एक राज्यपाल पर हमला, यही कम्युनिस्टों का चरित्र है
   दिनांक 30-दिसंबर-2019
क्या कम्युनिस्टों की मर्जी के बिना इस देश में कोई कुछ बोल नहीं सकता? क्या एक राज्य के राज्यपाल को बोलने का अधिकार नहीं है? वामपंथी जितना मर्जी चाहें झूठ बोल सकते हैं लेकिन कोई उनके सामने सच नहीं बोल सकता”?

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मंच पर चढ़कर बदतमीजी करते वामपंथी इतिहासकार हरफान हबीब
केरल के कन्नूर के विश्वविद्यालय के एक उद्घाटन कार्यक्रम में मंच पर मौजूद कम्युनिस्ट इतिहासकार इरफ़ान हबीब ने राज्य के राज्यपाल के साथ मंच पर बदतमीजी की. कारण, वो नागरिकता संशोधन क़ानून पर इरफ़ान हबीब और उनके कम्युनिस्ट साथियों द्वारा फैलाए जा रहे झूठ की पोल खोलने जा रहे थे. इन लोगों ने राज्य के राज्यपाल तक को बोलने नहीं दिया. ये वही लोग हैं जो, जबसे मोदी सरकार बनी है, तबसे “बोलने की आज़ादी” और “असहिष्णुता” पर भारत को सारी दुनिया में बदनाम कर रहे हैं. जबकि वास्तविकता ये है कि कम्युनिस्टों से ज्यादा असहिष्णु सारी दुनिया में और कोई नहीं है. ये हर उस आवाज़ का गला घोंटने की कोशिश करते हैं, जो इनके प्रोपेगंडा के खिलाफ जाए. ये दुनिया को अजीबो-गरीब नियम क़ानून बताते हैं, लेकिन खुद किसी नियम को नहीं मानते.
ऐसा ही उस दिन कन्नूर में राज्यपाल के साथ किया गया. नियम है कि राज्यपाल का कार्यक्रम एक घंटे से ज्यादा का नहीं होता है, लेकिन कम्युनिस्ट डेढ़ घंटे तक बोलते रहे. जिसमें वो इलज़ाम लगा रहे थे कि केंद्र सरकार द्वारा संविधान को तोड़ा जा रहा है. नागरिकता क़ानून संविधान के लिए ख़तरा है. अंत में राज्यपाल आरिफ मुहम्मद खान उठे. उन्होंने बोलना शुरू किया और जो झूठे आरोप इरफ़ान खान और उनके साथियों ने उछाले थे उनके उत्तर देना शुरू किया तो इरफ़ान हबीब खड़े हुए, राज्यपाल के एडीसी (सहायक सुरक्षा अधिकारी) का बैच नोच लिया. और आक्रामकता के साथ राज्यपाल की ओर बढ़े. जब राज्यपाल के सुरक्षा अधिकारियों और वाइसचांसलर ने उन्हें रोका तो उनके साथ धक्कामुक्की की.
यही वामपंथियों की असलियत है. कम्युनिस्ट चाहते हैं कि वो राज्यपाल के सामने संसद के बनाए हुए क़ानून के बारे में मंच से झूठ बोलें और राज्यपाल खामोशी से सुनते रहें. और यदि राज्यपाल ने इस क़ानून के तथ्यों को लोगों के सामने रखने का प्रयास किया तो वो उन्हें बोलने नहीं देंगे. जब आरिफ मुहम्मद खान ने नागरिकता क़ानून के तथ्यों के बारे में बतलाने का प्रयास किया तो कार्यक्रम में मौजूद कम्युनिस्ट चिल्लाने लगे कि राज्यपाल “पार्टी लाइन” पर बोल रहे हैं. क्या संविधान में लिखी गई धाराएँ किसी पार्टी की “लाइन“ है ? क्या बोलने का अधिकार, स्वतंत्रता से जीने का अधिकार “पार्टी लाइन” है? क्या कम्युनिस्टों की मर्जी के बिना इस देश में कोई कुछ बोल नहीं सकता? क्या एक राज्य के राज्यपाल को बोलने का अधिकार नहीं है? वामपंथी जितना मर्जी चाहें झूठ बोल सकते हैं लेकिन कोई उनके सामने सच नहीं बोल सकता”? और यदि कोई बोलेगा तो वो गुंडागर्दी पर उतर आएंगे?
सारी दुनिया में राजनैतिक दल चुनाव में क़ानून बनाने का वादा करते हैं, और सत्ता में आने पर वो क़ानून बनाते हैं. एक बार क़ानून बन जाने के बाद वो देश के क़ानून का हिस्सा हो जाता है. किसी पार्टी की “पार्टी लाइन” नहीं होता.
केरल में नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलाफ मुस्लिम संगठन, वामपंथी और कांग्रेस लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं. राज्यपाल होने के नाते आरिफ मुहम्मद खान ने उन सबको बार – बार आमंत्रित किया कि वो आकर बात करें, इस क़ानून पर चर्चा करें. लेकिन ये लोग नहीं आए क्योंकि उन्हें तो तमाशे का बाज़ार सजाना है. वो राज्यपाल से आकर बात भी क्या करें क्योंकि वो खुद ही जानते हैं कि नागरिकता संशोधन क़ानून में कोई भी आपत्तिजनक बात नहीं है और न ही ये संविधान के खिलाफ है. सचाई ये भी है कि वो आरिफ मुहम्मद खान से चिढ़ते हैं, क्योंकि आरिफ साहब का वजूद ही उनके दुष्प्रचार के खिलाफ पड़ता है.
