जिहाद के जुनून में बंगाल में मंदिरों पर और हिंदुओं को बनाया गया निशाना
   दिनांक 23-दिसंबर-2019
डॉ. अम्बा शंकर बाजपेयी
नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कथित इशारे पर राज्य के मुसलमान प्रदेश को अस्थिर करने का काम कर रहे हैं। 'शांति प्रदर्शन' की आड़ में कट्टरपंथियों ने जहां करोड़ों-अरबों की सार्वजनिक संपत्ति को स्वाहा किया तो वहीं कई स्थानों पर मंदिरों, घरों एवं हिन्दुओं को निशाना बनाया

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मुर्शिदाबाद एवं हावड़ा जिलों में कट्टरपंथियों ने प्रदर्शन के नाम पर दर्जनों बसों को आग लगाकर खाक किया 
मूल रूप से राजस्थान के रहने वाले राजेश भंवरलाल विश्नोई पश्चिम बंगाल में लंबे समय से स्टील का कारोबार करते आ रहे हैं। 13 दिसंबर को वह व्यावसायिक काम से पांसकुड़ा से कोलकाता वापस लौट रहे थे। इस दौरान दक्षिण-पूर्व मंडल के उलुबेरिया स्टेशन पहुंचे ही थे कि अचानक जिहादियों ने पूरे स्टेशन को चारों तरफ से घेर लिया और नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में जो उपद्रव मचाया उसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता। प्रत्यक्षदर्शी राजेश बताते हैं,''अपराह्न तीन से चार बजे का समय रहा होगा। अचानक चारों तरफ से हजारों की उन्मादी भीड़ ने स्टेशन को घेरना शुरू कर दिया। स्टेशन के अंदर, बाहर, पटरियों पर चारों तरफ मुस्लिमों की भीड़ ही भीड़ दिख रही थी। इसमें छोटे-छोटे बच्चों से लेकर वृद्ध तक शामिल थे। यह भीड़ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी। उसका इरादा एकदम स्पष्ट था। इससे पहले कोई कुछ समझ पाता उलुबेरिया स्टेशन उन्माद स्थल में तब्दील में बदल गया। कट्टरपंथी तोड़फोड़, आगजनी, पत्थरबाजी, लूटपाट और आम नागरिकों को निशाना बनाने लगे। इस दौरान जो भी रेल आइंर् उस पर जिहादी भीड़ ने जमकर पत्थरबाजी की। सत्ता के शह पर चला यह उन्माद घंटों चलता रहा। इस दौरान जिसने भी देखा, उसके रोंगटे खड़े हो गए। ऐसे में वहां उपस्थित अधिकतर लोगों के मन में सवाल उठे कि करोड़ों-अरबों की सार्वजनिक संपत्ति को स्वाहा करने वालों का ये कैसा 'शांति प्रदर्शन' है? क्या ऐसा कोई भारतीय नागरिक कर सकता है? क्या स्थानीय शासन-प्रशासन इस पूरी सिाजश का सूत्रधार है? खैर, काफी मशक्कत के बाद सड़क मार्ग से देर रात घर तो पहुंचा लेकिन कट्टरपंथियों का जो आतंक देखा, उसने रातभर सोने नहीं दिया। चिंता थी कि यह कबीलाई भीड़ बिना कुछ जाने-समझे नेताओं के बहकावे पर अराजकता फैलाने लगती है। ऐसे में इनकी निर्बाध बढ़ती जनसंख्या भविष्य के भारत के लिए कितना बड़ा संकट है, यह वही महसूस कर सकता है जो उस दिन उलुबेरिया स्टेशन पर था।''
राजेश अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं जो उस दिन उस रेलवे स्टेशन पर फंसे थे बल्कि सैकड़ों लोग हैं जो उस दिन राज्य में अलग-अलग जगहों पर उन्माद के प्रत्यक्षदर्शी बने या फिर उसका शिकार। इन लोगों ने जिहादियों की अमानुषिकता को अपनी आंखों से देखा और महसूस किया। सोशल मीडिया में अपनी आपबीती लिखी।
आखिर कौन हैं दंगों के पीछे?
