यह है जामिया से जाफराबाद तक जहर फैलाने वालों की हकीकत
   दिनांक 23-दिसंबर-2019
दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय और जाफराबाद में जो हुआ, वह एक सोची-समझी साजिश थी। इसकी पटकथा लिखने वालों में जिहादी और सेकुलर तत्वों के साथ-साथ कांग्रेस, और आम आदमी पार्टी के नेता भी शामिल हैं। उसी पटकथा को मुम्बई, लखनऊ, बेंगलूरु आदि शहरों में दुहराया जा रहा है

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दिल्ली में मजहबी कट्टरवादियों द्वारा जलाई गई एक बस
 जामिया मिल्लिया इस्लामिया की तरफ देशभर के पत्रकारों की नजर 15 दिसंबर को दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के बाद गई। विश्वविद्यालय के छात्र नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे थे। इस विरोध में 15 दिसंबर को जामिया के छात्रों की तरफ से ये नारे लगे-'मेरा तुम्हारा रिश्ता क्या', या इलाहा इलल्लाह।' इसी प्रदर्शन के दौरान जामिया के छात्रों ने दीवार पर लिखा, 'खिलाफत 2.0'।
ये सारी बातें उन लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करने वाली थीं, जो 'इलाहा इलल्लाह' पर यकीन करते थे। या फिर उन लोगों को खींच कर जामिया तक ले आई जो खिलाफत को समझते थे। जब इस मानसिकता के लोग आंदोलन में शामिल हो गए तो फिर इसे ऐसे भी छात्रों का आंदोलन नहीं रह जाना था। यह पूरी तरह से जामिया के छात्रों के हाथ से फिसल कर खिलाफत में यकीन करने वालों के हाथ में चला गया था। जब जामिया में अफवाह का एक बड़ा तंत्र सक्रिय हो गया और वहां झूठी खबरों की बाढ़-सी आ गई। उसके बाद ऐसा लगा कि इसे नियंत्रित करना आसान नहीं होगा। उस वक्त तक यह भी साफ हो चुका था कि इस पूरे आंदोलन की पटकथा कोई और लिख रहा है। जिस पटकथा में जामिया के छात्र अपना-अपना किरदार निभा रहे हैं।
इस बात की तरफ किसी पत्रकार का ध्यान नहीं गया। 15 दिसंबर को हुए प्रदर्शन का एक छोटा पूर्वाभ्यास जामिया के गेट नम्बर सात पर 13 दिसंबर को किया गया था। जो खबर नहीं बनी। यह प्रदर्शन था जामिया 'एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ एसोसिएशन' का। एसोसिएशन के महासचिव नसीम अहमद के हस्ताक्षर से जारी एक पत्र में लिखा गया है, ''जामिया एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ एसोसिएशन, एसआरके एसोसिएशन, जामिया स्कूल टीचर्स एसोसिएशन और जामिया टीचर्स एसोसिएशन नागरिक संशोधन कानून के विरोध में हैं।'' 13 दिसंबर, 2019 को दोपहर 2 बजे गेट नम्बर सात पर जामिया के कर्मचारियों और जामिया बिरादरी में जो लोग खुद को शामिल मानते हैं उनसे निवेदन किया गया कि विरोध प्रदर्शन में शामिल हों।
14 दिसंबर को दिल्ली में कांग्रेस की 'भारत बचाओ' रैली थी और 15 को जामिया का प्रदर्शन उग्र हो उठा। 15 के बाद से जहां नागरिकता संशोधन कानून पर देशभर में नए सिरे से चर्चा होनी चाहिए थी, वहीं चर्चा के केंद्र में जामिया के छात्र आ गए। देशभर में विमर्श का विषय नागरिकता के सवाल की जगह जेएनयू की राह पर चल पड़े जामिया के छात्र हो गया।
दिल्ली में दो महीने बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं। मुसलमानों के वोट को आम तौर पर चुनावों में फसल की तरह देखा जाता है, क्योंकि माना जाता है कि मुसलमानों का मत जहां भी जाएगा, एकमत से जाएगा। यह उनकी एकता और उनकी गतिविधियों के केंद्र में नमाज और मस्जिद के अनिवार्य तत्व होने का परिणाम है। यदि मस्जिद और नमाज उनकी जिंदगी में इतने महत्वपूर्ण तत्व नहीं होते, तो कॉमरेड गीतकार जावेद अख्तर, पत्रकार राणा अयूब से लेकर छात्र नेता उमर खालिद तक को समय- समय पर यह बताने में हिंदू कम्युनिस्टों की तरह थोड़ा संकोच होता कि वे मुसलमान हैं।
दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी यह मान कर चल रही हैं कि दिल्ली का मुसलमान भाजपा की तरफ जाएगा नहीं। अब उसके सबसे बड़े हमदर्द बनकर ही उन्हें अपने पाले में शामिल किया जा सकता है। हमदर्द दिखने के लिए 'दर्द' होना भी जरूरी है। इसलिए नागरिकता संशोधन कानून जैसी चिंगारी बैठे-बिठाए दोनों दलों को मिल गई है। अब दोनों दल मिलकर इसे हवा देने का काम कर रहे हैं।
झारखंड के बरहेट में एक चुनावी जनसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस तरफ इशारा करते हुए कहा भी, ''कांग्रेस और उसके चेले-चपाटे नागरिकता संशोधन कानून के मुद्दे पर मुसलमानों को भड़का और डराकर अपनी राजनीतिक खिचड़ी पकाना चाहते हैं। मैं कांग्रेस सहित उन तमाम दलों को खुली चुनौती देता हूं कि अगर उनमें हिम्मत है, तो वे खुलकर घोषणा करें कि वे पाकिस्तान के हर नागरिक को भारत की नागरिकता देने को तैयार हैं।'' यह तो तय है कि इस तरह का बयान न आम आदमी पार्टी देगी और न यह चुनौती कांग्रेस स्वीकार करेगी। ये दोनों दल अपूर्वानंद जैसे प्राध्यापक, कॉलिन गोंजाल्विस, अखिल गांधी जैसे वकील, फराह नकवी जैसी लेखिका, अमानतुल्लाह खान जैसे विधायक, मानवी और रवीश जैसे पत्रकारों का इस्तेमाल कर सकते हैं। जो अपनी निष्पक्षता जाहिर करने के लिए कभी कांग्रेस के पक्ष में नहीं बोलते, बल्कि इन सभी में यह बात सामान्य है कि सब भाजपा के विरोध में अपनी पूरी ताकत लगाने को तैयार रहते हैं। इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि इनके काम करने की शैली कितनी रणनीतिक है और ये अपनी कार्यशैली को लेकर कितने प्रतिबद्ध हैं।
नागरिकता संशोधन कानून को लेकर जामिया में 15 दिसंबर को प्रदर्शन चल रहा था। किसी का ध्यान उनकी तरफ नहीं गया। शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर यूं भी इस देश में लोगों की नजर कम ही जाती है। इसलिए रक्षा का हमारा बजट बढ़ता जा रहा है। अभी सौहार्द के बजट के संबंध में हमने विचार भी नहीं किया है, जबकि सरकारों को 'शांतिपूर्ण प्रदर्शन' करने वालों के साथ संवाद कैसे स्थापित हो, इसको लेकर गंभीरता से विचार करना चाहिए। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) के दिल्ली प्रदेश सचिव सिद्धार्थ यादव का यह सुझाव काबिले गौर है कि छात्र संगठनों को ऐसे मुद्दों पर अलग- अलग विश्वविद्यालय परिसरों में परिचर्चा आयोजित करनी चाहिए। यादव ने जामिया के छात्रों को जामिया परिसर में नागरिकता कानून पर बहस के लिए अपनी सहमति भी दी। छात्रों को भी लोकतांत्रिक और अहिंसक तरीके से ही अपने आंदोलन को आगे बढ़ाना चाहिए।
जामिया में ऐसा हो भी रहा था, लेकिन शाम छह बजे जैसे ही गेट नंबर सात पर शाकिर अली के प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गोली से मौत की अफवाह उड़ी, उसके बाद सारा आंदोलन हिंसक हो गया। कथित तौर पर कोटा के इस छात्र की तलाश भी किसी छात्र ने नहीं की। किस अस्पताल में है और कहां गोली लगी, यह तक जानने का किसी ने प्रयास नहीं किया। वास्तव में यही वह जाल था जिसमें जामिया के छात्र फंसे और फिर फंसते चले। अगले लगभग चौबीस घंटे जामिया में वाट्सएप से आ रही झूठी खबरों का ही राज रहा। एक समय तो जामिया में 'मरने वाले' लड़कों की संख्या छह तक चली गई। जिसे बाद में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की पहली महिला कुलपति प्रो. नजमा अख्तर को प्रेस कांफ्रेंस करके स्पष्ट करना पड़ा कि एक भी छात्र की मृत्यु नहीं हुई है।

