1984 का पाप : खानदान के दाग को राव पर चिपकाने चले मनमोहन
   दिनांक 07-दिसंबर-2019
जितने सीधे ढंग से मनमोहन सिंह ने 1984 के सिख नरसंहार का ठीकरा नरसिम्हाराव के सर फोड़ने का प्रयास किया है, उतनी सीधी यह बात है नहीं. असली दोषी राजीव गांधी और उनके करीबी कांग्रेस नेता हैं

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1984 के दंगों का दाग कांग्रेस पार्टी और उसके राज परिवार को लगातार कटघरे में खडा करता आ रहा है. हाल ही में यूपीए के प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह ने ये कहकर 1984 की अमानवीयता का ठीकरा पी. वी. नरसिम्हाराव के सर फोड़ने की कोशिश की है कि यदि वो सेना बुला लेते तो सिख नरसंहार को रोका जा सकता था. मनमोहन सिंह ने कहा है कि पूर्व प्रधानमंत्री गुजराल ने राव से ऐसा करने को कहा था.
नवंबर 1984 में, जब दिल्ली कांग्रेस द्वारा प्रायोजित सिख विरोधी दंगों में झुलस रही थी, तब नरसिम्हाराव गृहमंत्री थे. गृहमंत्री होने के नाते क़ानून-व्यवस्था बनाए रखना उनकी ज़िम्मेदारी थी, लेकिन जिस प्रधानमंत्री के नीचे राव काम कर रहे थे क्या उसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी? और जब ऊपर से नीचे तक पूरी कांग्रेस पार्टी बदले के जूनून में अंधी हो रही थी, तब क्या नरसिंहराव कुछ करने की स्थिति में रह गए थे?
यदि गृहमंत्री कुछ नहीं कर रहे थे, तो उनके ‘बॉस’ प्रधानमंत्री राजीव गांधी क्या कर रहे थे? वो क्या कर रहे थे जब दंगे भड़काने के लिए अफवाहों का बाजार गर्म किया गया. उनकी पार्टी द्वारा अफवाहें फैलाई जा रही थीं कि “सिखों ने दिल्ली के पीने के पानी में ज़हर मिला दिया है” या “पंजाब से आने वाली ट्रेनों में गैर सिखों की लाशें भरी हुई हैं” आदि. दिल्ली के अनेक तत्कालीन कांग्रेस सांसद भीड़ को मारकाट के लिए उकसा रहे थे, साधन मुहैया करवा रहे थे. मनमोहन सिंह के बयान से चर्चाओं का बाज़ार तो सरगर्म हो गया लेकिन तथ्यों को इतनी आसानी से नहीं झुठलाया नहीं जा सकता.
राजीव की वो आपराधिक चुप्पी
31 अक्टूबर 1984 की सुबह इंदिरा गांधी के सिख अंगरक्षकों ने उन पर गोली चलाई. गोलियों के घाव घातक साबित हुए. राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह उस समय यमन में थे. वो अपनी विदेश यात्रा को स्थगित करके वापस लौटे. राजीव गांधी कोलकाता में थे. राजीव शाम को दिल्ली पहुंचे और उन्हें सीधे राष्ट्रपति भवन ले जाया गया, जहां उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. शपथ लेने के बाद राजीव ने राष्ट्र के नाम संबोधन दिया, जिसका दूरदर्शन पर सीधा प्रसारण किया गया. भाषण में राजीव ने कहा कि ‘देश ने एक महान नेता खो दिया है’ और ‘इंदिरा केवल उनकी मां नहीं थीं बल्कि सारे देश की मां थी.’ फिर राजीव ने रुककर कैमरे की ओर देखा. कैमरा कांग्रेस नेता (बाद में 84 के दंगों के आरोपी) एच के एल भगत को दिखाने लगा जो छाती पीट-पीटकर अपने समर्थकों के साथ चिल्ला रहे थे कि “खून का बदला खून से लेंगे.” भगत गांधी परिवार के करीबी थे, और 84 दंगों के मुख्य अभियुक्तों में शामिल थे. जब भगत सारे देश के सामने (दूरदर्शन पर) खून और बदले की बातें चीख-चीखकर कह रहे थे तब राजीव ने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की.
