मुसलमान जहां बहुसंख्यक हुए वहां उन्हें अलग देश चाहिए होता है रोहिंग्या ऐसे ही हैं
   दिनांक 12-दिसंबर-2019
 
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रोहिंग्या और अवैध घुसपैठियों के खिलाफ प्रदर्शन का एक फोटो (फाइल फोटो )
 
शांतिप्रिय बौद्ध भिक्षु म्यांमार में हिंसक क्यों हो गए? इस सवाल का जवाब आज भी अनसुलझा है। म्यांमार में जो कुछ हुआ उसके बाद शुरू हुई बहस का अब तक अंत नहीं हुआ। वह बहस लगातार जारी है। बात सिर्फ म्यांमार तक सीमित होती तो इस विषय पर विमर्श की दिशा कुछ और हो सकती थी लेकिन बौद्ध भिक्षुओं पर हमला और हिंसक होने का व्यवहार चीन, श्रीलंका, थाइलैंड तक में दिखा। यह संयोग है कि इन सभी देशों में शांतिप्रिय बौद्ध भिक्षुओं का संघर्ष जिस एक समुदाय से है, वह सभी मुसलमान हैं। अब सवाल यह है कि सभी देशों में शांतिप्रिय बौद्ध धर्म के अनुयायियों के साथ लड़ने वाले मुसलमान ही क्यों हैं?
वर्ष 2001 में अफगानिस्तान में बामियान की ऐतिहासिक बुद्ध प्रतिमाओं पर हमला करते हुए तालिबान ने कभी नहीं सोचा होगा कि उनकी यह हरकत बौद्ध भिक्षुओं के बीच मुसलमानों को देखने की उनकी दृष्टि बदल देगी। एक संभावना यह भी है कि इसके चलते ही म्यांमार, श्रीलंका और थाईलैंड में हालात बदल गए और बौद्ध मतावलम्बियों का मुसलमानों को देखने का नजरिया भी बदला। लेकिन यह बात इतनी भी सरल नहीं है।
श्रीलंका के बौद्ध धर्मगुरू दिलांथा विथानागे ने इस्लामी आतंक से चिन्तित होकर, श्रीलंका में बौद्धों पर मंडराते इस्लामी कन्वर्जन के खतरे को देखते हुए अपनी राष्ट्रवादी सेना बनाई। जिसका उन्होंने नाम रखा— बोदु बाल सेना (बीबीएस)। धर्मगुरू दिलांथा विथानागे मानते हैं कि ''मुसलमानों ने श्रीलंका में कन्वर्जन का कुचक्र चला रखा है।''
जिस खतरे की पहचान पिछले कुछ समय से भारत में लव जिहाद के नाम से की गई है, वह खतरा भारत तक सीमित नहीं है। यह बात धर्मगुरु दिलांथा विथानागे के इस कथन से स्पष्ट हो जाता है कि — ''मुसलमान समुदाय के लोग श्रीलंका में बौद्ध महिलाओं से विवाह करते हैं, विवाह के पश्चात उनके साथ बलात्कार करते हैं और फिर वे बौद्धों की भूमि भी हड़पने का प्रयास भी करते हैं। श्रीलंका में उन्होंने ऐसी बहुत सारी जमीन हड़प भी रखी है।''
मुस्लिम घुसपैठ की जिस समस्या की पहचान भारत में रोहिंग्या समस्या के नाम से की गई है, उस समस्या को समझने में यह भूमिका मददगार साबित होगा। इसी अपेक्षा के साथ कुछ उदाहरणों का उल्लेख ऊपर किया गया है।
म्यांमार की स्थिति पर विस्तार से बात करने से पहले चीन के शिनजियांग प्रांत का उदाहरण भी हम सबके सामने है। पहले शिनजियांग प्रांत में बौद्ध अच्छी संख्या में थे लेकिन जबसे शिनजियांग प्रांत में मुस्लिमों का प्रवेश हुआ है। उनकी संख्या बढ़ती गई और आज वह क्षेत्र मुस्लिम बहुल इलाका माना जाता है। मुसलमानों के बहुसंख्यक होने के बाद ही वहां बौद्धों, तिब्बतियों आदि अल्पसंख्यकों का जीना मुश्किल हो गया।
अपनी संख्या बढ़ते ही यहां मुसलमानों ने चीन से आजादी की मांग कर दी। बाद में चीन इस समुदाय से जिस तरह निपटा वह अपने आप में पूरी दुनिया के लिए एक इतिहास बना।
यह विषयांतर है लेकिन इसे भारतीय समाज को निश्चित तौर पर जानना चाहिए कि जब बेरहमी के साथ चीन शिनजियांग प्रांत में मुसलमानों को कुचल रहा था, उस वक्त लगा कि मुसलमानों का हितैषी पाकिस्तान दो शब्द बोलेगा लेकिन चीन के एहसान के नीचे दबा हुआ पाकिस्तान आलोचना के दो शब्द नहीं कह पाया। यह चीन की ताकत थी। भारत के सामने कोई भी इसलिए मुंह उठाकर आलोचना करने चला आता है क्योंकि भारत मोदी सरकार के आने से पहले एक कमजोर मुल्क के तौर पर विश्व समुदाय के सामने पेश होता आया है।