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दिल्ली के सीलमपुर में पुलिस पर पत्थर फेंकते मजहबी दंगाई
उसके बाद फिर अफवाह तंत्र सक्रिय हुआ कि पुलिस ने गोली मारी है। एक छात्र को लगी है। वह खतरे से बाहर है। गोली चली थी और एक छात्र को लगी थी, यह बात सच साबित हुई लेकिन वह गोली पुलिस की थी, यह बात झूठी साबित हो गई।
कुछ लोग यह माहौल बनाने में लगे हैं कि पूरे देश में छात्रों का प्रदर्शन चल रहा है, जबकि सचाई यह है कि जिन विश्वविद्यालयों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, उनमें एक भी ऐसा नहीं है जहां इस प्रदर्शन की अपेक्षा नहीं थी और अचानक छात्र विरोध का झंडा लेकर निकल आए हों। ये तो 2014 से ही बहाने ढूंढ-ढूंढ कर प्रदर्शन कर रहे हैं, क्योंकि इस प्रदर्शन में चाहे सामने से छात्र नजर आएं लेकिन पीछे पूरी ताकत से इनके शिक्षकों की वैचारिक राजनीति खड़ी होती है। जो जाधवपुर, जामिया और जेएनयू के मामले में साफ-साफ नजर आई। बहरहाल, जिस देश में 900 विश्वविद्यालय हों, 40,000 कॉलेज, 11,000 स्वतंत्र शैक्षणिक संस्थान, उस देश में यदि 22 संस्थानों में यदि कोई प्रदर्शन चल रहा हो तो उसे देशव्यापी नहीं कहा जा सकता।
जामिया में भड़की हिंसा से एक दिन पहले विश्वविद्यालय के ही छात्र इस आंदोलन के इस्लामीकरण में लग गए थे। छात्रा लदीदा फरजाना का वीडियो (जिसमें वह अपने एक साथी को पुलिस के सामने आकर बचाती हुई एक नजर आ रही है) बहुत वायरल हुआ। बाद में उसके ताल्लुकात अंग्रेजी पत्रकार बरखा दत्त से निकले। बरखा पहले से नागरिक कानून के विरोध में शामिल थी। इसलिए सोशल मीडिया में इस तरह की चर्चा रही कि कहीं ''इस पूरे मामले की पटकथा लिखने वाली टीम में बरखा दत्त तो शामिल नहीं थी।''
लदीदा के संबंध देश-विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहने की वजह से प्रतिबंधित इस्लामिक संगठन जमाते इस्लामी से रहे हैं। लदीदा को शौहर शियस पेरुमथुरा इसी संगठन की एक इकाई स्टूडेंट इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन (एसआईओ) का सचिव है। जमाते इस्लामी की स्थापना 1941 में हुई थी। यह इस्लामिक राष्ट्र में यकीन रखने वाला संगठन है। यह देश में शरिया कानून की वकालत करता है।
जामिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में लग रहे भड़काऊ नारों की अनदेखी कर सेकुलर पत्रकार बार-बार लिखते रहे कि 'यह छात्रों का संघर्ष है'। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में एक नारा लगाया गया, 'हिंदुओं की कब्र खुदेगी, एएमयू की धरती पर'। एक सेकुलर पत्रकार ने इसे सही ठहराते हुए कहा, ''वहां हिंदू नहीं, हिंदुत्व की कब्र खोदने की बात कही गई थी।'' यह बेहद कमजोर तर्क था। ऐसे में 'मार भगाओ मुल्ला-काजी' जैसे नारों को भी सही ठहराया जा सकता है, क्योंकि मुल्ला-काजी का अर्थ आम भारतीय समाज कट्टर मुल्ला से लगाता है। क्या अब सेकुलर पत्रकार छात्रों को 'मार भगाओ मुल्ला-काजी' कहने की इजाजत देंगे?