राजीव की ये चुप्पी अपराधिक थी. जिसने अभी-अभी बिना भेदभाव के देश के सभी नागरिकों के लिए काम करने की शपथ ली थी, वो खूनखराबे के इस उकसावे को शांत भाव से देख रहा था. बाद में दंगों की तरफ इशारा करते हुए राजीव ने कहा था कि “जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती हिलती है.” ये बेहद उत्तेजक बात थी. राजीव के हाथों में उस समय इतनी ताकत थी, जितनी देश के किसी भी व्यक्ति के पास नहीं थी. राजीव का ये बयान आग में घी डालने जैसा था. इस पर आपत्ति जताकर पलटवार करते हुए अटलबिहारी बाजपेयी ने कहा था कि राजीव नहीं जानते कि जब धरती हिलती है, तब बड़े-बड़े पेड़ गिर जाते हैं.
दंगों के सभी प्रमुख आरोपी गांधी परिवार के करीबी
यह एक राजनैतिक दंगा था. सब कुछ पूर्व नियोजित था. पुलिस को तमाशबीन बना दिया गया था. शराब, पैसा और केरोसिन बांटा गया. प्रत्यक्षदर्शियों ने कांग्रेस के अनेक बड़े नेताओं, सांसदों को दंगाइयों को निर्देश देते, रुपयों के बंडल बांटते और यहां तक कि हिंसक भीड़ का नेतृत्व करते देखा था. दंगों के सभी प्रमुख आरोपी गांधी परिवार के करीबी नेता थे. एचकेएल भगत इंदिरा गांधी के करीबी और सरकार सूचना प्रसारण मंत्री थे. कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार संजय गाँधी के करीबी, संजय गांधी द्वारा चुने गए, आगे बढाए गए लोगों में से है. सज्जन कुमार के खिलाफ अनेक प्रत्यक्षदर्शी दंगा पीड़ितों ने बयान दिए हैं. कमलनाथ और जगदीश टाइटलर भी संजय गांधी के ख़ास लोगों में रहे थे.
आरोपियों में राजीव के करीबियों का भी नाम है. 2014 में पूर्व पेट्रोलियम सचिव अवतारसिंह गिल ने बतलाया कि इंदिरा गांधी की हत्या के अगले दिन सुबह उन्हें यह कहते हुए सावधान रहने को कहा गया था कि दंगा होने वाला है. होटल मालिक और राजीव गांधी के मित्र ललित सूरी ने उनसे कहा कि वोटर लिस्ट के आधार पर निशानों को चुना जा रहा है, और ये सब तीन दिनों तक चलेगा. और ऐसा ही हुआ भी. तीन दिन चले दंगों में तीन हजार निर्दोष सिख मारे गए, और फिर सेना बुला ली गई, और दंगे एकाएक रुक गए, जैसे कि अचानक किसी ने उनका बटन बंद कर दिया गया हो. 84 की हिंसा में विधवा हुई अजय कौर ने अदालत में शपथ पत्र दिया है कि उन्होंने भगत को भीड़ से ये बोलते सुना कि ‘पुलिस तीन दिन तक कुछ नहीं करेगी, एक-एक सरदार को मार डालो.” गिल के अनुसार सूरी ने उनसे कहा कि अरुण नेहरू के हाथ में दंगों की कमान है, और सिखों के गले में टायर डालकर उन्हें जलाया जाएगा. अरुण नेहरू राजीव गांधी के रिश्तेदार थे, और गाँधी परिवार की पारंपरिक सीट रायबरेली से कांग्रेस के सांसद रहे.
