नागरिकता संशोधन एक्ट : अधिकार और लंबा इंतजार
   दिनांक 16-दिसंबर-2019
अश्विनी उपाध्याय
पाकिस्तान अगर 1950 में नेहरू-लियाकत समझौते का ईमानदारी से पालन करता तो भारत को नागरिकता संशोधन विधेयक लाने की जरूरत ही न पड़ती। इस विधेयक के पारित होने के बाद पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से प्रताड़ि़त होकर भारत आए हिन्दुओं ने जमकर खुशी मनाई

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नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2016, जुलाई 2016 में लोकसभा में पेश किया गया था जिसे अगस्त 2016 में संयुक्त संसदीय समिति को सौंप दिया गया। विस्तृत चर्चा और विचार-विमर्श के बाद समिति ने इस साल जनवरी में अपनी रिपोर्ट दी। इससे अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के सभी अल्पसंख्यक (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई) भारतीय नागरिकता के योग्य हो जाएंगे। इन्हें भारतीय नागरिकता पाने के नियम में भी छूट मिल जाएगी। ऐसे सभी शरणार्थी जो छह साल से भारत में रह रहे हैं, उन्हें यहां की नागरिकता मिल सकेगी। पहले यह समय सीमा 11 साल थी।
नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 कहता है कि भारत की नागरिकता प्राप्त करने पर अवैध प्रवासियों को 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आ चुके अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के सभी अल्पसंख्यकों को भारत का नागरिक माना जाएगा, अवैध प्रवास के संबंध में उनके खिलाफ सभी कानूनी कार्यवाही बंद हो जाएगी (असम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा के वनवासी क्षेत्रों में अवैध प्रवासियों के लिए नागरिकता पर प्रावधान लागू नहीं होंगे)। नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2016 में यह प्रावधान था कि प्राकृतिक रूप से नागरिकता प्राप्त करने के लिए अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों (हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों) को कम से कम 6 वर्ष से भारत में रहना चाहिए, लेकिन नया कानून इस अवधि को घटाकर 5 वर्ष कर देगा अर्थात वे भारत में रहने के 5 साल बाद ही भारत के नागरिक बन जायेंगे। कुछ लोग तर्क दे रहे हैं कि यह संशोधन, संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है जो जाति, पंथ, लिंग, स्थान आदि के आधार पर भेदभाव का विरोध करता है। लेकिन यह पूरी तरह गलत और मिथ्याचार है। सरकार ने इन तीन देशों के सभी अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का निर्णय लिया है, यदि वह किसी एक अल्पसंख्यक समुदाय को नागरिकता देने का निर्णय करती तो शायद गलत होता। वैसे अनुच्छेद 14 भारत के नागरिकों पर लागू होता है, विदेशियों पर नहीं। किस देश के किस समुदाय को नागरिकता देनी है, यह पूर्णतया संसद का विशेषाधिकार है और अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।
1950 में पाकिस्तान में 23 प्रतिशत अल्पसंख्यक थे और अब मात्र 3 प्रतिशत बचे हैं। क्या हुआ शेष अल्पसंख्यकों का? क्या आगे उनकी संतानें नहीं हुईं? या पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों ने आत्महत्या कर ली? आखिर कहां गए पाकिस्तान के 20 प्रतिशत अल्पसंख्यक? पाकिस्तान से भारत आए अनेक हिन्दू परिवार दिल्ली के अंतरराज्यीय बस अड्डे के करीब मजनू का टीला में भी शरण लिए हुए हैं। ये वहां उनके साथ हो रहे भेदभाव से तंग होकर मजबूरी में भारत आए हैं और यहीं रहना चाहते हैं, लेकिन इनके पास नागरिकता नहीं है। इसलिए न नौकरी है, न रहने-खाने की व्यवस्था। इनके पास केवल दिल्ली का वीसा है, इसलिए दिल्ली से बाहर भी नहीं जा सकते। यह समस्या केवल इन परिवारों की नहीं है बल्कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से पलायन कर भारत आए लाखों अल्पसंख्यकों की है। 1947 में जब पंथ के आधार पर भारत का विभाजन हुआ था तब लाखों की संख्या में लोगों ने सरहदें आर-पार की थीं। तो भी बहुत से मुसलमान भारत में ही रह गए और बड़ी तादाद में हिंदू, ईसाई, पारसी जैन, बौद्ध पाकिस्तान में। भारत हिंदू राष्ट्र नहीं बल्कि पंथनिरपेक्ष देश बना ताकि भारत में रहने वाले अल्पसंख्यक खुद को सुरक्षित समझें और उन्हें समान अधिकार मिलें। यही नहीं, भारत ने अपने संविधान में पांथिक स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार बना दिया। यही कारण है कि विभाजन के बाद भारत में बचे 8 प्रतिशत मुसलमान आज बढ़कर लगभग 18 प्रतिशत हो गए हैं, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले हिंदुओं की किस्मत भारतीय मुसलमानों जैसी न तब थी, न आज है। प्रगतिशील और उदारवादी विचारधारा को त्यागकर पाकिस्तान और बांग्लादेश इस्लामिक देश बन गए और अल्पसंख्यकों का जीवन नर्क हो गया। पाकिस्तान और बांग्लादेश में राजनीतिक-मजहबी उथल-पुथल हो या भारत में सांप्रदायिक दंगे, इसका दुष्परिणाम पाकिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले अल्पसंख्यकों को भुगतना पड़ता है। भारत-पाक युद्ध हो या अयोध्या में विवादित ढांचे का विध्वंस या गुजरात दंगा, पाकिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों को वहां की सरकार और अवाम ने अपने गुस्से का निशाना बनाया। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ तीखी प्रतिक्रियाएं हुईं और सरकारी संरक्षण में लगभग 200 मंदिरों को गिरा दिया गया।