देश की संसद के उच्च सदन में गत दिनों जब नागरिकता संशोधन विधेयक पर चर्चा चल रही थी तब कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल ने कहा था,''गृहमंत्री जी, देश का मुसलमान आपसे बिलकुल नहीं डरता।'' ठीक ऐसी ही बात कुछ समय पहले राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कही थी कि अगर 'सीएए' लागू हुआ तो 'देश में गृह युद्ध' होगा। इन बयानों के बाद काफी हद तक चीजें स्पष्ट हो जाती हैं कि आखिर देश एवं राज्य में फैली इस अराजकता के पीछे कौन हैं!
ममता बनर्जी और उनके नेता लंबे समय से तुष्टीकरण की नीति पर चल कर बांग्लादेशी मुसलमानों को पालते चले आ रहे हैं। राज्य के कई जिलों में अवैध घुसपैठियों की तादाद इतनी बढ़ गई है कि वह तुष्टीकरण करने वाले दलों की चुनाव में हार-जीत का फैसला करते हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि वोट बैंक की राजनीति ममता से कुछ भी करवाएगी और जिहादियों को शह मिलते ही वे कुछ भी कर गुजरने में परहेज नहीं करेंगे। पिछली 13 दिसंबर को जुमे की नमाज के बाद राज्य के मुस्लिम समुदाय द्वारा मालदा, मुर्शिदाबाद, 24 उत्तर-दक्षिण परगना, हावड़ा, मिद्नीपुर क्षेत्रों में जमकर उत्पात मचाया गया। 'शांतिपूर्ण प्रदर्शन' के नाम पर भारत सरकार के प्रतिष्ठानों में तोडफोड़, आगजनी कर उन्हें आग के हवाले कर दिया गया। राष्ट्रीय राजमार्ग-34 पर अवरोध उत्पन्न करके यात्री बसों को आग के हवाले कर दिया। कोयना एक्सप्रेस हाईवे पर खड़ी 30 बसों को एक साथ फूंक कर कट्टरपंथियों ने जमकर उत्पात मचाया। इस दौरान रेलवे को सबसे ज्यादा क्षति पहुंची। खबरों की मानें तो बंगाल में दो दिन हुई लगातार हिंसा में विभिन्न स्टेशनों में तोड़फोड़ और आगजनी से रेलवे को 100 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ है। उलुबेरिया, काउडि़या, सांकराइल आदि स्टेशनों में जिहादियों की तोड़फोड़ और आगजनी से अकेले दक्षिण पूर्व रेलवे को 15,77,33,779 करोड़ और पूर्व रेलवे को 85 करोड़ से अधिक का नुकसान पहुंचा है।

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 नागरिकता संशोधन कानून बनने के बाद मजहबी उन्मादियों ने समूचे बंगाल में अराजकता फैला दी
 
बढ़ते घुसपैठिए
पश्चिम बंगाल में 30 फीसद से ज्यादा मुस्लिम आबादी है। इस आबादी में एक बड़ी संख्या बांग्लादेशी घुसपैठियों की है जो सीमावर्ती-मुर्शिदाबाद, मालदा, नादिया, 24 उत्तर-दक्षिण परगना आदि जिलों में घुसपैठ कर सत्ता के संरक्षण में बस गए हैं। इन सभी क्षेत्रों में जमाते-मुस्लिम ऑफ बांग्लादेश का बहुत ज्यादा प्रभाव है तो वहीं तुष्टीकरण नीति के चलते यह समूचा एकमुश्त वोट बैंक वर्तमान की तृणमूल सरकार के पास है। यही वोट बैंक पहले सीपीएम के साथ हुआ करता था लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद मुसलमानों ने अपना पाला बदल लिया। और यही कारण रहा कि प्रदेश के 2011 व 2016 में हुए विधान सभा चुनाव में तृणमूल की जीत हुई। यह सिलसिला लोकसभा-2019 के चुनाव में भी जारी रहा। हालांकि ममता की पार्टी 12 लोकसभा सीटें हारी लेकिन उसके वोट में 3 फीसद की बढ़ोतरी हुई। वोट के इसी गुणा-भाग का सारा खेल है। नागरिकता संशोधन कानून बनने के बाद ममता बनर्जी बौखलाई हुई हैं। क्योंकि उन्हें अब लगता है कि केंद्र सरकार जल्द ही एनआरसी लाएगी जिससे राज्य में रह रहे 16 से 17 फीसद घुसपैठियों का वोट बैंक ध्वस्त हो जाएगा। बांग्लादेशी घुसपैठियों को बचाने की चिंता में ममता 'गृहयुद्ध' तक की धमकी देने तक से बाज नहीं आ रहीं।
 
