'दंगाइयों के साथ योगी सरकार ने जो किया सही किया'
   दिनांक 31-दिसंबर-2019
डॉ. सैयद रिजवान अहमद
लखनऊ सहित देश भर में नागरिकता संशोधन कानून की आड़ में दंगाइयों ने पुराने मसलों पर अपनी भड़ास निकालकर देश को आग में झोंकने का काम किया। मुसलमानों के लिए यह ऐसा मौका था जब वे पड़ोसी देशों से आए हिन्दुओं का अभिनंदन करके इस्लामिक राष्ट्रों को आईना दिखा सकते थे, पर उन्होंने मौका गंवा दिया

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 सीएए के विरोध में प्रदर्शन के दौरान लखनऊ में दंगाइयों द्वारा पुलिस चौकी और बाहर खड़े वाहन जला दिए गए. 
 
लखनऊ को तहजीब की नगरी कहा जाता है, इसे शांति और सद्भाव के लिए जाना जाता है। लेकिन पिछले दिनों कुछ अराजक तत्वों एवं दंगाइयों ने इस शांति और सद्भाव को पलीता लगाने का काम किया। बिना कुछ जाने-समझे 'नागरिकता संशोधन कानून' (सीएए) पर सियासतदानों की बंदूक का मसाला बनकर उन्होंने लखनऊ समेत पूरे राज्य को लहूलुहान किया और आग लगाई। जिन उन्मादियों ने लखनऊ समेत पूरे राज्य को आग में झोंका, उनमें से एक बड़े समुदाय को सीएए के बारे में कुछ भी नहीं पता था। वह राजनीतिक दलों और कठमुल्लों के इशारों पर भीड़ का हिस्सा बना। आज जब इसी वर्ग के लोगों को चीजें स्पष्ट हो रही हैं तो सीएए उनकी समझ में आ रहा है और वे हिंसा का रास्ता छोड़कर अहिंसा का रास्ता अपना रहे हैं। सीएए के विरोध में देश में हुआ उत्पात चाहे वह दिल्ली हो, लखनऊ, काशी या गुजरात— इन सभी जगहों पर एकत्र हुई अराजक भीड़ अपनी उपस्थित दर्ज कराने की फिराक में देखी गई। इस दौरान सबसे प्रमुख बात जो स्पष्ट हुई, वह यह कि जो भीड़ सीएए के विरोध में प्रदर्शन कर रही थी उसे इसके बारे में कुछ नहीं पता था। लोग बेतुके मुद्दों पर सरकार को घेरने के प्रयास में लगे हुए थे। दूसरी बात, इस भीड़ के अंदर का उबाल सीएए को लेकर बिल्कुल नहीं था। दरअसल वह तीन तलाक, अनुच्छेद-370 और राम मंदिर के निर्णय पर 'कुछ न कर पाने' का मलाल था। और इस सबसे बढ़कर मलाल था मोदी-शाह की फिर से सत्ता में वापसी।
पुराना वायदा निभाया भारत ने मुसलमानों को समझना चाहिए कि केंद्र सरकार ने सीएए के माध्यम से महात्मा गांधी की इच्छा को पूरा करने का काम किया है। आखिर यह समुदाय पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ हुए समझौते को क्यों नहीं देखता? क्या पाकिस्तान और बांग्लादेश में आज अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं? अगर ऐसे लोगों को भारत नागरिकता दे रहा है तो उन्हें क्यों परेशानी होनी चाहिए? पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ अल्पसंख्यकों की रक्षा-सुरक्षा को लेकर जो समझौता हुआ क्या इन दोनों देशों ने उसे पूरा किया? आज तथाकथित बौद्धिक जमात जो सीएए के नाम पर देश को उकसा रही है, एक वर्ग को उद्वेलित कर रही है, वह सत्य बताने की हिम्मत क्यों नहीं कर रही! क्योंकि उन्हें पता है कि लोगों को जैसे ही सच का पता चलेगा, वे इसे समझेंगे और इस अराजकता से दूरी बनाएंगे।
 
मुसलमानों ने गंवाया मौका
जिस समय सीएए कानून बनकर देश के सामने आया उस समय देश के मुसलमानों को आगे आकर इसका स्वागत करना चाहिए था और पड़ोसी मुस्लिम देशों को दुत्कारना चाहिए था कि इन देशों ने भारत के अल्पसंख्यकों को सुरक्षित रखने का जो वायदा किया था उसे उन्होंने नहीं निभाया। लेकिन मुसलमानों ने स्वागत करने के बजाय देश को ही आग में झोंक दिया जो बड़ी शर्म की बात है।
 
यह ऐसा मौका था जब भारत के मुसलमान पाकिस्तान और बांग्लादेश से यह अपील करते कि आने वाले समय में उनके द्वारा अल्पसंख्यकों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाए क्योंकि अगर इन देशों में अल्पसंख्यकों के साथ खराब व्यवहार होगा तो भारत में रहने वाले अल्पसंख्यकों पर भी इसका असर पड़ सकता है। लेकिन भारत के मुसलमानों ने ऐसा कुछ नहीं किया। पड़ोसी देशों के पीडि़त हिन्दुओं के साथ खड़े होने की बजाय जब उन्हें कुछ सुख-सुविधा मिलने की आस जगी तो वे इसमें अड़ंगा लगाने पर उतर आए। कट्टरपंथी तत्वों ने अपनी इस हरकत से यही दर्शाता है कि जब-जब देशहित की बात होगी, हिन्दुओं की होगी, तो वे देशहित को किनारे रखकर मजहब को ही सर्वोपरि रखेंगे।
 