जिया-उल-हक की तानाशाही से लेकर तालिबान के अत्याचारों तक, पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों का जीवन हमेशा ही नर्क बना रहा। 1947 में पाकिस्तान में लगभग 1000 मंदिर थे और अब मात्र 20 मंदिर ही बचे हैं। मंदिरों को गिराकर मस्जिद-मजार-मदरसा और होटल बना दिया गया। 2012 की एक रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में 70 प्रतिशत अल्पसंख्यक महिलाएं यौन शोषण का शिकार होती हैं। अकेले सिंध में हर महीने 20 से 25 अल्पसंख्यक लड़कियों का अपहरण कर कन्वर्जन कराया जाता है। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के लिए स्थिति अत्यधिक प्रतिकूल है इसलिए मजबूरन उन्हें अपना सब कुछ छोड़ना पड़ता है।
पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से भारत आए अल्पसंख्यक परिवारों को तथाकथित सेकुलर राजनैतिक पार्टियों और नेताओं से कभी कोई सहारा नहीं मिला। उनका दोष यह है कि वे भारत आकर अल्पसंख्यकों के गणित से बाहर हो जाते हैं। वे किसी पार्टी का वोट बैंक नहीं बन पाते। इन लोगों को पाकिस्तान में अल्पसंख्यक होने का दुष्परिणाम भुगतना पड़ा और भारत में बहुसंख्यक होने की वजह से राजनैतिक दलों की उदासीनता झेलनी पड़ी। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने भी उन्हें खूब नजरअंदाज किया।
1950 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किये थे, जिसे नेहरू-लियाकत समझौता नाम दिया गया था। पाकिस्तान यदि नेहरू-लियाकत समझौते का ईमानदारी से पालन करता तो भारत को यह कानून बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। समझौते के तहत शरणार्थी अपनी संपत्ति का निपटारा करने के लिए भारत-पाकिस्तान आ जा सकते थे। अगवा की गई महिलाओं और लूटी गई संपत्ति को वापस किया जाना था। जबरन कन्वर्जन को मान्यता नहीं दी गई थी। दोनों देशों को अपने-अपने यहां अल्पसंख्यक आयोग गठित करना था। दिल्ली पैक्ट के नाम से मशहूर इस समझौते का भारत ने पूरी निष्ठा और ईमानदारी से पालन किया, लेकिन पाकिस्तान ने केवल धोखा दिया। पाकिस्तान और बांग्लादेश पांथिक अल्पसंख्यकों की रक्षा करने में पूरी तरह विफल रहे। नेहरू-लियाकत समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद भी कई महीने पूर्वी पाकिस्तान के हिंदुओं का पलायन भारत के पश्चिम बंगाल में जारी रहा।
अगस्त 1966 में जनसंघ नेता निरंजन वर्मा ने तत्कालीन विदेश मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह से तीन प्रश्न पूछे थे-(1) नेहरू-लियाकत समझौते की क्या स्थिति है? (2) क्या दोनों देश समझौते की शर्तों के अनुसार कार्य कर रहे हैं? (3) पाकिस्तान कब से दिल्ली समझौते का उल्लघंन कर रहा है? स्वर्ण सिंह ने अपने जवाब में कहा था कि 1950 का नेहरू-लियाकत समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच एक स्थायी समझौता है। दोनों देशों को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि अल्पसंख्यकों को सुरक्षा और समान अधिकार प्राप्त हों। दूसरे सवाल के जवाब में स्वर्ण सिंह ने कहा कि भारत में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को प्रभावी रूप से संरक्षित किया गया है, लेकिन पाकिस्तान अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों की लगातार उपेक्षा और उत्पीड़न करके समझौते का उल्लंघन कर रहा है। तीसरे प्रश्न के उत्तर में स्वर्ण सिंह ने कहा कि समझौता होने के तुरंत बाद ही पाकिस्तान ने इसका उल्लंघन करना शुरू कर दिया था।
11 अगस्त को भारत की संसद द्वारा पारित किया गया यह संशोधन देश के अल्पसंख्यकों के खिलाफ नहीं है। इसके माध्यम से सकारात्मक रूप से अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के आए प्रताड़ि़त अल्पसंख्यकों को शरण में लिया जा सकेगा। यह बिल किसी तरह से गैर संवैधानिक नहीं है और न ही किसी प्रकार का उल्लंघन है। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सदन में साफ कहा कि, अगर कांग्रेस पंथ के आधार पर देश के विभाजन के लिए तैयार न होती तो इस संशोधन की जरूरत ही नहीं पड़ती। भारत में पंथ के आधार पर कभी भी भेदभाव नहीं किया गया।
मोदी सरकार इस देश में सभी को सुरक्षा और सब को सम्मान देने के लिए प्रतिबद्ध है। नागरिकता (संशोधन) विधेयक का उद्देश्य पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आये अल्पसंख्यक समुदायों (हिन्दू, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध तथा पारसी) को भारत की नागरिकता देना है। इन समुदायों में मुस्लिम समुदाय को शामिल ना किये जाने पर कई बांग्लादेशी घुसपैठ और रोहिंग्या परस्त सेकुलर राजनीतिक पार्टियां इसका विरोध कर रही हैं। भाजपा का विरोध करते-करते अब ये लोग भारत विरोध पर उतर आए हैं। ऐसे लोग अच्छी तरह समझ लें कि झूठ पाखंड की राजनीति अब नहीं चलेगी।
( लेखक सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं )