नागरिकता कानून: साजिश के तहत भड़काई जा रही हिंसा
   दिनांक 16-दिसंबर-2019

नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 के संसद में पारित होने से बौखलाए विरोधियों ने साजिश के तहत देश के कई इलाकों को आगजनी और हिंसा में झोंक दिया है.

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                        पश्चिम बंगाल: रेलवे स्टेशन पर ट्रेनों में की गई तोड़फोड़ और आगजनी
नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 के संसद में पारित होने से बौखलाये विरोधियों ने देश के कई इलाकों को आगजनी और हिंसा में झोंक दिया है। अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में मजहबी आधार पर हिंसा और भेदभाव के शिकार हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों का इस कानून के जरिये भला होना विरोधियों को नहीं भाया और पश्चिम बंगाल, दिल्ली, असम में वे जगह-जगह आगजनी, सरकारी संपत्ति को नुकसान और आमजन को पीड़ित करने के हरकत पर उतर आए। असम में जहां यात्रियों से भरी एक ट्रेन को फूंकने की चेष्टा की गई, वहीं पश्चिम बंगाल में हालात यह हैं कि वहां लगातार चार दिन से हिंसा का ताण्डव जारी है और हिंसा 8 जिलों में फैल चुकी है।
मुर्शिदाबाद में एक रेलवे स्टेशन परिसर को आग के हवाले कर दिया जबकि विभिन्न हाईवे और रेलमार्ग जाम कर दिये हैं। बंगाल और असम के रेल मार्ग पर लगभग 110 से अधिक ट्रेनें रद करनी पड़ी हैं और दर्जनों ट्रेनों के मार्ग बदले गए हैं। आम जनता परेशान है और ममता सरकार हिंसक तत्वों पर कार्रवाई करने की बजाय केंद्र सरकार पर हमलावर रुख अपना कर इस हिंसा को हवा दे रही है। दिल्ली में मुस्लिम बहुल जामिया इलाके में डीटीसी की चार बसों को आग के हवाले खाक कर देने के बाद स्थिति यहां तक पहुंच गयी है कि रविवार रात राजधानी की लाइफलाइन कही जाने वाले मेट्रो के 18 स्टेशनों को बंद करना पड़ा।
सवाल यह है कि नागरिकता कानून में ऐसा क्य़ा है जिसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और इस हिंसक विरोध के पीछे कौन सी शक्तियां हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी यह कह कर कि वे नागरिकता कानून को बंगाल में लागू नहीं होने देंगी, इस हिंसा को एक तरह से आधार प्रदान किया। केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन के अलावा कांग्रेसी राज्यों पंजाब, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों ने भी इस कानून को अपने राज्यों में लागू न होने देने की बात कही। महाराष्ट्र, जहां कांग्रेस सरकार में शामिल है, में भी सरकार ने अपने यहां यह कानून लागू न होने देने की बात कही है।
क्या कह रहे विरोधी
विपक्ष का आरोप है कि यह कानून मुसलमानों के खिलाफ है और यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है। वे इस कानून को धर्म के आधार पर भेदभाव बता रहे हैं। केंद्र सरकार का तर्क है कि यह कानून इन तीन देशों में भेदभाव से पीड़ित अल्पसंख्यकों को सम्मान से जीने का अवसर देगा। निश्चित रूप से इन तीनों मुस्लिम देशों के मुसलमान अपने देशों में भेदभाव से पीड़ित नहीं है, इसलिए भारत की नागरिकता देने वाले इस कानून में मुसलमानों को शामिल करने का कोई तर्क नहीं बनता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने साफ किया है कि इससे भारतीय मूल के उन नागरिकों को लाभ होगा जो किन्हीं कारणों से इन तीनों देशों में धार्मिक भेदभाव के शिकार हो रहे हैं और अब तक उनके पास इस भेदभाव से बचने का कोई उपाय नहीं था।
पश्चिम बंगाल में कई जिलों  में लगातार हिंसा