दरकिनार गृहमंत्री –
84 में नरसिम्हाराव देश के गृहमंत्री थे, लेकिन उनके प्रधानमंत्री ने उन्हें दरकिनार करके छोड़ दिया था. गृहमंत्रालय के एक नौकरशाह ने आंखों देखा वाकया बयान किया है कि 31 अक्टूबर की शाम को राव रायसीना हिल के उत्तरी ब्लॉक स्थित अपने कार्यालय में बैठे थे. दिल्ली में हिंसा की आग अभी भड़की नहीं थी. राव के पास सिखों पर शुरू हुए छिट -पुट हमलों की ख़बरें आनी शुरू हुई थीं. वो अपने स्टाफ के साथ इन पर चर्चा कर रहे थे, कि उन्हें एक युवा कांग्रेस नेता का फोन आया जो कि राजीव गांधी से उसकी नजदीकी के लिए जाना जाता था. उसने राव से कहा कि “हिंसा की घटनाएं हो रही हैं, इनसे निपटने के लिए ‘सिंगल रिस्पांस’ की जरूरत है. इसलिए हिंसा से संबंधित सभी ख़बरें पीएमओ को भेजी जाएं.” इस तरह राव को दरकिनार करके क़ानून व्यवस्था की कमान प्रधानमंत्री कार्यालय ने अपने हाथ में ले लीं.
दो घंटे बाद वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी राव से मिलने पहुंचे और सेना बुलाने को कहा. लेकिन जेठमलानी को ध्यान में आया कि राव लगभग चुपचाप बैठे हैं, और लम्बी बातचीत के बीच उन्हें किसी भी पुलिस अधिकारी अथवा अन्य सुरक्षा अधिकारी का फोन नहीं आया. यानी वो सब सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय को रिपोर्ट कर रहे थे. इसी सिलसिले में इंद्रकुमार गुजराल ने भी राव से बात की थी, जिसे मनमोहन सिंह गांधी परिवार का कवच बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
जैलसिंह राजीव को फोन पर फोन लगाते रहे
उन तीन दिनों में दिल्ली में मारकाट मची हुई थी. बेचैन राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह राजीव गांधी को फोन पर फोन लगाते रहे पर राजीव फोन पर नहीं आए. पलटकर जवाब भी नहीं दिया. देश का राष्ट्रपति बेबस था. 2014 में जैलसिंह की बेटी डॉ. गुरदीप कौर ने एक साक्षात्कार में कहा कि देश का राष्ट्रपति प्रधानमंत्री को फोन लगाता रहा लेकिन जब प्रधानमंत्री ने कोई जवाब नहीं दिया तो उन्होंने अपने निजी अंगरक्षकों को लोगों की जान बचाने के लिए भेजा. गुरदीप ने कहा कि हिंसा फैलने के बाद 72 घंटों तक प्रधानमंत्री राजीव न तो खुद राष्ट्रपति भवन आए और न ही किसी और को राष्ट्रपति से बात करने भेजा.
जैलसिंह के प्रेस सचिव रहे तरलोचन सिंह ने भी यही बात कही. उन्होंने आगे बताया था कि दिल्ली कैंटोनमेंट में सेना मौजूद थी, लेकिन उस टुकड़ी को न बुलाकर मेरठ से फ़ौज को बुलाया गया और जब सेना पहुंची तो उसे गोली न चलाने का हुक्म देकर सिर्फ फ्लैग मार्च करने को कहा गया.
नफरत की राजनीति
नए प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को सौंपा और लोकसभा भंग करवा दी. राजीव के नेतृत्व में कांग्रेस लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतरी, और सिखों के खिलाफ नफरत को चुनाव का हथियार बनाया गया. उन दिनों कांग्रेस ने अखबारों में और पोस्टरों के रूप में एक विज्ञापन छपवाया, जिसमें एक सिख टैक्सी ड्राईवर का बड़ा फोटो था जिस पर लिखा था कि “क्या आप अपने टैक्सी ड्राईवर पर भरोसा कर सकते हैं?” इस तरह के अनेक अकल्पनीय कृत्य किये गए. मेनका गांधी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी से लोकसभा का चुनाव लड़ने खड़ी हुईं. मेनका गांधी सिख परिवार से हैं. अमेठी कांग्रेस ने मेनका के खिलाफ नारा निकाला “बेटी है सरदार की, कौम है गद्दार की..” कांग्रेस के नेता उत्तेजक भाषण देते चुनाव प्रचार कर रहे थे.
