस पर चर्चा के दौरान सबसे मुखर विरोध मुस्लिम सदस्यों ने किया. हुसैन इमाम, बी. पोकर. महबूब अली बेग, मोहम्मद इस्माइल, नजीरुद्दीन अहमद ने जोर दिया कि विवाद और उत्तराधिकार के मामलों को कुरान और शरीयत के हिसाब से ही तय होना चाहिए. ये एक रहस्य नहीं है कि तमाम मुस्लिम रहनुमा विवाह और उत्तराधिकार जैसे मसलों पर अलग कोना बचाकर क्यों रखना चाहते थे. इन दोनों ही मसलों में पर्सनल लॉ के नाम पर महिलाओं के साथ भारी भेदभाव और अत्याचार होता है.
मुस्लिम पक्ष की ओर से बार-बार धार्मिक मसलों में दखलंदाजी की बात कही जाती है. पर्सनल लॉ को लेकर भी यही दलील है. जबकि 1954 में ही सुप्रीम कोर्ट यह तय कर चुका है कि अनुच्छेद 25 और 26 के तहत दी गई धार्मिक और मजहबी आजादी का मतलब ये नहीं है कि यह कानूनों से ऊपर उठकर है. शाहबानो केस हो या सायराबानो केस, सुप्रीम कोर्ट समान नागरिक संहिता की जरूरत बता चुका है. इसलिए कि पर्सनल लॉ संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन कर रहे हैं. समान नागरिक संहिता के विषय में इतना दुष्प्रचार फैलाया जा चुका है कि मुसलमानों को इसका सही अर्थ ही नहीं पता है. समान नागरिक संहिता सेक्युलर मामलों में सबके लिए समान कानून की बात करती है. इसका किसी की धार्मिक आजादी से कोई लेना देना नहीं है. हिंदू हो या मुस्लिम, समान नागरिक संहिता लागू होने की सूरत में अपने धार्मिक कार्यकलाप निर्बाध रूप से जारी रखेंगे.
समान नागरिक संहिता की जरूरत क्यों है. जरा मुजफ्फरनगर की इमराना का मामला देखिए. 2005 में इमराना के 69 वर्षीय ससुर ने उसके साथ बलात्कार किया. मुस्लिम पंचायत बैठी. फैसला हुआ कि पति के साथ इमराना की शादी खारिज की जाती है. वह ससुर की पत्नी बनकर रहेगी. इस समय देश में हिंदू मैरिज एक्ट, मुस्लिम पर्सनल लॉ, इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट, पारसी मैरिज एंड डाइवोर्स एक्ट जैसे अलग-अलग कानून लागू हैं. क्या कोई सभ्य समाज शादी और विरासत जैसे मसलों पर अलग-अलग धर्म के हिसाब से व्यवस्था की हिमायत कर सकता है.
समान नागरिक संहिता न होने से संविधान में विरोधाभासी स्थिति है. अनुच्छेद 14 नागरिकों को कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है. क्या पर्सनल लॉ एक जैसे मसलों पर समान कानून की सुरक्षा नागरिकों को दे पा रहे हैं. नहीं. अनुच्छेद 15 कहता है कि देश में किसी नागरिक से धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव नहीं होगा. क्या ये पर्सनल लॉ भेदभाव नहीं है. जी हां. ये भेदभाव है. इन पर्सनल कानूनों के कारण असमानता इस कदर पसरी है कि सुप्रीम कोर्ट को इंडियन सक्सेशन एक्ट के अनुच्छेद 118 को रद करना पड़ा. एक अन्य मामले में अदालत को कहना पड़ा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और ये निहायत जरूरी है कि धर्म को कानून से अलग रखा जाए. लेकिन सांप्रदायिकता के बीज के रूप में ये पर्सनल लॉ संविधान की आकांक्षा को पूरा नहीं होने दे रहे हैं.
समान नागरिक संहिता ऐसा विचार है, जिसका समय आ चुका है. भारत जैसे देश में, जहां राजनीतिक दल छोटे-छोटे हितों के लिए पाले और विचार बदल लेते हैं, वहां सर्वसम्मति की बात करना बेमानी है. समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दे पर तो सर्वसम्मति का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि मुस्लिम तुष्टिकरण की दूकान बंद हो जाएगी. यह सरकार दिखा रही है कि जो सही है, वह किया जाएगा. अनुच्छेद 370 एक झटके में खत्म हो गया. तीन तलाक जैसी बुराई समाप्त हो गई. दरबदर शरणार्थी हिंदुओं के जीवन में नागरिक संशोधन कानून नया उजाला लेकर आया है. अब सबकी आंखें नरेंद्र मोदी सरकार पर लगी हैं. समान नागरिक संहिता को लेकर भी नरेंद्र मोदी सरकार को उसी दृढ़ता से आगे बढ़ना चाहिए.