एनआरसी के नाम बरगलाया जा रहा
दरअसल देश के मुसलमानों को एनआरसी के नाम पर बरगलाया जा रहा है, भड़काया जा रहा है। जबकि भारत की मिट्टी में जन्मीं मुसलमानों को इससे बिल्कुल डरने की जरूरत नहीं है। केंद्र सरकार ने सदैव यही बात कही है कि जो इस देश के रहने वाले मुसलमान हैं उन्हें किसी से भी डरने की जरूरत नहीं है। लेकिन बावजूद इसके कुछ दलों और कट्टरपंथियों द्वारा उन्हें यह कहकर डराया, धमकाया जा रहा है कि यह सरकार तुम्हें देश से निकाल देगी, भगा देगी, जेल में बंद कर देगी आदि आदि। दूसरी बात असम में एनआरसी विशेष परिस्थितियों में हुई। सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में हुई। सरकार की उसमें कोई भूमिका नहीं थी। यह सभी को पता है कि असम की सीमा बांग्लादेश से लगती है जिसके कारण बांग्लादेशी घुसपैठियों की राज्य में भरमार है। वे अनेक जगहों पर बस गए हैं। राजनीतिक दलों ने उन्हें वोट में बदल लिया है। ऐसे में राजनीतिक दलों को डर है कि अगर ये बाहर होते हैं तो उनका वोट धराशायी हो जाएगा। दूसरी बात जो एनआरसी का विरोध कर रहे हैं उन्हें यह पता होना चाहिए कि यह एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसे रोका नहीं जा सकता। तीसरी बात, कन्नड़, मलयालम, तेलुगू, गुजराती या अन्य राज्यों के मुसलमानों को लगता है कि उन्हें दस्तावेज न होने के कारण बांग्लादेश भेज दिया जाएगा, तो इससे बड़ी अज्ञानता नहीं हो सकती। मैं समझता हूं कि देश के मुसलमानों को सेकुलर दलों की चाल को समझना चाहिए और जो कार्य देशहित में हो, उसमें सहयोग करना चाहिए। इससे देश के लोगों का विश्वास बढ़ेगा और सामाजिक सौहर्द की मिसाल स्थापित होगी।
 
पाला बदलते दिखे कट्टरपंथी
लखनऊ सहित देश के विभिन्न हिस्सों में हुए हिंसक प्रदर्शनों के दौरान जब सीएए की जानकारी के मामले में प्रदर्शनकारियों की पोल खुलनी शुरू हो गई और पर्याप्त राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति नहीं मिली तो कठमुल्लों ने फौरन अपना पाला बदल दिया। वह सीएए से एनआरसी पर आ गए और 48 घंटे के अंदर लड़ाई को एनआरसी में तब्दील करके मुसलमानों को भड़काने लगे कि तुम्हें भारत से बाहर निकाल दिया जाएगा। लेकिन सुयोग से काफी हद तक प्रदर्शनकारियों और अराजक तत्वों की पोल खुली और उनके मंसूबे ध्वस्त हो गए।
 
योगी सरकार ने की सही कार्रवाई
उत्तर प्रदेश सरकार जिस प्रकार अराजक तत्वों पर नकेल कसकर और दंगाइयों पर कड़ी कार्रवाई कर रही है, वह सराहनीय है। अगर आज राज्य में योगी सरकार न होती तो पूरा प्रदेश दंगों की भेंट चढ़ गया होता, हिन्दू-मुसलमान आपस में लड़ रहे होते। और पता नहीं कितने मौत के घाट उतर गए होते। लेकिन राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन ने बड़े ही अच्छे तरीके से स्थिति को नियंत्रित किया और राज्य को एक बड़ी आपदा से बचा लिया। इस सबके वाबजूद कुछ लोग उपद्रवियों का साथ दे रहे हैं। यकीनन उनके मंसूबे ठीक नहीं है। कुछ तथाकथित बौद्धिक, कट्टर मजहबी और सेकुलर नेताओं ने इसी तरह से 70 साल से मुसलमानों के कंधों का इस्तेमाल किया है। देश के आजाद होने के बाद और अब तक वह मदारी बनकर मुसलमानों को नचा रहे हैं और मुसलमान उनके इशारों पर नाचता है। लेकिन अब समय है जब मुसलमानों को यह सोचना होगा कि वे कब तक मजहबी उन्मादियों और सेकुलर दलों के हाथों नाचते रहेंगे? उन्हें समझना होगा कि उनकी तरक्की देश की तरक्की से ही संभव है और भविष्य में उन्हें इसी दिशा में लगना होगा। (लेखक मुस्लिम मामलों के गहन जानकार हैं)