 
जामिया में हुई छात्रों द्वारा हिंसा के बाद सिनेमा कलाकार फरहान अख्तर ने भी अब अपनी सेकुलर छवि को किनारे रखकर सोशल मीडिया पर मुसलमानों से अपील की है कि विरोध करने का समय खत्म हुआ। इसके बाद उन्होंने सड़क पर उतरने की तारीख की घोषणा कर दी-19 दिसंबर को क्रांति मैदान, मुम्बई। फरहान अख्तर ने अपने ट्वीट के साथ नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिक पंजी से जुड़ी एक तस्वीर भी ट्वीट की है। फरहान अख्तर की तरह जावेद जाफरी ने भी 19 तारीख को क्रांति मैदान आने की अपील की।
फरहान अख्तर के अपील वाले ट्वीट पर आईपीएस अधिकारी संदीप मित्तल ने लिखा, ''आपको यह भी जानने की आवश्यकता है कि आपने एक अपराध किया है।'' साथ में मित्तल ने अख्तर से अनुरोध किया, ''कृपया उस देश के लिए सोचिए, जिसने आपको जीवन में सब कुछ दिया।'' इन सबके बीच संयुक्त राष्ट्र अब साफ शब्दों में कह रहा है, ''पाकिस्तान में हिंदू और ईसाइयों की पांथिक स्वतंत्रता की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। पाकिस्तान में सिर्फ अहमदियों को छोड़कर बाकी सभी मुसलमानों का मजहब सुरक्षित है।'' संयुक्त राष्ट्र यह भी कह रहा है कि पाकिस्तान में ईसाई और हिंदुओं की महिलाओं और बच्चियों का अपहरण किया जा रहा है। उन्हें मुसलमान बनाया जा रहा है। 'तेरा-मेरा रिश्ता क्या' कहने वाले क्या लानत भेजेंगे ऐसे मुल्क पर, जहां अल्पसंख्यकों के पास पांथिक आजादी तक नहीं है! एक अल्पसंख्यक के नाते उन्होंने दूसरे मुल्क के अल्पसंख्यकों का दर्द समझा होता तो वे नागरिकता संशोधन कानून का विरोध नहीं करते। संयुक्त राष्ट्र की कमीशन ऑन स्टेटस ऑफ वीमेन (सीएसडब्ल्यू) की रपट कहती है, ''पाकिस्तान सरकार हिंदुओं पर हमले करने के लिए कट्टरवादी विचारों को बढ़ावा दे रही है।'' कमीशन ने 47 पन्नों की रपट को 'पाकिस्तान : पांथिक स्वतंत्रता पर हमला' नाम दिया है।
उम्मीद है कि पड़ोसी देश में रह रहे अल्पसंख्यकों के इस हाल को पढ़कर विरोध प्रदर्शन में शामिल कुछ मुस्लिम युवाओं, छात्रों और कट्टरवादियों का हृदय परिवर्तन होगा।
जामिया के हिंसक आंदोलन पर उठ रहे सवाल
-यदि जामिया का आंदोलन शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन था, तो वहां 'तेरा-मेरा रिश्ता क्या', या 'इलाहा इलल्लाह' जैसे नारे किसके लिए लगाए जा रहे थे?
-वे कौन से छात्र थे, जो 'खिलाफत 2.0' दीवारों पर लिखकर छात्रों के आंदोलन को विशुद्ध मुसलमानों का आंदोलन बना रहे थे?
-यदि आंदोलन में बाहरी मुसलमान 'इलाहा इलल्लाह' सुनकर दाखिल हो भी गए तो इन घुसपैठियों से खुद को अलग करने के लिए छात्रों ने क्या प्रयास किए?
-यदि खुद को अलग करना इन्हें सही नहीं लगा, क्योंकि इनका ही यह आंदोलन था तो फिर आंदोलन में घुसपैठ कर रहे मुसलमानों की शिकायत उन्होंने दिल्ली पुलिस से क्यों नहीं की?
-यदि हिंसा करने वाले तत्व छात्रों के बीच पनाह ले रहे थे, फिर दिल्ली पुलिस कैसे पहचान करती कि कौन पत्थरबाज है और कौन छात्र?
-आंदोलन में घुसपैठ कर रहे गुंडा तत्वों से छात्रों ने दूरी क्यों नहीं बनाई?
-कांग्रेस जाकिर हुसैन कॉलेज के ठीक सामने रामलीला मैदान में भारत बचाओ रैली 14 दिसंबर को करती है और 15 को जामिया के आसपास दिल्ली जलने लगती है। क्यों?
-15 को जामिया के दंगाइयों के साथ आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्ला खान थे। अमानतुल्ला ने सफाई दी,''मैं शाहीनबाग में हुए प्रदर्शन में था। मैं सरिता विहार जाने वाली रोड की तरफ था। वहां कोई हिंसा नहीं हुई।'' लेकिन उनसे जुड़े दो वीडियो वायरल हुए हैं। पहले में वे दूर से नजर आ रहे हैं। इसकी जांच होनी चाहिए कि वे दंगाइयों के साथ थे या नहीं। दूसरे वीडियो में वे मुसलमानों को भड़का रहे हैं, ''1947 से पहले सभी संसाधनों पर मुसलमानों का कब्जा था। वे सारे चले गए। मुसलमानों के साथ 48,000 फसाद हुए। एक में भी कार्रवाई नहीं हुई। सिखों के साथ एक फसाद हुआ 84 में। एक फसाद के अंदर एक्शन हुआ। आज भी सज्जन कुमार जेल में हैं।''