राजनीतिक आकाओं के हित साधता सेकुलर मीडिया
   दिनांक 16-दिसंबर-2019
 राजनीतिक आकाओं के हित साधता सेकुलर मीडिया

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नागरिकता (संशोधन) विधेयक पर कुछ समाचार चैनल दुष्प्रचार अभियान के जरिए देश का माहौल खराब कर रहे
 
नागरिकता (संशोधन) विधेयक पर एनडीटीवी और इंडिया टुडे की अगुआई में जो दुष्प्रचार अभियान बीते सप्ताह शुरू हुआ था वह अब भी जारी है। सरकार ने विधेयक को पास भले ही करवा लिया, लेकिन मीडिया का एक वर्ग झूठा माहौल पैदा करने में काफी हद तक सफल रहा है। जिस विधेयक का देश के मुसलमानों से कोई लेना-देना नहीं है, उसे बिना कारण विवादित बनाने में मीडिया का बड़ा योगदान रहा है। सरकार पूरी स्पष्टता के साथ संसद और संसद से बाहर जिन सवालों का जवाब दे चुकी है, उन्हें अब भी उछाला जा रहा है, ताकि नकारात्मक माहौल बनाया जा सके। कुछ एक अपवादों को छोड़कर इस मामले में ज्यादातर मीडिया संस्थानों की रिपोर्टिंग पक्षपातपूर्ण और भ्रामक रही है।
उन्नाव में एक बलात्कार पीडि़ता को जिंदा जलाने की घटना ने खूब तूल पकड़ा। आरोपी के मुसलमान होने पर जो मीडिया खबरें दबा देता है, इस मामले में बहुत मुखर था। मीडिया की तरफ से घटना को जातीय रंग देने की भरपूर कोशिश की गई। पर ऐसी हरकतें करके मीडिया खुद को ही कठघरे में खड़ा कर रहा है। उन्नाव के साथ-साथ मध्य प्रदेश में 8 साल की एक बच्ची से बलात्कार और हत्या की घटना हुई, छत्तीसगढ़ में एक आरोपी ने महिला को हंसिये से गोद डाला, लेकिन बाकी सारी खबरें इसलिए दबा दी गईं क्योंकि इन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें हैं। हैदराबाद में मुठभेड़ में बलात्कार आरोपियों के मारे जाने को लेकर भी मीडिया में थोड़ा-बहुत कोहराम मचा, लेकिन यही घटना किसी भाजपा शासित राज्य में हुई होती तो क्या मामला इतनी जल्दी शांत हो जाता?
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ बीते सप्ताह इंदौर में एक कार्यक्रम में थे। वहां पत्रकारों ने उनसे उन्नाव, हैदराबाद, निर्भया जैसे मुद्दों पर प्रतिक्रियाएं लीं, लेकिन किसी भी पत्रकार ने अपने ही राज्य में 8 साल की बच्ची के साथ हुई घटना पर सवाल नहीं पूछा। उसी कार्यक्रम में व्यापम घोटाले में सजा पा चुका एक अपराधी भी मौजूद था, लेकिन उससे जुड़े प्रश्न भी मुख्यमंत्री से नहीं पूछे गए। समझा जा सकता है कि ऐसी नरमी के पीछे क्या कारण होता है।
झूठी खबरें उड़ाने के मामले में वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता और उनके पोर्टल द प्रिंट का कोई जवाब नहीं है। यह पोर्टल अक्सर ऐसी अफवाहें उड़ाता रहता है, जो आगे चलकर विपक्षी नेताओं के भाषणों का हिस्सा बन जाती हैं। द प्रिंट ने रिपोर्ट छापी कि 'मोदी सरकार फंड की कमी के चलते शिक्षा बजट में 3000 करोड़ की कटौती कर सकती है।' इस खबर में न तो सरकार के किसी अधिकारी या मंत्री का पक्ष लिया गया और न ही तथ्यों की जांच-पड़ताल की गई। इस फर्जी समाचार के आधार पर ढेरों विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रियाएं आ गईं। केंद्र सरकार को 'शिक्षा विरोधी' करार दिया गया। बाद में वेबसाइट ने उसी खबर में छोटी सी टिप्पणी जोड़ दी कि यह रिपोर्ट तथ्यहीन पाई गई है। पर न तो शेखर गुप्ता और न ही उनके पोर्टल ने इस झूठ के लिए क्षमा मांगने की न्यूनतम औपचारिकता निभाई। इसी पोर्टल ने कुछ दिन पहले कश्मीरी हिंदुओं पर एक शरारतपूर्ण रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें बताया गया था कि 'कश्मीरी पंडित' अब घाटी में लौटना ही नहीं चाहते। जिन लोगों के बयानों को इस रिपोर्ट का आधार बनाया गया था, उनमें से लगभग सभी ने खंडन किया कि उनसे कभी इस बारे में कोई बातचीत भी की गई। समझना मुश्किल नहीं कि यह मनगढ़ंत रिपोर्ट थी, जिसका उद्देश्य भ्रम फैलाना था।
पुरानी दिल्ली में हुई आग की घटना में 43 लोगों की मौत के मामले में भी मीडिया ने असली चेहरा दिखा दिया। यह केजरीवाल सरकार के करोड़ों के विज्ञापनों का दम था कि मीडिया ने यह ध्यान रखा कि इस अग्निकांड के लिए कहीं भी दिल्ली सरकार पर उंगली न उठे। न तो चैनलों और न ही अखबारों ने केजरीवाल का नाम इस घटना के साथ जुड़ने दिया। दुर्घटना के बाद मुख्यमंत्री दिल्ली में ही चुनावी रैलियां करते रहे, लेकिन किसी चैनल ने इस बारे में कोई सवाल नहीं पूछा। ऐसा ही कोई हादसा अगर भाजपाशासित राज्य में हो गया होता तो इसी मीडिया का रवैया देखने लायक होता।
महाराष्ट्र में एक स्मारक के नाम पर 5000 पेड़ काटे जाने की खबर आई। पर इस बार मीडिया का रुख वैसा नहीं रहा, जैसा कुछ दिन पहले मेट्रो शेड मामले को लेकर था। ऐसी घटनाएं यही बताती हैं कि मीडिया खुद राजनीति का हिस्सा है। उसे पेड़ों या पर्यावरण की चिंता नहीं है, बल्कि इस बहाने अपने राजनीतिक आकाओं को फायदा पहुंचाने की चिंता अधिक है। विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए पर्यवारण की आड़ लेने की यह पुरानी परंपरा है। अक्सर यही देखा गया है कि हर बार मीडिया ऐसी कोशिशों का सक्रिय भागीदार बनता है। *