इस कानून का सबसे अधिक विरोध पश्चिम बंगाल में सोची समझी साजिश के तहत किया जा रहा है। पिछले तीनों में मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद, मालदा, नादिया जिलों के साथ ही हावड़ा, उत्तरी 24 परगना और दक्षिणी 24 परगना, बर्धमान, बीरभूम जिलों में जमकर हिंसा हुई और ट्रेनों और बसों पर पथराव और आगजनी की घटनाएं हुईं। मुर्शिदाबाद के बेलडांगा रेलवे स्टेशन परिसर को तो उपद्रवियों ने आग के हवाले कर दिया। विभिन्न हाईवे और रेल मार्ग जाम किए जाने से उत्तर-पूर्व फ्रंटियर रेलवे को 106 से अधिक पैसेंजर ट्रेनें रद करनी पड़ी हैं जबकि उत्तर रेलवे और दक्षिण-पूर्व रेलवे की भी कई ट्रेनें रद हो गई हैं। हाबड़ा-खड़गपुर सेक्शन में अप और डाउन ट्रेनें रोकनी पड़ी हैं।
यह विरोध आश्चर्यजनक इसलिए है कि बंगाल में शरणार्थी समस्या नहीं है बल्कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तो म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों को बंगाल में शरण देने के लिए केंद्र तक से भिड़ गयी थीं। फिर अब किस कारण से विरोध? दरअसल, पश्चिम बंगाल में हिंसा के पीछे वहां की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का रुख है। ममता बनर्जी ने अपने पूरे कार्यकाल में हिंदू-विरोधी और मुस्लिम समर्थक नीतियों को बढ़ावा दिया है। कई दुर्गापूजा पंडालों पर रोक लगाने से लेकर, पाठ्यपुस्तकों में फादर का बांग्ला अनुवाद बाबा के स्थान पर मुस्लिम संस्कृति के अनुरूप अब्बा करने, और संघ के विद्या मंदिरों पर रोक लगाने और दंगों में मुस्लिम दंगाइयों पर कोई कार्रवाई न करने और रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने तक ममता का हर कदम मुस्लिम परस्त रहा है। इसकी वजह बांग्लादेश के मुस्लिम घुसपैठिये रहे हैं। बांग्लादेश की सीमा से सटे होने से वहां के घुसपैठिये पश्चिम बंगाल के तमाम मुस्लिम बहुल जिलों में मुस्लिम समुदाय के बीच घुल-मिल जाते हैं और ममता सरकार उन्हें अपने वोटबैंक के रूप में प्रश्रय देती है। बांग्लादेशी घुसपैठिये में पूरे भारत में फैलने के लिए इसी सरकारी संरक्षण का उपयोग करते हैं।
ममता बनर्जी ने यह कह कर कि वे नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता कानून (सीएबी) को पश्चिम बंगाल में लागू नहीं होने देंगी, एक तरह से उपद्रवियों को आगे बढ़ने का संकेत दे दिया। इससे उपद्रवियों में यह संकेत गया कि उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है। जब हिंसक उपद्रव तेज होने लगा तो भी उपद्रवियों पर कोई सख्त कार्रवाई करने की बजाय ममता सरकार केंद्र सरकार के खिलाफ ही हमलावर दिखी जिससे हिंसा की लपटें नए-नए जिलों को अपने चपेट में लेने लगीं। ममता सरकार के नरम रुख से उपद्रवियों का दुस्साहस इतना बढ़ गया कि रेलवे स्टेशन को ही आग के हवाले करने से वे नहीं हिचके। बंगाल के पांच जिलों में इंटरनेट पर रोक लगानी पड़ी है। पुलिस और सेना तक असहाय नजर आ रही है।
ममता के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी और तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डेरेक ओ ब्रायन एक तरफ उपद्रवियों से शांति की अपील कर रहे हैं और दूसरी तरफ केंद्र सरकार पर हमलावर होकर और यह कह कर कि वे नागरिकता कानून को राज्य में लागू नहीं होने देंगे, उपद्रवियों की हरकत को आधार भी प्रदान कर रहे हैं। इससे बंगाल में हिंसा थमने की बजाय बढ़ती जा रही है। इसी वजह से भाजपा के प्रदेश महासचिव सायंतन बसु ने ममता सरकार पर राज्य में खराब होती कानून व्यवस्था को नियंत्रण में करने के लिए बहुत कम प्रयास करने के आरोप लगाये।
पूर्वोत्तर में विरोध
हिंसक उपद्रव की शुरुआत पूर्वोत्तर के राज्य असम से हुई। असम में स्कूल-कॉलेज 22 दिसंबर तक के लिए बंद कर दिए गये हैं। उपद्रवियों ने गुरुवार को यात्रियों से भरी एक ट्रेन में आग लगाने की भी कोशिश की।
दिल्ली में आगजनी, तोड़फोड़
 
इस बीच, देश की राजधानी दिल्ली के मुस्लिम बहुल जामिया इलाके में उपद्रवियों ने इस कानून का विरोध करते हुए डीटीसी की चार बसों में आग लगा दी और कई कारों और बाइकों में भी तोड़फोड़ की। इस प्रदर्शन में आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्ला खान भी नजर आये थे। हिंसक गतिविधियों से दिल्ली में रविवार देर रात तक हालात यहा। तक पहुंच गए कि मेट्रो के 18 स्टेशनों को बंद करना पड़ा।