एशियन ह्यूयूमन राइट कमिशन नाम से मानवाधिकार की एक दूकान जो चीन के हांगकांग से चलती है। वह भी चीन की सारी नृशंसता के आगे खामोश रहा। जबकि भारत में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हजारों एनजीओ ऐसे अवसर की तलाश में मंडराते रहते हैं कि कब कोई मुद्दा उनके हाथ आए और पूरी दुनिया के सामने भारत का नाम उछालने का उन्हें अवसर मिले। ऐसी कई घटनाएं मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान भी हुई। जिसे मोदी सरकार ने पूरी कार्यकुशलता के साथ संभाला और विश्व समुदाय को एक संदेश दिया कि यह देश अब पिछले कई दशकों से अपनी कमजोरी की वजह से पहचाना जाने वाला देश नहीं रहा। 125 करोड़ का देश अब सशक्त हो रहा है और अपनी नीतियों को लेकर पहले से अधिक स्पष्ट भी।
बहरहाल बात चीन के शिनजियांग प्रांत के मुसलमानों की, जिनकी पहचान उइगर नाम से की जाती है। उइगर मुसलमानों के प्रति चीन का हिंसक हो जाना कोई जल्दबाजी में लिया गया फैसला नहीं था। चीन में रहकर मुसलमानों का यह समूह 'ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट' चला रहा था। जिसका उद्देश्य अलग देश बनाना था।

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           पिछले साल सात रोहिंग्या मुस्लिमों को म्यांमार वापस भेजा गया था ( फाइल फोटो )
 
दुनिया के अलग—अलग मुल्कों के ऐसे कई उदाहरण हैं, जिससे साबित होता है कि मुसलमान जिस देश में रहे, उस देश के होकर नहीं रहे। जिस देश के किसी हिस्से में वे बहुसंख्यक हुए, उन्होंने उस हिस्से को पूरे देश से काटने की साजिश रची। भारत से भी 1947 में इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान अलग किया गया था। भारत के कश्मीर में दशकों तक हमने ऐसी ही स्थिति देखी है। कश्मीर घाटी का एक बड़ा मुसलमान बहुल हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है। जितना हिस्सा भारत के कब्जे में बचा रहा, उसे भी अलग देश बनाने की कोशिश की लगातार जारी रही है। हाल में ही नरेन्द्र मोदी की सरकार ने अनुच्छेद 35 ए और 370 हटाकर कश्मीर में चल रहे षडयंत्र का पटाक्षेप किया।
म्यांमार में मुसलमानों की अलग स्थिति नहीं है। वे रोहिंग्या नाम की गलत पहचान के साथ पूरी दुनिया में अपने लिए सहानुभूति बटोर रहे हैं। जबकि रोहिंग्या पहचान रखाइन राज्य के मूल निवासी बौद्ध भिक्षुओं की है। जिन मुसलमानों को हम रोहिंग्या नाम से पुकारते हैं, वे तो बांग्लादेश के चटगांव से छह सौ साल पहले निकले थे। यह तब की बात है जब रखाइन राज्य का नाम अराकान प्रांत होता था। चटगांव बांग्लादेश के दक्षिणी तट पर बसा एक प्रमुख बंदरगाह है। यही से निकल कर मुसलमानों का एक बड़ा समूह म्यांमार के अराकान प्रांत के बौद्ध राजा नारामीखला के पास नौकरी करने के लिए आया था। वास्तव में रोहिंग्या नहीं बल्कि बांग्लादेश से अराकान प्रांत में नौकरी करने आए मुसलमानों की वास्तविक पहचान बांग्लादेशी मुसलमान है।
जैसा मैने पहले लिखा है कि मुसलमान जहां शक्तिशाली होते हैं, वहां उन्हें इस्लामिक स्टेट चाहिए होता है। बांग्लादेशी मुसलमानों ने भी भारत में मुगलों का शासन आते ही अराकान प्रांत में सत्ता की बाजी पलट दी। अराकान प्रांत पर उनका कब्जा हो गया। मतलब जिनके पास वह नौकर की हैसियत से गए थे, भारत में मुगलों का शासन आते ही ये बांग्लादेशी मुसलमान उनके मालिक हो गए। उनपर राज करने लगे। लेकिन उनका यह राज अधिक लंबा नहीं चला। बांग्लादेशी मुसलमानों का तख्ता पलट हुआ। वापस रोहिंग्या बौद्धों ने 1785 में अपना राज वापस हासिल किया। इस युद्ध में 35,000 बांग्लादेशी मुसलमान अराकान प्रांत छोड़कर भागे थे।