भ्रामकता फैला रहे कट्टरपंथी संगठन
सत्ताधारी दल तृणमूल के अलावा असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इस्तेहादुल मुस्लिमीम, पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया एवं सिमी जैसे संगठन मुस्लिमों को भड़काने-उकसाने में लगे हुए हैं। कट्टरपंथी राज्य के मुस्लिमों को भड़का रहे हैं कि नागरिकता संसोधन कानून से देश का मुसलमान अपनी नागरिकता खो देगा। जबकि देश के गृह मंत्री एवं प्रधानमंत्री बार-बार इस भ्रामकता को दूर कर रहे हैं। वे कह रहे हैं,''यह कानून तीन देशों के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का कानून है न कि किसी की नागरिकता लेने का। देश के मुसलमानों को इससे डरने की कोई जरूरत नहीं है।'' बावजूद इसके देश के सेकुलर दल एवं कट्टरपंथी संगठन मुसलमानों को बरगला कर भड़का रहे हैं। इस सबका परिणाम है कि पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रही है। पूरे राज्य में अराजकता का माहौल बना हुआ है।
आखिर क्या है ममता का इरादा ?
कोलकाता के जाने-माने पत्रकार सुमन भट्टाचार्य पिछले 25 सालों से ममता की राजनीति को नजदीक से देखते आ रहे हैं। वे बताते हैं कि जिस तरह ममता बनर्जी वर्तमान में बौखलाई हुई हैं, शायद इससे पहले कभी इतनी आवेश में नहीं दिखी हैं। 16 दिसंबर को कोलकाता में हुई ममता की रैली का जिक्र कर वे बताते हैं,''इस रैली में पार्क-सर्कस व राजाबाजार के मुस्लिम ही शामिल हुए। यहां का नजारा ऐसा लग रहा था जैसे तृणमूल केवल मुस्लिमों की पार्टी बनकर रह गई है। ऐसा पहली बार हुआ कि सामान्य बंगाली समुदाय से कोई भी इस रैली में शामिल नहीं हुआ।'' वे बताते हैं,''2017 में हुए पंचायत चुनाव से ममता बनर्जी की छवि एक लोकप्रिय नेता से अराजकता फैलाने वाली नेता के रूप में बन गई है। अपने बयानों से वह हिन्दुओं को डराती हैं और मुसलमानों को उकसावा देती हैं। जब ममता 2011 में पहली बार प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं तो सामान्य लोगों में बहुत ही उत्साह का माहौल था। सभी को विश्वास था कि ममता बनर्जी प्रदेश को अपनी 'ममता' से सराबोर करंेगी लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। अपने दूसरे कार्यकाल में वह सामान्य लोगों के हितों को सुरक्षा देने में पूरी तरह से असफल साबित हो रही हैं।''
अपने खोते हुए जनाधार को बनाए रखने के लिए ममता बनर्जी अपनी सियासी नैया मुस्लिमों के कंधों का सहारा लेकर ही पार करने की ठाने हुए हैं। यही वजह है कि वह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर मुस्लिमांे को भड़का रही हैं। वे मुस्लिमों को उकसाते हुए बार-बार बोल रही हैं कि 'एनआरसी लागू होते ही यहां के मुसलमान अपनी नागरिकता खो देंगे। ' इसके लिए उनकी पार्टी रैली, पर्चे, सोशल मीडिया, बैनर, पोस्टर का सहारा ले रही है। यही वजह रही कि जब दोनों सदनों ने नागरिकता संशोधन विधेयक पारित हुआ किया तो बंगाल के मुसलमानों ने ममता के इशारे पर राज्य में खुलेआम अराजकता फैलाई और स्थानीय प्रशासन सब देखता रहा।

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रेलवे स्टेशन पर खड़ी एक ट्रेन को निशाना बनाता उपद्रवी
 