भारत के छद्म सेकुलरों और कम्युनिस्टों को आरिफ मुहम्मद खान नहीं भाते जिन्होंने शाहबानो के साथ अन्याय होने पर केन्द्रीय मंत्री की कुर्सी को ठोकर मार दी थी. आरिफ मुहम्मद खान तब युवा थे. राजीव गांधी सरकार के सबसे युवा चेहरे थे. लंबा राजनैतिक भविष्य उनके सामने था, लेकिन वो न्याय के साथ खड़े हुए. ऐसे लोग कम्युनिस्टों को नहीं भाते. उन्हें “15 मिनिट में हिंदुओं को देख लेने” की धमकी देने वाले ओवैसी से कोई तकलीफ नहीं होती.
उन्हें तसलीमा नसरीन नहीं भातीं जो बांग्लादेश के मुस्लिम कट्टरपंथियों के खिलाफ आवाज़ उठाती हैं. उनके द्वारा बंगलादेशी हिंदुओं पर किए जा रहे अत्याचारों को दुनिया के सामने उघाड़कर रख देती हैं. उन्हें तारेक फतह से नफरत है क्योंकि वो पाकिस्तान के अंदर की सड़ांध, वहां उबल रहे इस्लामी कट्टरता के उन्माद का सारी दुनिया के सामने पर्दाफ़ाश करते हैं. जो पाकिस्तानी मूल के होते हुए भी पाकिस्तान पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक का समर्थन करते हैं, और निर्भय होकर सच बोलते हैं.जो भारत के मुसलमानों से कहते हैं कि “आप अपने आप को हिन्दुस्तानी कैसे कह सकते हैं यदि आप हिंदुस्तान को लूटने वालों के नाम पर अपने बच्चों का नाम रखते हैं....”
हाल ही में तारेक फतह ने नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) पर दो टूक बात की. वो बोले “जिन लोगों को सीएए से तकलीफ हो रही है, उनके मसले कुछ और है. किसी को राम मंदिर के फैसले (अदालत के फैसले) से तकलीफ है, किसी को धारा 370 से तकलीफ है. वो अपनी खीझ सीएए पर निकाल रहे हैं. कुछ पाकिस्तान की आईएसआई काम कर रही है. कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी हैं जो जामिया मिलिया या अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अंदर बैठे हैं. ये लोग वास्तविकता को मानना नहीं चाहते. उनके एम्बलेम पर ‘अल्ला हो अकबर’ लिखा हुआ है, और वो हमें भाषण दे रहे हैं सेकुलरिज्म पर. हर देश के ऐसे क़ानून होते हैं. मैं कनाडा में रहता हूँ, वहाँ का शरणार्थी क़ानून आए दिन बदलता रहता है, कोई ऊधम नहीं मचता...”
सीएए के खिलाफ कांग्रेस और अन्य “सेकुलर” दलों के साथ मिलकर षडयंत्र कर रहे कम्युनिस्टों की पोल खोलते हुए फतह बोले “ जिन्हें विरोध करने वाला सामान्य आदमी कहा जा रहा है उन्हें सीएए की ए बी सी भी नहीं पता. ये केवल शहरी नक्सलियों, पैसे वाले कम्युनिस्टों द्वारा किया जा रहा है. जिनका सारा अभियान जिहादी इस्लाम की सेवा में समर्पित है. जिन्हें मैं शरिया बोल्शेविक्स (कम्युनिस्ट) कहता हूं. न उन्होंने किताब पढी है, न क़ानून. ये वो लोग हैं जिन्हें लगता है कि भारत के समाज के ऊपर उनका जो वीटो (विशेषाधिकार, विशिष्ट मत) चला आ रहा था, वो अचानक ख़त्म हो गया है.... पहली बार आपके पास एक सरकार (मोदी सरकार) है जिसकी रीढ़ इस्पात की बनी है. ये बहुत बुरा लग रहा है इन लोगों को... ये शायरी नहीं करते.. इन्होने सबको चाय पिला दी.. अब बर्दाश्त नहीं हो पा रहा है इन लोगों से कि न स्टीफन कॉलेज में गए, न ये ऑक्सफ़ोर्ड में पढ़े,..पता नहीं कहां से आ गए..”
फतह कहते हैं कि अब कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया नहीं बताएगी कि देश के साथ क्या करना है.. ये धनाड्य मार्क्सवादी, बड़ी बिंदी वाले नहीं बताएंगे कि देश की दिशा क्या होगी.. वो समय जा चुका है... अब देश का सामान्य नागरिक बताएगा कि देश के लिए क्या होना चाहिए..”
वास्तव में यही इरफ़ान हबीब जैसों की समस्या है. इसी खीझ में वो राज्यपाल पर झपट पड़े. उनके सुरक्षा अधिकारी का बिल्ला नोच लिया और कुलपति से उलझने को तैयार हो गए. ये लोग तिलमिला रहे हैं कि इनको आस्तीन में पालने वाला कांग्रेस का निजाम जा चुका है, और इनकी अफसरी के दिन लद चुके हैं. समय आ गया है कि इन लोगों की “सहिष्णुता” और “उदारता” का दुनिया के सामने पर्दाफ़ाश किया जाए.