जो पिछले जुमे को हुआ वह इस बार न हो तो अच्छा ....
   दिनांक 26-दिसंबर-2019
पिछले जुमे के दिन हो हुआ वह इस जुमे को न हो इसलिए मज़हबी जमावड़े को उपद्रव में बदलने से रोकने की जिम्मेदारी जिम्मेदार लोगों को उठानी होगी. यदि इस जुमे को देश में आगजनी हुई तो यह साबित करेगा की यह विरोध नहीं संख्या के बल पर डराने की कोशिश है

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आज गुरुवार है. कल जुमे की नमाज़ है. पिछले जुमे को देश के अनेक शहरों में हिंसक प्रदर्शन हुए. आगज़नी हुईं. कई जानें गईं. पुलिस पर गोली चली. उत्पात को रोकने के लिए पुलिस ने भी सख्ती से कार्रवाई की. मामले दर्ज हुए. गिरफ्तारियां हो रही हैं. ये सारा तमाशा सिर्फ अफवाहों के दम पर हुआ. झूठ बोले गए. अनेक स्थानों पर नमाज के लिए इकट्ठा हुए मुसलमानों को भड़काया गया. उन्हें कहा गया कि ‘मुसलमानों की नागरिकता छीनी जा रही है. इसीलिए ये क़ानून लाया गया है. वोट देने का अधिकार वापस लिया जाने वाला है. सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं मिलेगा. सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं होगा..” ऐसे झूठ स्थानीय छुटभैयों ने फैलाए. इनमें नेताओं के पिट्ठू चंद मज़हबी लोग भी शामिल थे.
 
बड़े-बड़े नेता जो ज्यादा चालाक होते हैं, उन्होंने सार्वजनिक मंचों से, सीधे-सीधे न बोलकर इशारों में झूठ बोला कि “ लाखों लोगों को जेलों में ठूंसा जाने वाला है... भेदभाव हो रहा है.. हम किसी की नागरिकता नहीं छीनने देंगे.. अन्याय के खिलाफ लड़ो, नहीं तो कायर कहलाओगे... आर-पार की लड़ाई का वक्त आ गया है.. घरों से बाहर निकलो..आदि” परिणाम ये हुआ कि अनेक शहरों में कर्फ्यू लगाने की नौबत आ गई. शहर-शहर जो आगज़नी हुई उसमें छद्म सेकुलर नेता अपने हाथ सेकने की फिराक में हैं, लेकिन कीमत चुकाई उन लोगों ने जो इस उपद्रव की चपेट में आए.जिनकी दुकानें जलीं. जिनके वाहन फूंके गए. अब अराजक तत्वों की धरपकड़ हो रही है. अफवाहों का बाज़ार गर्म करने वालों, क़ानून हाथ में लेने वाले लोगों की शहर दर शहर पहचान हो रही है. इन लोगों को ध्यान रखना चाहिए कि मुकदमे और पुलिस कार्रवाई का सामना उन्हें करना है. बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमने वाले, लुटियन दिल्ली के भव्य सरकारी बंगलों को आबाद करने वाले उन नेताओं को नहीं, जिनके बहकावे में आकर उन्होंने अपने और दूसरों के लिए मुसीबत खड़ी की है.
 
देश और दुनिया में ‘इस्लामोफोबिया’ को लेकर भी एक बड़ी चर्चा कुछ सालों से छिड़ी है. इस शब्द का जन्म यूरोप में हुआ, जब यूरोप में मुस्लिम (अरब) देशों से गए प्रवासियों के एक वर्ग ने यूरोप की नागरिकता तो ग्रहण कर ली, लेकिन वहां की मुख्यधारा में ढलने से इनकार कर दिया. यूरोप के शहरों में शरिया क़ानून लागू करने को लेकर प्रदर्शन होने लगे. तब वहां के नागरिकों और विद्वानों ने इस कट्टरपंथी बयार पर चिंता जतानी शुरू की. कुछ लोगों ने उग्र प्रतिक्रिया भी दी. तब यूरोप के ही समाजवादी और वामपंथी तबके ने शरिया की मांग करने वाले कट्टरपंथी समूहों को समझाने और सही राह पर लाने के स्थान पर इनका विरोध कर रहे लोगों की ही आलोचना शुरू कर दी. उनकी जायज़ चिंताओं को दरकिनार कर दिया और कहने लगे कि ये लोग इस्लामोफोबिया (फोबिया याने डर) फैला रहे हैं.
 
फिर इसी शब्द को भारत के वामपंथी और वोटबैंक के सौदागरों ने पकड़ लिया. इन लोगों ने तीन तलाक़ और हलाला जैसी प्रथाओं का समर्थन किया. मुस्लिमों को आधुनिक शिक्षा और ज्ञान से वंचित रखने के प्रयास किए. स्थानीय स्तर पर भी ऐसे बहुतेरे लोग हैं, जिनकी दुकानदारी लोगों की नासमझी की दम पर चलती है. वो चाहते हैं कि लोग मज़हब के नाम पर आंख बंद करके उनके पीछे चलते रहें, और वो अपने पीछे खड़ी इस भीड़ के नाम पर सियासी और दूसरे फायदे उठाते रहें. फिर यही लोग नारे देने लगते हैं कि इस्लाम को बदनाम करने की साजिश की जा रही है.
 
यदि नमाज के लिए एकत्र हुए लोग या उन लोगों में से कुछ सौ लोग, नमाज के बाद हिंसक प्रदर्शन करने लगेंगे तो क्या उंगलियाँ नहीं उठेंगी? फिर तथाकथित ‘इस्लामोफोबिया’ तो फैलेगा ही. यदि क़ानून को लेकर विरोध है तो विरोध का तरीका भी कानूनी होना चाहिए. मज़हबी जमावड़े को उपद्रव में बदलने से रोकने की जिम्मेदारी किसकी है? और किसी भी बात के बारे में मन बनाने से पहले, उसके बारे में ठीक तरह से मालूमात करने की जिम्मेदारी भी तो सभी की बनती है. किसी ने कह दिया कि ‘कौआ कान ले गया तो कौए के पीछे भागने से पहले अपने कान को हाथ लगाकर देखना चाहिए. चाहे एनआरसी हो या नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019, दोनों में ही भारत के नागरिकों को परेशान होने की कोई बात नहीं है. एनआरसी विदेशियों की पहचान करने के लिए है, और नागरिकता संशोधन अधिनियम पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बंग्लादेश में मजहब के आधार पर सताए जा रहे अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए है. भारत के किसी भी नागरिक की नागरिकता या नागरिक अधिकारों को इससे कोई ख़तरा नहीं है. इसलिए बहकावे में न आना, और बहकाने वाले लोगों को बेनकाब करना, उन्हें दरकिनार करना मुस्लिम समुदाय के समझदार लोगों की जिम्मेदारी है. जब ये पंक्तियाँ लिखी जा रहीं हैं, गुरुवार आधा बीत चुका है. शुक्रवार आने को है. जुमा शांतिपूर्वक बीते इसकी चिंता उन्हें करनी होगी. बीते दिनों में अफवाहों की सनक पर सवार होकर अपने ही शहर को आतंकित करने जो नासमझ निकले थे, उन्हें समझा-बुझाकर सही राह पर लाने का दायित्व उन्हें निभाना होगा. लोकतंत्र में अधिकार के पहले जिम्मेदारियां आती हैं. जिम्मेदारियां निभाने से ही शांति और समृद्धि आती है.