सोशल मीडिया - क्या ये युवाओं के आदर्श हो सकते हैं?
   दिनांक 30-दिसंबर-2019
राजन द्विवेदी
 
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बॉलीवुड अभिनेता फरहान अख्तर लिखता है- ''मिलते हैं 19 तारीख को मुम्बई के क्रांति मैदान में!'' दीया मिर्जा लिखती है- ''मेरी मां हिन्दू और पिता मुसलमान हैं, मैं धर्म को नहीं मानती। क्या मुझे अब साबित करना पड़ेगा कि मैं भारतीय हूं?''
 
वहीं, सोनम कपूर ने नागरिक (संशोधन) अधिनियम की तुलना हिटलर की तानाशाही से कर डाली। आलिया भट्ट कह रही है ''स्टूडेंट्स से सीखिए!''
 
सोनाक्षी सिन्हा सोशल मीडिया पर संविधान की प्रस्तावना साझा करते हुए लिख रही है- ''हम क्या थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी?''
 
परिणीति चोपड़ा लिखती है- ''उअइ को भूल जाइए। हमें एक बिल पास करना चाहिए और अपने देश को लोकतांत्रिक कहना बंद कर देना चाहिए। अपनी बात रखने के लिए निर्दोषों की पिटाई बर्बर है।''
 
जीशान अयूब द्वारा इसे 'विवादित कानून' बताना और शबाना आजमी की ओर से 'आई एम अगेंस्ट उअइ' हैशटैग से सोशल मीडिया पर वीडियो साझा करना और ऋचा चड्ढा का लिखना कि- ''मैं छात्रों के साथ हूं।''
 
हुमा कुरैशी को दिल्ली पुलिस की कार्रवाई 'बर्बर' दिखती है। सुशांत सिंह उअइ के विरोध में 'सावधान इंडिया' धारावाहिक छोड़ने की धमकी देता है। 
 
मित्रो! विरोध प्रदर्शन हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। अगर कुछ गलत हो रहा है तो उसे रोकने के लिए विरोध प्रदर्शन होने ही चाहिए, लेकिन बसों को जलाकर? शासकीय भवनों में तोड़फोड़ करके? स्कूली बसों पर पथराव करके? मीलों लंबा जाम लगा हजारों लोगों को बंधक बनाकर? क्या यही विरोध की परिभाषा है?
 
यदि हां, तो कुचल देना चाहिए हर उस आवाज को जो उअइ के विरोध में उठती है। जूते तले रौंद देना चाहिए हर उस हाथ को जो विरोध स्वरूप उठाया जाता है। ये जो तथाकथित बॉलीवुड वाले उअइ के विरोध में उठ खड़े हुए हैं, जरा इनके बौद्धिक स्तर पर नजर डालिए।
 
सोनाक्षी से केबीसी की एक कड़ी में सवाल पूछा गया, हनुमान जी संजीवनी बूटी किसके लिए लाने गए थे? सोनाक्षी इसका जवाब न दे पाई! सोनम के राष्ट्रगान की एक पंक्ति में 'हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई' आता है। यह वही आलिया भट्ट है, जिससे एक कार्यक्रम में भारत के राष्ट्रपति का नाम पूछा गया तो मोहतरमा का उत्तर था 'पृथ्वीराज चौहान'। यह है इनका सामान्य ज्ञान! आपसे पूछता हूं कि जिन्हें बेहद सामान्य-सी बातों का भी ज्ञान नहीं, उन्हें उअइ भी ओला या उबर की कैब सेवा ही नजर आएगा। 
चलिए मान लेते हैं कि समय के साथ इन्होंने अपने बौद्धिक स्तर में जबरदस्त सुधार कर भी लिया, फिर भी इनका एक पक्षीय नरेटिव, इन्हें संदेह के घेरे में खड़ा करता है। इन सितारों में से किसी ने भी उस हिंसा पर एक शब्द नहीं कहा, जिसमें लगभग दो दर्जन पुलिसकर्मी घायल हो गए। करोड़ों की संपत्ति को जला दिया गया। बसों के शीशे तोड़ दिए गए।
 
एक धारणा है कि इन सितारों के लिए पैसा सर्वोपरि है। उसके लिए ये कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि यह विरोध भी प्रायोजित हो। दूसरी बात, इनमें से ज्यादातर चुके हुए अभिनेता हैं जो जनमानस की स्मृति से लुप्त हो चुके हैं और विरोध के बहाने थोड़ी बहुत फुटेज तो हासिल कर ही लेते हैं। बकौल कंगना रनौत, ''वे हर चीज से डरते हैं। मेरी नजर में सबसे डरे हुए इनसान हैं। वे डरपोक हैं, कायर हैं। बिना रीढ़ के लोग हैं। मुझे लगता है कि आमजन को उनसे कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए।''
 
जरूरत है कि हम उन्हें आइकॉन के तौर पर पेश करना बंद कर दें। हमें उन्हें उसी रूप में देखने की जरूरत है, जैसे वे हैं। वे दिनभर कैमरों की चकाचौंध में रहते हैं। खाली वक्त में वे इंस्टाग्राम और ट्विटर पर अपने कपड़ों, आभूषण की फोटो साझा करते रहते हैं। 
 
हंगामा करने वाले छात्रों का समर्थन करना इनकी मजबूरी है, क्योंकि यह युवा वर्ग ही है जो इनकी फिल्मों को अपने दम पर हिट या सुपरहिट कराता है। वे इस वर्ग की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहते। अब आपको ही यह तय करना है कि क्या इस स्थिति में भी ये आपके रोल मॉडल हो सकते हैं? या ये महज उत्पाद हैं, जिनका उपयोग कीजिए और इसके बाद इन्हें फ्लश कीजिए। 
—फेसबुक वॉल से