हम भी देखेंगे!
   दिनांक 21-दिसंबर-2019
कहां है प्रगतिशीलता! कहां हैं धर्म को गाली देने वाले प्रोफेसर! जिहादियों और कामरेड प्रोफेसर में कोई अंतर है क्या !

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जामिया मिल्लिया इस्लामिया में कट्टरपंथी तत्वों द्वारा दीवार पर लिखे गए नारे। अरबी में लिखा गया है- ‘अल्लाह के सिवाय कोई ईश्वर नहीं है’
राजधानी स्थित देश के एक नामी शिक्षण संस्थान में कम्युनिस्ट आंदोलन में ‘कौमी तराने’ की हैसियत रखने वाला गीत गूंज रहा है-
हम देखेंगे..
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लोह-ए-अज़ल में लिखा है
हम देखेंगे..
गाने वाला छात्र डूबकर गा रहा है। शिक्षकों के वेश में कॉमरेड झूम रहे हैं। सिर हिला रहे हैं, छात्रों को सुर में सुर मिलाने के लिए परोक्ष रूप से उकसा रहे हैं। फैज का यह नगमा सुनने में उम्दा, बढ़िया कसा हुआ है लेकिन क्या इन मासूम बच्चों को पता है कि लोह-ए-अज़ल किस भाषा का शब्द है और इसका अर्थ क्या है? एक छात्र पूछने को हिलता है लेकिन उसे घूरकर, आंख के इशारे से चुप करा दिया जाता है- उर्दू-फारसी को सराहने की बजाय सवाल उठाता है! बेवकूफ!
कुछ पंक्तियों बाद सुर और ऊंचा उठता है-
जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे..
सिर्फ सुर समझ आता है अर्थहीन ढंग से छात्र सिर हिलाते हैं..। कुछ मुंह बिसूरते हैं। अनमना छात्र अपने साथियों को प्रश्नवाचक मुद्रा में देखता है - हमारी पढ़ाई-लिखाई के बीच ये ‘खुदा, काबा और बुत कहां से कूद पड़े!’ कामरेड प्रोफेसर उसे फिर, इस बार जरा हड़काकर, चुप करा देता है।
दरअसल, यह अनमना छात्र ही सारे जमते आंदोलन की आंखों की किरकिरी है। एक महान क्रांतिकारी गीत को यह सवाल के कठघरे में कैसे खड़ा कर सकता है? मक्का से मदीना हिजरत के इतिहास, अहले सफा, मरदूद-ए-हरम का जिक्र छिड़ने पर यह क्यों कॉमरेड प्रोफेसर को घेरता है कि घोर मजहबी उपमाओं और इस्लामी मान्यताओं में छात्रों का क्या काम। हमें इस सबमें मत घसीटिए!
निर्वाचन और लोकतंत्र के खिलाफ खूनी क्रांति की झूमती साम्यवादी हुंकारों में जिहादी उन्माद की बारीक तान चट से पकड़ लेने वाला यह छात्र वास्तव में खतरनाक है!
कॉमरेड खेमे की एक मुस्लिम छात्र नेता के ट्वीट में वह बात उघड़ पड़ती है जो मजहब को अफीम कहने वाले कामरेड सदा से दबाते रहे।
उस ट्वीट के सार में गहरी नफरत गूंजती है- देश का निर्वाचित प्रधान हत्यारा है!.. ‘इंशा अल्लाह’ और ‘अल्लाहू अकबर’ के नारे एकदम ठीक हैं!
कामरेड इस्लाम की अफीम दांतों तले दबाए बैठे हैं।
छात्र का माथा फिर ठनकता है। देश के नामी विश्वविद्यालय में लोकतंत्रात्रिक माहौल के नाम पर क्या-क्या कुछ लिखा था! हिंदी-अंग्रेजी में तो बातें बहुत प्रगतिशील लगती थीं.. उर्दू में क्या लिखा था! अल्लाहू-अकबर!
कहां है प्रगतिशीलता!
कहां हैं धर्म को गाली देने वाले प्रोफेसर!
कहां हैं कठमुल्ले जिहादियों और कामरेड प्रोफेसर में कोई अंतर!
तान और ऊंची उठती है। बात जामिया मिल्लिया इस्लामिया तक पहुंचती है। फिलिस्तीनी ढंग की पोशाकों में खूंखार मंसूबों की शिनाख्त करते हुए बात सीलमपुर में आतंकी तर्ज की आगजनी और पत्थरबाजी तक पहुंचती है।
उधर सुर और उन्मादी होता है-
हम देखेंगे..
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख़्त गिराए जाएंगे..
अनमने छात्र और उसके साथियों के चेहरे तमतमा जाते हैं। उर्दू-फारसी, फिलिस्तीनी पोशाकों और खूनी पत्थरबाजों का राज उन पर खुलने लगता है।
बेपरवाह उन्मादी और भी ऊंची टेर लगाकर ( लेकिन अकेला) झूमता है-
..बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाजिर भी
जो मंजर भी है नाजिर भी
उट्ठेगा अन-अल-हक का नारा
और राज करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा..
लेकिन नहीं! सुर का बोसीदापन, इरादों के खूनी दाग छात्रों पर उजागर हो जाते हैं। भीड़ अब अनमने छात्र और उसके साथियों के साथ है। सवाल सुर से बड़ा है। हमें आपस में लड़ा-लहूलुहानकर, तख्त-ताज उछालकर ही तो तुम आए थे! तो तुम्हारा रूप-गठजोड़ इस बार यह है!
मुट्ठियां तन जाती हैं। जवाबी स्वर गूंजता है-
कामरेड! जिहादी तर्ज की क्रांति और तराने बहुत हुए, तुम ठहरो!
हम देखेंगे! तुम ही नहीं...
लाजिम है कि हम भी देखेंगे!
@hiteshshankar