खबरों में मजहबी राजनीति करता 'चापलूस' मीडिया
   दिनांक 23-दिसंबर-2019
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जिस मीडिया को गुरुग्राम में बस जलाने वाले की जाति पता चल गई उसे बंगाल के दंगाइयों का मजहब नहीं पता
 
नागरिकता कानून को लेकर देश के कुछ हिस्सों में मुस्लिमों की हिंसा का श्रेय मीडिया को भी दिया जाए तो गलत नहीं होगा। जो आग जिहादी और राजनीतिक संगठनों की तरफ से भड़काई जा रही थी मीडिया के एक बड़े वर्ग ने उसमें घी डालने का काम किया। सरकार के मंत्री हर मंच पर स्पष्ट करते रहे कि कानून का भारत के नागरिकों से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन मीडिया के एक जाने-पहचाने वर्ग ने सुनियोजित तरीके से भ्रम फैलाया कि 'इस कानून के लागू हो जाने से मुसलमानों को देश से निकाल दिया जाएगा'। एनडीटीवी और इंडिया टुडे चैनलों पर जिस तरह की बातें लिखी और पूछी गईं वे इस अफवाह को और मजबूत कर गईं। अधिकतर अखबारों की रिपोटिंर्ग भी भ्रम फैलाने वाली थी।
 
क्या यह सामान्य बात है कि जामिया परिसर में 'खिलाफत 2.0' और 'हिंदुत्व से आजादी' के नारे लगाए जाएं और वे इसे छात्र आंदोलन बताएं? कुछ दिन पहले जब बीएचयू के छात्र धरने पर बैठकर हनुमान चालीसा गा रहे थे तब यही मीडिया उनके लिए 'कलंक' और 'गुंडे' जैसे अपशब्द प्रयोग कर रहा था। भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के आंदोलनरत छात्रों का समाचार तक नहीं दिखाया गया, क्योंकि वह कांग्रेस सरकार के विरोध में है। जामिया के प्रदर्शन के दौरान कई चैनलों के संवाददाताओं पर हमले हुए। एबीपी चैनल की एक महिला रिपोर्टर को मजहबी दंगाइयों ने चारों तरफ से घेर लिया। हमलावरों के चेहरे कैमरों में कैद हैं। इसके बजाय सारा जोर इस बात पर रहा कि पुलिस ने छात्रों पर अत्याचार किया। जबकि उन परिस्थितियों की बात नहीं बताई गई, जिनमें पुलिस को कार्रवाई के लिए मजबूर होना पड़ा। घायल दंगाइयों की कहानियां तो दिखाईं, लेकिन घायल पुलिस वालों और आम लोगों की कहानियां छिपा ली गईं, जिन पर राह चलते हमला किया गया था।
 
प. बंगाल में भी ट्रेनों पर हमले के मामलों पर मीडिया ने यही भूमिका निभाई। पथराव में यात्री और बच्चे घायल हुए, उनकी तस्वीरें लगभग गायब कर दी गईं। सोशल मीडिया पर रोते-बिलखते बच्चों की तस्वीरें सामने आईं, लेकिन मीडिया यह बताने में विफल रहा कि हमलावर कौन हैं। यह वही मीडिया है जो आंदोलनों की पहचान 'जाट', 'गुर्जर', 'राजपूत', 'पटेल', 'मराठा' के रूप में करता है। जिसे पता चल गया था कि गुरुग्राम में स्कूल बस पर पत्थर फेंकने वाला किस जाति का है, लेकिन बंगाल में इतनी सारी ट्रेनें जलाने वाले लोग कौन हैं, यह पता नहीं चल पाया! जब झारखंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र्र मोदी ने रैली में बोल दिया कि ट्रेनों पर हमला करने वालों के कपड़े देखकर समझा जा सकता है कि वे कौन लोग हैं, तो तिलमिलाहट देखने लायक थी।
 
मीडिया ने ही एक झूठ फैलाया कि जामिया का छात्र आंदोलन देशभर के विश्वविद्यालयों में फैलता जा रहा है। जबकि सच यह था कि इससे ज्यादा विश्वविद्यालयों में नागरिकता कानून के समर्थन में कार्यक्रम और प्रदर्शन हुए, पर उनकी खबरें और तस्वीरें छिपाई गईं। बीएचयू में नागरिकता कानून के समर्थन में आयोजित मार्च में हजारों छात्र शामिल हुए, लेकिन वह समाचार किसी चैनल पर नहीं दिखा। केरल के एक कॉलेज में नागरिकता कानून पर चर्चा के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्रों ने कार्यक्रम आयोजित किया। वामपंथी संगठनों ने उन पर हमला बोल दिया और छात्रों से मारपीट की। वीडियो सोशल मीडिया पर तो आया लेकिन मुख्यधारा मीडिया ने आंखें मंूद लीं। भ्रम फैलाने में बॉलीवुड की भी बड़ी भूमिका रही। एक जानी-पहचानी टोली ने इसे कुछ इस तरह से प्रचारित किया मानो सेकुलरिज्म खतरे में है। फरहान अ़ख्तर ने ट्विटर पर एक पोस्टर शेयर किया, जिसे पाकिस्तान से चलने वाले एक अलगाववादी समूह ने तैयार किया था। इस पोस्टर में भारत के ऩक्शे से पीओके और अक्साई चिन गायब थे। समझा जा सकता है कि उनके अभियान की बागडोर कहां पर है। हैरानी तब हुई जब रेडियो मिर्ची की एक आर.जे. ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से अपील की कि दिल्ली पुलिस के मुख्यालय पर पहुंचकर घेराव करें। राहुल गांधी के 'रेप इन इंडिया' वाले बयान की देश में भले आलोचना हुई हो, लेकिन चैनलों-अखबारों ने वफादारी निभाने में कोई कोताही नहीं की। किसी ने इस पर कांग्रेस की किसी महिला नेता से प्रतिक्रिया नहीं ली। इसी तरह से अभिनेत्री पायल रोहतगी को सोशल मीडिया पर एक वीडियो के लिए राजस्थान पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। आरोप लगाया गया कि उन्होंने नेहरू के खिलाफ टिप्पणी की है। जो मीडिया अभिव्यक्ति की आजादी कुचले जाने की शिकायत करती रहता है, वह इस मामले पर चुप्पी साधे रहा।