- पक्षपात या देश से घात!
   दिनांक 30-दिसंबर-2019
स्वार्थ की पत्रकारिता हित करने से कहीं ज्यादा देश का अहित कर रही
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पहले नागरिकता कानून, एनआरसी और अब जनगणना और उससे जुड़ी नियमित प्रक्रियाओं को विवादित बनाने का सुनियोजित प्रयास देखा जा सकता है। तरीका वही पुराना है कि विपक्ष के किसी नेता का कोई तथ्यहीन बयान उठाओ और उसे तूल देकर एक तथाकथित राष्ट्रीय बहस में बदल दो। जनगणना और नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर यानी एनपीआर को लेकर जैसी टिप्पणियां अखबारों और चैनलों में देखने को मिलीं वे शक पैदा करती हैं कि बरसों से स्थापित कांग्रेसी माहौल कुछ छिपाना चाहता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि उसे जनगणना से ही कुछ समस्या है? कांग्रेस के लिए तो यह सब स्वाभाविक है। शंका तब गहराती है जब मीडिया का एक जाना-पहचाना वर्ग अफवाह फैलाता दिखाई देता है।
 
नागरिकता कानून को लेकर हिंसा थमने के बाद सेकुलर मीडिया के झूठ एक-एक करके उजागर हो रहे हैं। मीडिया के एक वर्ग ने न सिर्फ नागरिकता कानून को लेकर अफवाहें फैलाईं, बल्कि हिंसा करने वालों के बचाव में झूठ भी गढ़े। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया में हिंसा की जो सीसीटीवी तस्वीरें सामने आईं वे चैनलों और अखबारों के दावों से बिल्कुल अलग हैं। इन वीडियो से साबित हुआ कि हिंसा की शुरुआत प्रदर्शनकारियों ने की थी और पुलिस ने वही किया जिसकी उससे उम्मीद की जाती है। सचाई सामने लाने वाले इन वीडियो को ज्यादातर चैनलों ने नहीं दिखाया। यहां तक कि जिन दंगाइयों के हाथ बम या देसी कट्टा फटने से घायल हो गए थे, उनके लिए भी इंडिया टुडे, एनडीटीवी, इंडियन एक्सप्रेस समेत कई मीडिया संस्थानों ने 'छात्र' और 'सिविल सेवा की तैयारी करने वाले' जैसे सम्मानित विशेषण प्रयोग किए।
 
दिल्ली, लखनऊ, पटना, अमदाबाद में पत्रकारों पर हमले की कई घटनाएं हुईं। इनमें अधिकतर कैमरों में कैद हुईं। लगभग सभी में प्रदर्शनकारियों ने ही हमला किया था। लेकिन घटना की निंदा करने के लिए 'एडिटर्स गिल्ड' ने जो बयान जारी किया, उसमें पुलिस को दोषी ठहराया गया। प्रश्न उठता है कि संपादकों की यह संस्था क्या वास्तव में निष्पक्ष है या वह किसी राजनीतिक दल की तरह झूठी बयानबाजी कर रही है? इसी तरह सभी बड़े समाचार समूहों ने दिल्ली के कनॉट प्लेस में नागरिकता कानून समर्थक प्रदर्शन को नहीं दिखाया। क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं है कि मीडिया किसी मुद्दे पर दूसरे पक्ष की आवाज को मंच ही न दे। इंडिया टुडे की वेबसाइट पर यहां तक अफवाह उड़ाई गई कि कर्नाटक की भाजपा सरकार ने एनआरसी लागू करने से मना कर दिया है।
 
ऐसा लगता है कि मीडिया का यह वर्ग हर सामान्य सरकारी कामकाज को संदेह के दायरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। उदाहरण के लिए टाइम्स ऑफ इंडिया ने खबर छापी कि बैंक ग्राहकों को अब से केवाईसी में पंथ भी बताना होगा। यह झूठ छापने के पीछे अखबार का उद्देश्य क्या रहा होगा समझना कठिन नहीं। हालांकि रिपब्लिक टीवी ने फर्जी खबरों के इस सुनियोजित कारोबार के खिलाफ बहस आयोजित करके साहस दिखाया। इस कार्यक्रम में राजनीतिक दलों और मीडिया के इसी 'गठबंधन' को काफी हद तक उजागर किया गया।
 
झारखंड चुनाव के नतीजों में भी पक्षपात का यह खेल खुलकर खेला गया। कुछ जाने-पहचाने पत्रकारों की खुशी तो देखते ही बनती थी। इसी वर्ग ने बड़ी सफाई के साथ इसे 'कांग्रेस की जीत' घोषित कर दिया, जबकि वह तीसरे नंबर पर रही। इतना ही नहीं, मात्र एक सीट पाने वाले राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू यादव का महिमामंडन तो देखते ही बनता था। कई समाचार संस्थानों ने इस तरह की बातें छापीं,'लालू यादव ने जेल में बैठे-बैठे झारखंड में भाजपा को हरा दिया।' जो मीडिया दो दर्जन से ज्यादा बड़ी हार के बाद भी राहुल गांधी और सोनिया गांधी को कुछ नहीं कह पाता, उसने कुछ राज्यों में भाजपा की सरकार न बन पाने को केंद्र सरकार के तमाम फैसलों पर जनमत सर्वेक्षण बता डाला।
 
मुंबई में एक उत्तर भारतीय युवक पर हमले की खबर आई। आमतौर पर चैनल ऐसे समाचारों को बहुत तूल देते रहे हैं, लेकिन इस बार इस घटना को दबा दिया गया, क्योंकि महाराष्ट्र सरकार में कांग्रेस भी शामिल है। इसी तरह मध्य प्रदेश के जबलपुर में एक नाबालिग लड़की को जि़ंदा जलाने की खबर भी दब गई। अगर मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार होती तो यही घटना ज्यादा महत्व पाता। सेकुलर मीडिया की यह आदत पुरानी है।