अटल जी के शब्द और संस्मरण हमें प्रेरणा देते हैं
   दिनांक 25-दिसंबर-2019
 नरेन्द्र मोदी
इतिहास में अलग-अलग समय पर ऐसे महापुरुष हुए, जिन्होंने संपूर्ण मानवता पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। वो भले ही संसार से चले गए हों, लेकिन उनके विचार, उनके आदर्श, उनका आचरण, उनके शब्द और उनसे जुड़ी कहानियां और संस्मरण लगातार हमारे मन-मस्तिष्क को प्रेरणा देते हैं। उनके सपने पूरे करने की जो हमारी जिम्मेदारी है, ये हमें उसका स्मरण भी कराते हैं। हम सबके प्रिय अटल बिहारी वाजपेयी भी एक ऐसे ही महापुरुष थे

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कई अवसरों पर अटलजी के बारे में लिखा और बोला है, लेकिन यहां इस फोरम पर लिखना थोड़ा अलग है। आखिरकार, अटलजी ने पाञ्चजन्य को अपनी शैली में एक अलग ही पहचान दी। उस समय, जब न तो टेलीविजन आया था और न ही सोशल मीडिया था, तब समाचार आने में बहुत वक्त लगता था और समाचार के माध्यम भी सीमित थे। उस दौरान एक पत्रकार के रूप में अटलजी का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। एक तरह से ये अटलजी का सबसे प्रिय काम था, क्योंकि बेबाकी, निर्भीकता और बिना किसी दबाव के अभिव्यक्ति उनके स्वभाव का हिस्सा थी।
1940 के दशक के शुरूआती वर्षों में भारत की स्थिति की कल्पना कीजिए। आजादी बहुत नजदीक थी, लेकिन तब भी दूर दिखती थी। दुनिया खतरनाक तरीके से युद्ध में घिरी हुई थी और हर तरफ अनिश्चितता का वातावरण था। ऐसे समय में, ग्वालियर के एक युवा ने अपना जीवन देश-सेवा और अपने देशवासियों की भलाई के लिए समर्पित करने का फैसला किया।
राष्ट्र निर्माण के इसी लक्ष्य ने अटलजी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल होने के लिए प्रेरित किया और उन्होंने अपना जीवन संघ को समर्पित कर दिया। आने वाले वर्षों में उनका ये संकल्प और भी मजबूत होता चला गया। लेकिन जिस मार्ग पर वो चल रहे थे, उसकी अपनी चुनौतियां थीं। ये अटल जी का ही महान व्यक्तित्व था कि इतिहास के अलग-अलग पड़ाव पर देश का राजनीतिक वातावरण प्रतिकूल होते हुए भी वो अपने मार्ग से कभी विचलित नहीं हुए।
अपने सुदीर्घ राजनीतिक जीवन में, अटलजी ने ज्यादातर समय विपक्ष में ही बिताया। माहौल ऐसा था कि देश के राजनीतिक विमर्श में एक ही पार्टी और एक ही परिवार का दबदबा था। ऐसे में कई मौकों पर राष्ट्रीय महत्त्व के मुद्दे उठाने के लिए अटलजी के पास गिने-चुने सहयोगी ही होते थे। बावजूद इसके, अटलजी की आवाज सत्ता को नींद से जगाती रही, राष्ट्र निर्माण के पथ पर लौटाती रही।
महत्वपूर्ण ये नहीं था कि वो राजनीति के गलियारे में किस तरफ बैठे थे, बल्कि महत्त्व, भारत के पुनर्निर्माण में उनकी प्रतिबद्धता का था। यही वजह है कि अटल जी भारत के अब तक के सबसे उत्कृष्ट सांसदों में से एक गिने जाते हैं। वो ऐसे मुद्दे उठाते थे जो आम तौर पर उपेक्षित, लेकिन बहुत महत्वपूर्ण थे। अटलजी इन मुद्दों पर संवाद करने से कभी नहीं हिचकिचाए। संसद में वो बहुत मुखर आलोचक थे, लेकिन साथ ही बहुत अहम सहयोगी भी थे।
जब भी ऐसी परिस्थिति आई, जिसमें देश के व्यापक हित में कभी सरकार के साथ मिलकर काम करना पड़ा, तो अटल जी ने खुशी-खुशी इस काम को भी किया। इसलिए, जब 1993 में पाकिस्तान को कूटनीतिक जवाब देने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने अटल जी को चुना, तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। उन्हें तब संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के प्रतिनिधिमंडल की अगुआई करने के लिए चुना गया था। तब दुनिया भर में लोग ये जानकर हैरान रह गए थे कि इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर भारत में विपक्ष का सबसे बड़ा नेता, भारत के नागरिकों और सरकार की तरफ से बोल रहा है। उन्होंने जिनेवा में भारत की कई बड़ी कूटनीतिक विजयों में भी अपनी विशेष भूमिका निभाई।
अटलजी को एक बार नहीं, बल्कि कई बार राजनीतिक छुआछूत का दंश झेलना पड़ा। 1979 में जनता सरकार दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर अस्थिरता के भंवर में फंसी, लेकिन अटलजी कभी नहीं डिगे। इसके 17 साल बाद, 1996 में पूरे देश ने देखा कि किस तरह सभी पार्टियां अटल जी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिये एकजुट हो गईं, लेकिन 1998 में दोबारा अटलजी की वापसी हुई। 1999 में, भले ही अवसरवादी गठबंधन उनकी सरकार को हटाने में सफल हो गया, लेकिन लोगों ने एक बार फिर चुनाव में उनको आशीर्वाद दिया और वो प्रधानमंत्री बने।