1826 में रोहिंग्या बौद्धों को अंग्रेजों से हार का सामना करना पड़ा। अपनी फूट डालों राज करो नीति के अन्तर्गत अंग्रेजों ने बांग्लादेशी मुसलमानों को वापस लाकर अराकान प्रांत में बसा दिया। उनके साथ रहना शांतिप्रिय रोहिंग्या बौद्ध भिक्षुओं के लिए कठिन हो रहा था लेकिन वे युद्ध हारे हुए थे। इसलिए मजबूरी में उन्हें रहना पड़ा। बांग्लादेशी मुसलमानोें को यहां मन मांगी मुराद मिली थी। उन्होंने अंग्रेजों का जमकर साथ दिया और शांतिप्रिय रोहिंग्या बौद्ध भिक्षुओं का जमकर शोषण किया।
यह वह दौर था जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जापानी सेना के साथ मिलकर अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे। इसी दौरान बांग्लादेशी मुसलमानों से भी टकराव हुआ। लगभग एक लाख बांग्लादेशी मुसलमानों को जापानी सेना ने खदेड़ कर वापस बांग्लादेश वापस भेज दिया था।
1962 में ऐसे कुछ हालात बने थे कि एक बार फिर बांग्लादेशी मुसलमानों ने स्वतंत्र राज्य बनाने का प्रयास किया लेकिन उस वक्त तक रोहिंग्या बौद्ध संन्यासियों का जख्म भरा नहीं था। उन्होंने फिर बांग्लादेशी मुसलमानों को उनकी सही जगह दिखाई।
म्यांमार में रखाइन राज्य के अंदर बांग्लादेशी मुसलमानों के बुरे दिन वास्तविक अर्थों में 1982 से प्रारम्भ हुए। उन्होंने म्यांमार के मूल निवासी बौद्ध भिक्षुओं का विश्वास खो दिया था। प्राथमिक शिक्षा के अलावा हर तरह की शिक्षा तक से बांग्लादेशी मुसलमानों को दूर कर दिया गया था।
आज म्यांमार के लोग अपने बच्चों को बांग्लादेशी मुसलमानों के विश्वासघात के किस्से सुनाते हैं। यही वजह है कि इन्हें वापस लेने को वहां की नई पीढ़ी भी तैयार नहीं है। इतना ही नहीं इनके विश्वासघात के किस्सों का ही असर है कि जिस बांग्लादेश से यह निकल कर गए। वह बांग्लादेश भी इन्हें वापस लेने को तैयार नहीं है।
तीन साल पहले फिर एक बार संगठित होकर बांग्लादेशी मुसलमानों ने म्यांमार की सेना पर हमला बोल दिया था। आरोप तो यह भी लगा कि 2012 में उन्होंने बौद्ध युवती का बलात्कार किया। जब बौद्ध भिक्षुओं की तरफ से इसका विरोध हुआ तो बांग्लादेशी मुसलमानों ने उन पर उलटा हमला कर दिया। इसके बाद दोनों समुदायों के बीच हिंसक झड़प बढ़ गई। 2015 के बाद बांग्लादेशी मुसलमान कमजोर पड़ने लगे और इसके बाद लगभग डेढ़ लाख बांग्लादेशी मुसलमानों को म्यांमार से खदेड़ दिया गया।
इस हमले के बाद म्यांमार के बौद्ध रोहिंग्या भिक्षुओं के बीच बांग्लादेशी मुसलमानों के लिए इतना अधिक गुस्सा है कि वे इस बात को स्वीकार करने के लिए भी तैयार नहीं हैं कि ये बांग्लादेशी मुसलमान म्यांमार के नागरिक हैं या उनका म्यांमार से कोई ताल्लूक है।
पूरी दुनिया में मुसलमानों की जो एक नकारात्मक छवि बन रही है, उसमें कैसे सुधार हो? इस दिशा में इस्लामिक स्कॉलर, मुफ्ती और मौलानाओं को अब गम्भीरता से विचार करना चाहिए। उन्हें इस्लाम में यकीन रखने वालों को यह संदेश देना चाहिए कि जिस देश में रहते हैं, उसे अपना माने।
यदि ऐसा समय रहते नहीं होता तो बांग्लादेश के चटगांव से निकले मुसलमानों की तरह यदि पूरी दुनिया में उनकी षडयंत्रकारी की छवि बनी तो कौन अपने यहां ऐसे कथित 'रोहिंग्याओं' को पनाह देना पसंद करेगा?