दंगों और मस्जिद का जुमा कनेक्शन, यह विरोध नहीं जिहाद है..
   दिनांक 21-दिसंबर-2019
सीएए सिर्फ बहाना है. सड़कों पर जो हो रहा है, वह जिहाद है. अगर ये जिहाद नहीं है, तो हिंसा की तकरीरें जुमे की नमाज के बाद क्यों हो रही हैं ? अगर ये जिहाद नहीं है, तो क्यों जुमे की नमाज के नाम पर इकट्ठा हुए लोग बलवाई बन जाते हैं ?

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नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध के नाम पर देश में एक वर्ग विशेष द्वारा जो हिंसा हो रही है, वह असल में जिहादी-वामपंथी-कांग्रेसी विचारधारा का गठजोड़ है. हालांकि इस कानून से किसी मुस्लिम नागरिक का कोई वास्ता नहीं है, फिर तमाम इलाके सुलग क्यों रहे हैं. क्यों तमाम विपक्षी दलों की सरकार वाले राज्य इसे लागू करने से इंकार कर रहे हैं.
बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से दरबदर किए गए अल्पसंख्यकों को नागरिकता का हक देने वाला ये कानून देश के कथित अल्पसंख्यकों के गले नहीं उतर रहा. साफ शब्दों में कहा जाए, तो सीएए सिर्फ बहाना है. सड़कों पर जो हो रहा है, वह जिहाद है. अगर ये जिहाद नहीं है, तो हिंसा की तकरीरें जुमे की नमाज के बाद क्यों हो रही हैं ? अगर ये जिहाद नहीं है, तो क्यों जुमे की नमाज के नाम पर इकट्ठा हुए लोग बलवाई बन जाते हैं ? यह जिहाद असल में मोदी सरकार के खिलाफ है, उन राष्ट्रहित के फैसलों के खिलाफ है, जो देश को मजबूत बनाते हैं, संगठित बनाते हैं, समतामूलक बनाते हैं. ये जिहाद सीएए भर के खिलाफ नहीं है. ये अनुच्छेद 370 की समाप्ति, तीन तलाक की छुट्टी और राम मंदिर के हक में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ है.
शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में प्रायोजित हिंसा हुई. जिस समय आग पर पानी डाला जाना चाहिए, शांति की अपील की जानी चाहिए, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि हम यानी कांग्रेस प्रदर्शनकारियों के साथ है. लेकिन प्रदर्शनकारियों और दंगाइयों में क्या अंतर होता है, ये शायद सोनिया गांधी से अच्छा कोई नहीं जानता. कांग्रेस का इतिहास रहा है, कांग्रेस का हाथ दंगाइयों के साथ. कांग्रेस उस समय भी दंगाइयों के साथ थी, जब 1984 में देशभर में सिखों को ढूंढकर मारा जा रहा था. कांग्रेस उस समय भी पंजाब की अलगाववादी ताकतों के साथ थी, जो पाकिस्तान के साथ मिलकर खालिस्तान की मांग कर रहे थे. हर राष्ट्रीय जिम्मेदारी के अवसर पर कांग्रेस अवसर ढूंढती है. कैसे, जरा उदाहरण देखिए. जिस समय कारगिल युद्ध में विजय का देश जश्न मना रहा था, हर शहीद के बलिदान पर बलिहारी जा रहा था, कांग्रेस ने ताबूत घोटाले का एक फर्जी जिन्न तैयार कर लिया. कांग्रेस की राजनीति का हिस्सा हिंसा और लाशें रही हैं.
ये सिलसिला 1947 से शुरू हुआ था, आज तक चल रहा है. जिस समय मोहम्मद अली जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन के जरिये हिंदुओं पर कहर बरपा किया, कांग्रेस ने अपने कैडर को उनके सामने खड़ा नहीं किया. दरअसल उस समय की राजनीतिक जरूरत के हिसाब से ये बहुत सुविधाजनक था कि हिंदू और मुसलमान साथ नहीं रह सकते. जिन्ना का डायरेक्ट एक्शन और कांग्रेस की खामोशी (जिसे उस समय हिंदुओं के साथ खड़ा होना चाहिए था) भारत के विभाजन की वजह बना.