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इस दौरान, क्षणिक लाभ के लिए, कई अवसरों पर विचारधारा से समझौता करने का भी दबाव पड़ा, लेकिन अटलजी तो अटलजी थे। वो अपनी आखिरी सांस तक उसी पथ पर चलते रहे, जिसका संकल्प उन्होंने दशकों पहले ले लिया था।
अटलजी का लोगों से जुड़ाव बहुत सहज था। 1977 से 1979 तक भारत के विदेश मंत्री रहते हुए, लीक पकड़कर चलने के बजाय, उन्होंने भारत की विदेश नीति में एक नया अध्याय लिखा। उन्होंने भारत के रणनीतिक लाभ को और बेहतर करने के लिए, कुछ देशों के बजाय संपूर्ण विश्व से तालमेल किया। इसी भावना के साथ वो फरवरी, 1999 में बस से लाहौर गए।
लोगों को जोड़ने की इसी विशेषता ने अटलजी को भारत में गठबंधन की सफल राजनीति का शिल्पकार बनाया। 1999 से पहले, भारत में गठबंधन की राजनीति या तो अल्पजीवी होती थी और अक्सर अपने विरोधाभासों से धराशायी हो जाती थी। लेकिन अटलजी ने दिखाया कि असंभव को भी संभव किया जा सकता है। उन्होंने सफलतापूर्वक भारत में पहली बार पूरे कार्यकाल तक गठबंधन सरकार चलाई।
अटल जी स्वभाव से बहुत विनम्र और सहृदय थे, लेकिन जब भारत को उकसाया गया तो अटलजी ने ये भी दिखा दिया कि वो चट्टान से भी दृढ़ हैं और ऐसी हरकतों को हल्के में नहीं लेते। हमारे पड़ोसी ने एक नहीं, दो बार अटलजी का यही दृढ़ रूप देखा। पहला 1999 में कारगिल युद्ध के समय और दूसरी बार 2001 में संसद पर आतंकवादी हमले के दौरान। दोनों अवसरों पर अटलजी ने ये साफ संदेश दिया कि शांति की भूमि भारत को अगर उकसाया गया तो मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।
ये अटलजी की प्रतिबद्धता थी कि 11 मई 1998 को भारत आधिकारिक रूप से न्यूक्लियर देश बन गया। अटलजी ने जैसे ही ये घोषणा की, वैसे ही भारत को कड़े आर्थिक प्रतिबंध और अंतरराष्ट्रीय दबाव झेलने पड़े। परंपरागत सोच इस दबाव के आगे घुटने टेक देती, लेकिन अटलजी ने दो दिन बाद ही, 13 मई को दूसरे दौर के परीक्षण का आदेश दे दिया।
ये दिखाता है कि जब राष्ट्र के राजनीतिक नेतृत्व का संकल्प अटल होता है, तो वो दुनिया के सामने न सिर्फ सिर उठाकर खड़ा रह सकता है बल्कि भारत की आवाज को दुनिया की प्रभावशाली आवाज भी बना देता है। उन्होंने ये भी सुनिश्चित किया कि इन प्रतिबंधों का असर गरीबों पर ना पड़े और भारत के आर्थिक विकास की रफ्तार जारी रहे।
प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी के कामकाज को देश में समाज के सभी वर्ग गर्व के साथ याद करते हैं। उनकी सरकार ने भारत के 21वीं सदी में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त किया। उनके कार्यकाल में भारत के आर्थिक विकास ने नई ऊंचाइयां छुईं। उन्होंने भारत को आधुनिकतम राजमार्ग, सशक्त टेलीकॉम सैक्टर, एविएशन और बंदरगाह समेत कई क्षेत्र में अगली पीढ़ी को बुनियादी ढांचे की सौगात दी। अटलजी गरीबों और वंचितों के सशक्तिकरण के अग्रदूत थे। अटलजी के कार्यकाल की ये भी विशेषता रही कि उस दौरान कुछ लोगों के बजाय, वृहत्तर समाज को समृद्धि में शामिल होने का मौका मिला। इसी सोच के साथ उन्होंने सामाजिक न्याय और अधिकारिता का एक अलग मंत्रालय भी बनाया। उनके कार्यकाल में भारत को तीन नए राज्य उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड मिले, ताकि आदिवासियों और पहाड़ों के निवासियों की आकांक्षाएं पूरी हो सके।
अटलजी के इन सभी कार्यों की प्रेरणा था-अंत्योदय का मंत्र। अंत्योदय मतलब कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति का कल्याण।
अब, हमारे सामने अटलजी के सपनों को सच करने की जिम्मेदारी है। उनका सर्वस्वीकार्य व्यक्तित्व, समावेशी सोच और सहज-सरल जीवन और हमें न्यू इंडिया बनाने के लिए दिन-रात कार्य करने की प्रेरणा देता है। भारत के लिए वैश्विक नेतृत्व और श्रेष्ठता की प्राप्ति का यही रास्ता है।
( प्रधानमंत्री ने यह लेख अटल जी पर निकाले गए पाञ्चजन्य के विशेषांक में लिखा है )