गीता कर्तव्य पथ पर चलने की प्रेरणा देती है
   दिनांक 16-दिसंबर-2019
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मंच पर विराजमान (बाएं से)स्वामी रामदेव, श्री गोविंद देव गिरि एवं श्री मोहनराव भागवत
स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज ने कहा कि बालकों में संस्कार भरने के लिए संगमनेर में गीता परिवार की स्थापना 33 वर्ष पूर्व हुई। स्वर्गीय ओंकारनाथ जी एवं ललिता देवी मालपाणी के सशक्त समर्थन से इस पौधे का 16 राज्यों में विस्तार हुआ है।
 
''श्रीमद्भगवद् गीता एक अलौकिक ग्रंथ है। गीता के ज्ञान के आधार पर भारत को विश्वगुरु बनाना संभव है। हर एक को अपने कर्तव्य के मार्ग पर कायम रखने की शिक्षा गीता से मिलती है। गीता यानी वैश्विक कल्याण का शाश्वत चिंतन।'' उक्त बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने कही। वे गत दिनों पुणे में गीता परिवार द्वारा गीता जयंती और गीता परिवार के संस्थापक स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज के 71वें जन्मदिवस के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। गीता परिवार द्वारा पिछले तीन दशक के बाल संस्कार कार्य की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि गीता के उपदेश पर आचरण करना महत्वपूर्ण है। शरीर, मन, बुद्धि की एकरूपता लाने का कौशल गीता सिखाती है। मोह, आकर्षण, उपेक्षा और भय को कैसे मात दें और कर्तव्य पूरा करते हुए समाज के कल्याण में जीवन का सदुपयोग कैसे करना है, इसका मार्गदर्शन भी हमें उससे मिलता है। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित योग गुरु बाबा रामदेव ने छात्रों को योगी बनने और राष्ट्र के लिए उपयोगी होने का मौलिक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि संगमनेर में स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज की प्रेरणा से 33 वर्ष पूर्व डॉ. संजय मालपाणी द्वारा शुरू किया गया बाल संस्कार कार्य, संस्काररूपी पुरुषार्थ है। गीता में जीवन का अहसास, ज्ञान और विज्ञान का अनोखा मिलाप है। वास्तव में हम सब भारतीय देवताओं, वीरों और वीरांगनाओं के अंश हैं। आत्मग्लानि में न रहते हुए सबको योग साधना करते हुए अपनी आत्मशक्ति बढ़ाने की नितांत आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सुदृढ़ पीढ़ी राष्ट्र की रीढ़ है। इसलिए हर एक को स्वस्थ, प्रसन्न, कार्यक्षम और उत्साही बने रहना है। स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज ने कहा कि बालकों में संस्कार भरने के लिए संगमनेर में गीता परिवार की स्थापना 33 वर्ष पूर्व हुई। स्वर्गीय ओंकारनाथ जी एवं ललिता देवी मालपाणी के सशक्त समर्थन से इस पौधे का 16 राज्यों में विस्तार हुआ है।
इस अवसर पर श्रीमद्भगवद् गीता कंठस्थ करने वाले देश के 81 छात्रों को गीताव्रती की उपाधि देकर स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। -विसंकें, पुणे