मानवता का ठौर भारत
   दिनांक 16-दिसंबर-2019
पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफगानिस्तान में हिन्दू कटेंगे, घटेंगे तो धर्म के नाम पर प्रताड़ि़त ये मनुष्य कहां जाएंगे? नया नागरिक कानून भारत की उसी अवधारणा को मजबूत करने वाला है जो इस भूमि का शाश्वत विचार है

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भाजपा की अगुआई में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की साझा शक्ति से नागरिकता संशोधन विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हो गया। विशेषकर लोकसभा में जिस तरह इसके पक्ष में भारी मत पड़े, उससे पूरी दुनिया के सामने यह साफ हो गया है कि भारत को सबसे मुखर-अनूठा लोकतंत्र क्यों कहा जाता है और जनादेश की शकित की प्रबलता क्या-कैसी होती है।
संसद के दोनों सदनों में विधेयक पर चली चर्चा के दौरान एक समय यह बात भी उठी कि यह विधेयक 'भारत की संकल्पना' या 'आइडिया ऑफ इंडिया' के खांचे में बैठता है या नहीं। यह विषय दिलचस्प है! दरअसल, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही 'आइडिया ऑफ इंडिया' को बौद्धिक दिखने की चाह पाले राजनेताओं ने ऐसी रूमानी काल्पनिक पहेली की तरह छाती से लगा रखा है जिसका जवाब उनके मुताबिक सिर्फ उन्हीं को पता है। वैसे, क्या है भारत का विचार? किसी चीज को दुरुस्त करने, समय के अनुरूप ढलने और न्यायपूर्ण ढंग से चीजों का समायोजन करने की गुंजाइश इस विचार में कितनी है?
यदि नेहरूवादी राजनेताओं से पूछेंगे तो आपको कोई ऐसा जवाब मिल सकता है जो ऊपरी तौर पर गंभीर किन्तु वास्तव में निरर्थक हो। हो सकता है इसमें सारी बात नेहरू जी की महानता पर आकर टिक जाए। किन्तु इतने से बात नहीं बनती। अपनी खूबियों-कमजोरियों के साथ किसी राजनेता का राष्ट्र का पर्याय हो पाना असंभव है। जो ऐसी परिभाषाएं गढ़ने की कोशिश करते हैं, वे किसी दिवंगत विभूति को बौना बनाने के साथ ही अपनी समझ की क्षुद्र सीमाएं भी बताते हैं तथा परिहास के पात्र बनते हैं।
वैसे, प्रख्यात इतिहास लेखक पैट्रिक फ्रेंच की नजर में नेहरू जी द्वारा लिखी 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' में इतिहास जैसा कुछ नहीं, बल्कि इतिहास की रूमानी कल्पनाएं ज्यादा हैं। फिर 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' की सीढ़ी से 'आइडिया ऑफ इंडिया' तक कैसे पहुंचेंगे? नेहरू जी से आगे बढि़ए..
भारतीय राजनीति के एक अन्य विराट पुरुष, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पंक्तियां हैं ..
.. .जग के ठुकराए लोगों को, लो मेरे घर का द्वार खुला
अपना सब कुछ मैं लुटा चुका, फिर भी अक्षय है धनागार।
हिन्दू तन मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय।।
यही तो है भारत की संकल्पना, 'आइडिया ऑफ इंडिया'। आक्रांताओं की लूट-चोट के बाद भी अटल- अक्षय भारत। जग की ठुकराई मानवता का ठौर भारत! कुछ को संतुष्ट करने की बजाय सबको पुष्ट करने का मंत्र देता भारत।
तथ्यत: इतिहास यह है कि एक सांस्कृतिक राष्ट्र को, राजनैतिक दृष्टि से अंग्रेजों और पाकिस्तान के नफे के हिसाब से बांटने, नागरिकों को उनकी जड़ों से काटने पर सहमत होने और इस काम के पूरा हो जाने के बाद ही नेहरू और जिन्ना ने दोनों देशों की कमान संभाली।
नेहरू और जिन्ना से पहले यह देश कैसा था और भारत का विचार कैसा था, उस पर लंबे आख्यान हो सकते हैं, किन्तु इसकी स्पष्ट झलक स्वामी विवेकानंद द्वारा अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद के सामने दिए भाषण में दिखती है। स्वामी विवेकानंद ने वहां कहा, ''हम न केवल वैश्विक सहिष्णुता में विश्वास रखते हैं, बल्कि सभी मत-पंथों को सच्चा मानते हैं। मुझे गर्व है कि मैं उस राष्ट्र का हिस्सा हूं जिसने दुनियाभर के उत्पीडि़तों और शरणार्थियों को अपने यहां शरण दी है।''
यदि नेहरूवादी इतिहासकारों के अनुसार भारत 1947 में बना तो 1893 में विवेकानंद किस राष्ट्र की बात कर रहे हैं? जाहिर है, भारत कोई ऐसी चीज नहीं, जो 1947 में 15 अगस्त को ईस्ट इंडिया फैक्ट्री से बाहर आया। यह राष्ट्र तत्कालीन राजनेताओं, ब्रिटिश शासन या मुस्लिम आक्रांताओं से भी पहले दुनिया में अपनी छाप, पहचान रखता था। कथित बौद्धिक यदि भारत के इस अस्तित्व को समझ लें तो भारत की संकल्पना जैसी कोई पहेली ही नहीं बचेगी। कुछ लोगों को लगता है कि पहेली और बौद्धिकता का छद्म बचा रहेगा तो उस राजनीति की गुंजाइश बची रहेगी, जो अंग्रेज छोड़कर गए थे। यह बची-खुची चीज और कुछ नहीं अंग्रेजों की 'बांटो और राज करो की राजनीति' है। भारत अब अंग्रेजों की राजनीति छोड़ रहा है। अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है। कोई तुष्टीकरण नहीं! सबका साथ, सबका विकास! मूलमंत्र यही है।
वास्तव में भारत का विचार इसकी वह सांस्कृतिक शक्ति है, जो विभाजक रेखाओं को मिटाती है, समय-समय पर उपजने वाली बुराइयों को दूर करने के लिए सुधारों को धार और स्वीकार्यता देती है। किसी अब्राहमिक सिमेटिक या 'वाद' में जो निष्ठुर कठोरता हो सकती है, उसके उलट भारत का विचार सही के स्वीकार और गलत के परिष्कार का विवेक रखता है। भारत के इस वैचारिक अधिष्ठान से हटते ही पाकिस्तान ने सबसे पहले अपनी 'हिन्दू' विरासत पर चाकू चलाया। भारत में अल्पसंख्यक फले-फूले किन्तु पाकिस्तान में घटते-खपते गए। इंसान को मुसलमान और काफिर के खांचे में देखने के चलते पाकिस्तान अल्पसंख्यकों के लिए त्रास का पर्याय बन गया!
पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफगानिस्तान में हिन्दू कटेंगे, घटेंगे तो धर्म के नाम पर प्रताड़ि़त ये मनुष्य कहां जाएंगे? नया नागरिक कानून भारत की उसी अवधारणा को मजबूत करने वाला है जो इस भूमि का शाश्वत विचार है। यह ठीक वैसा काम है जिसका जिक्र स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण में किया, अटल जी ने अपनी कविताओं में किया।