आजादी के पहले से ही हिंदुओं और सिखों के कत्ल कांग्रेस की राजनीति को रास आते हैं. कांग्रेस का रुख राष्ट्रविरोधी है, देश की सुरक्षा के लिए खतरा है..क्यों? इसलिए वजूद की लड़ाई लड़ती कांग्रेस मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के चक्कर में एक बहुत खतरनाक सोच और करतूत को समर्थन दे रही है. देश में जिहादी सोच आग लगा रही है. सबसे पहले पश्चिम बंगाल सुलगा. क्यों.. इसलिए कि वहां सबसे अधिक तादाद में बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठिये हैं, जो मौजूदा तृणमूल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के वोटबैंक हैं. ममता बनर्जी ने सड़कों पर हिंसा होने दी. वह अकेली नेता हैं, जो इस मसले पर विरोध मार्च की अगुआई कर सकती हैं. ममता बनर्जी सदा से जिहाद प्रेमी हैं. उनका कांग्रेसी डीएनए ही तो है, जो बंगाल में दुर्गा पूजा पर रोक लगा सकता है. जिहादियों को पश्चिम बंगाल से संरक्षण मिला, तो फिर कांग्रेस और वामपंथियों में भी इसकी होड़ लग गई. सीएए के विरोध के नाम पर जो हो रहा है, वह सिर्फ इस्लामिक ताकत का प्रदर्शन है. कोई और वर्ग इसमें शामिल नहीं है, भले ही तमाम पार्टियों के नेता इसका समर्थन कर रहे हों. इस सिर्फ इस्लामिक विरोध न साबित करने के लिए जामा मस्जिद पर चंद्रशेखर आजाद जैसे संदिग्ध चेहरे का प्रदर्शन किया जाता है. लेकिन इस पूरे विरोध प्रदर्शन में फलस्तीन से लेकर कश्मीर तक फैले जिहादी चरित्र की हर विशेषता है. मसलन विरोध पूरी तरह धार्मिक आधार पर है. विरोध का संचालन मस्जिदों से हो रहा है. इसका सुबूत ये कि जुमे की नमाज के बाद तकरीरें हो रही हैं,
मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से प्रचार हो रहा है और इस सबके साथ दंगे हो रहे हैं. इन प्रदर्शनकारियों के पास पेट्रोल बम हैं, चेहरे पर रुमाल बंधे हैं और पत्थरबाजी की अद्भुत कला है. इनका उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना है. ये फलस्तीनियों या गुजरे जमाने के कश्मीर में उपद्रव मचाने वाले पत्थरबाजों की तरह छापामार अंदाज में हमले करते हैं. इनके वैचारिक केंद्र अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया मिलिया इस्लामिया है. अगर ये विरोध प्रदर्शन है, तो एएमयू में ये नारे क्यों लगते हैं कि हिंदुत्व की कब्र बनेगी, एमएमयू की धरती पर. अगर ये सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन है, तो क्यों आजादी के नारे लग रहे हैं. किससे आजादी. अगर ये विरोध प्रदर्शन है, तो इनके हक में याकूब मेमन की फांसी रुकवाने के लिए आधी रात में सुप्रीम कोर्ट खुलवाने वाले क्यों हैं. कांग्रेस, वामपंथी दल और उन्हीं के डीएनए वाले अन्य दल देश को बेहद खतरनाक राह पर ले जाना चाहते हैं.
असल में ये दल समझ रहे हैं कि हम मुसलमानों का कंधा इस्तेमाल कर रहे हैं. इन्हें नहीं पता कि मुसलमान इनका कंधा इस्तेमाल कर रहे हैं. विशुद्ध मजहबी आधार पर हो रही इस जिहाद को इन दलों का समर्थन राजनीतिक मसला नहीं बना सकता. जबकि पूरे आंदोलन की कमान जमातियों, उलेमाओं और मौलानाओं के हाथ में आ चुकी है, ये राजनीतिक मसला नहीं रह गया है. यह जिहाद है. अभी ये पुलिस और सरकारी मशीनरी को निशाना बना रही है. अगला नंबर बहुसंख्यक समाज का है. एक समय था, जब नारा लगता था कि हाथ में लोटा, मुंह में पान, लेकर रहेंगे पाकिस्तान. हालात उसी ओर जा रहे हैं. डायरेक्ट एक्शन जैसी घटना इसी जुमे को देश ने घटते देखी है. लेकिन बस सुकून इस बात का है कि देश में अब एक मजबूत इरादे वाली सरकार है. ये दृढ़इच्छा शक्ति वाला प्रधानमंत्री है. सरदार पटेल जैसी सोच वाला गृह मंत्री भी है. जरूरत है कि सख्ती के साथ इन जिहादियों से निबटा जाए. यदि जरूरत पड़े तो इनके राजनीतिक हिमायतियों से भी.