पहले किया समर्थन, अब पलटीं
प्रदेश के सामान्य लोगों को जानना चाहिए कि वामपंथी नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु, पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री इन्द्रजीत गुप्त और खुद ममता पूर्व में 'कैब' के समर्थन में पहले की केंद्र सरकार को चिट्ठी लिख चुके हैं। इन्द्रजीत गुप्त ने लोकसभा में लिखित में यह बयान दिया था कि पश्चिम बंगाल में एक करोड़ से भी अधिक बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिये हैं। इसी तरह 2005 में ममता जब टीएमसी की एकमात्र सांसद थीं तो उन्होंने सदन को इसका पूरा ब्योरा दिया था और यह बताया था इन घुसपैठियों के चलते सीपीएम सौ से अधिक विधान सभा सीटों को जीतती है या बढ़त बनाती रही है। यह भी ध्यान दिलाया था कि कैसे यह घुसपैठिये राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बने हुए हैं। लेकिन अब वही ममता इन घुसपैठियों की हमदर्द बनी हुई हैं।
क्यों बनाया रेलवे को निशाना !
पश्चिम बंगाल में रेलवे का संजाल बहुत व्यापक है। दूसरी बड़ी बात कोलकाता, हावड़ा, सियालदह एवं खड़कपुर से प्रतिदिन देश के विभिन्न भागों के लिए लंबी दूरी की ट्रेनों का संचालन होता है। उत्तरपूर्व की सभी गाडि़यों का रास्ता उत्तर बंगाल के मुर्शिदाबाद व मालदा होकर ही गुजरता है। उत्तर एवं दक्षिण रेलवे की लगभग 1400 लोकल ट्रेनों का संचालन राज्य के विभिन्न जिलों तक होता है। ऐसे में राज्य को स्थिर करने के लिए रेल को निशाना बनाना सबसे आसान है। इससे पूरे जनजीवन को अस्त-व्यस्त किया जा सकता है और यहां नुकसान करने से केंद्र को एक कड़ा संदेश जाएगा। कट्टरपंथी संगठनों ने ऐसा ही किया। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन में राज्य के मिद्नीपुर, मुर्शिदाबाद, कृष्णपुर, बेलडांगा रेजिनगढ़, अकरा-24 दक्षिण परगना, उलुबेरिया, नोआपाड़ा-मोहिषासुर, भालुका-मालदा, लालगोला-संकराइल व मुरारे स्टेशनों को जिहादियों ने भारी क्षति पहुंचाई।
कार्रवाई नहीं करने का था फरमान
प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी वैसे तो ट्वीटर पर काफी सक्रिय रहती हैं, लेकिन जब पूरा राज्य जल रहा था तो उनकी ओर से न शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील हुई, न अराजक तत्वों पर कड़ी कार्रवाई करने का कोई ट्वीट आया। सूत्रों की मानें तो उन्होंने राज्य के जिलाधिकारियों व पुलिस अधिकारियों को यह आदेश दिया था कि प्रदर्शन के दौरान न तो पुलिस किसी को गिरफ्तार करेगी और न ही कोई कड़ी कार्रवाई करेगी। यही कारण रहा कि राज्य भर में मुस्लिमों ने जमकर अराजकता फैलाई। इस दौरान लूटपाट से लेकर पुलिस के जवानों तक को निशाना बनाया गया।
बहरहाल, नागरिकता संशोधन कानून के बाद राज्य में हुए प्रदर्शनों में जिस तरह से लाखों-करोड़ों की सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, उससे सवाल उठता है कि जिन लोगों ने अपने ही घर को आग लगाई हो, वह इस देश के नागरिक कैसे हो सकते हैं! लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना सबका हक है लेकिन अराजकता फैलाने का अधिकार, कट्टरपंथियों को किसने दिया? इन सवालों के जवाब उन सभी लोगों को देने होंगे जो इन प्रदर्शनों को जायज बता रहे हैं और 'शांतिपूर्ण' करार दे रहे।