प्रयागराज में श्रद्धेय अशोक सिंहल स्मृति व्याख्यान संपन्न
   दिनांक 23-दिसंबर-2019
 
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 मंच पर उपस्थित (बाएं से) डॉ. मुरली मनोहर जोशी एवं डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी 
 
व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि न केवल सारे संत समाज ने उन्हें स्वीकार किया, अपितु देश ने भी श्रद्धेय अशोक जी को एक कुशल संगठनकर्ता के रूप में देखा।  
 
गत दिनों अरुंधती वशिष्ठ अनुसंधान पीठ, प्रयाग द्वारा श्रद्धेय अशोक सिंहल स्मृति व्याख्यान का आयोजन प्रयागराज स्थित मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के प्रीतम दास प्रेक्षागृह में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने स्व. अशोक सिंहल के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि न केवल सारे संत समाज ने उन्हें स्वीकार किया, अपितु देश ने भी श्रद्धेय अशोक जी को एक कुशल संगठनकर्ता के रूप में देखा। उन्होंने अनेक मत, पंथ के मेल से विकसित भारतीय संस्कृति एवं जीवन की मूलधाराओं को एक साथ लाकर देश में हिंदू संस्कृति को बचाने के लिए अभूतपूर्व कार्य किया। अशोक जी हिंदू समाज के संरक्षक के रूप में देशभर में मान्य हुए और एक ऐसा वातावरण तैयार किया जिसके परिणामस्वरूप आज हिंदू संस्कृति और मान्यताओं का देश-विदेश में आदर हो रहा है। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वे जहां कहीं भी हैं, वहां से यदि लौटकर आएं तो भारतभूमि पर और प्रयाग में ही आएं तथा एक बार पुन: हम सभी का मार्गदर्शन करें। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा कि धर्म आस्था के साथ पूर्ण होता है। यदि हमारी आस्था नहीं है तो फिर हम धर्म के बारे में कुछ नियम भी नहीं बना सकते। संविधान की प्रस्तावना में भी आस्था का उल्लेख है। संविधान की प्रस्तावना को कभी संशोधन के द्वारा हटाया नहीं जा सकता, क्योंकि यह आधारभूत ढांचा है। यह आधारभूत ढांचा 1980 के बाद निर्धारित हुआ, क्योंकि संविधान का संशोधन अनुच्छेद 368 के आधार पर होता है और आपातकाल के बाद इसके दुरुपयोग की संभावना को देखते हुए संविधान की मूलभूत संरचना में जिन तत्वों को रखा गया है उसमें आस्था एक है। उस पर न्यायालय भी अपनी राय नहीं दे सकता है। -प्रतिनिधि