राजीव का ‘न्याय’
कांग्रेस पार्टी परिवार के नियंत्रण में थी. दंगों का नेतृत्व कांग्रेस के छोटे-बड़े नेता कर रहे थे. उन्हें नहीं रोका गया. मारे गए लोगों की संख्या राजीव सरकार ने महज 425 बताई. जब भाजपा ने दिल्ली के सभी इलाकों से आंकड़े एकत्रित करके मृतक संख्या लगभग 2800 बताई तो “भाजपा तो देशद्रोही पार्टी है” कहकर पल्ला झाड़ लिया गया. बाद में आहूजा कमीशन ने जांच करके बताया कि मृतक संख्या थी 2733.
काफी टालमटोल के बाद आखिरकार रंगनाथ मिश्रा आयोग बना जिसने जांच के नाम पर लीपापोती का काम शुरू किया. गवाहों और दंगा पीड़ितों द्वारा दी गई याचिकाएँ और शपथ पत्र की प्रतियाँ चुपके से दंगे के ताकतवर आरोपियों तक पहुँचाई जाने लगीं. इन बाहुबली आरोपियों ने इन गवाहों का मुँह बंद करने के लिए धमकी, लालच और पेशकशों का दौर शुरू किया. चुपचाप पहुँचाए गए ऐसे कई दस्तावेज बाद में दंगों के आरोपी सज्जन कुमार के घर से बरामद हुए. जांच की कार्रवाई को मीडिया तक पहुंचने से रोका गया. जब जांच पूरी हो गई तो राजीव सरकार ने रिपोर्ट को 6 महीने तक सार्वजनिक होने से रोका, और जब दबाव के बाद रिपोर्ट संसद में रखी गई तो सामने आया कि जांच के नाम पर वास्तव में क्या किया गया था. इस रिपोर्ट में दंगा हुआ ये तो माना गया था पर न तो किसी की (नरसंहार की) जिम्मेदारी तय की गई थी, न ही किसी आरोपी को नामित किया गया था. जाँच के नाम पर बरसों खानापूर्ति होती रही. दंगे के आरोपी कांग्रेस नेता पार्टी और सरकार में उच्च पदों को सुशोभित करते रहे. आज भी शीर्ष पदों पर बैठे हैं.
राव ही क्यों निशाने पर
राव कांग्रेस के पहले गैर गांधी प्रधानमंत्री थे, जो गांधी परिवार के नियंत्रण में नहीं. वो मनमोहन सिंह की तरह ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ नहीं थे, जो दस जनपथ के हाथों चुपचाप बंधक बने रहे. राव को सोनिया गांधी पसंद नहीं करती थीं. इसकी पुष्टि राजीव सरकार में विदेश राज्यमंत्री और फिर मनमोहन सरकार में विदेशमंत्री रहे नटवर सिंह ने अपनी किताब ‘एक जिंदगी काफी नहीं’ में की है. इसीलिए पूर्व प्रधानमंत्री होते हुए भी राव का अंतिम संस्कार दिल्ली में नहीं हो सका. मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार और उनके पीएमओ के मुख्य प्रवक्ता रहे संजय बारू ने अपनी किताब में खुलासा किया है, कि राव की मृत्यु के तुरंत बाद सोनिया गांधी के सबसे करीबी अहमद पटेल उनके पास आए और उनसे कहा कि वो राव के परिवार से बात करें कि वो उनका दाह संस्कार हैदराबाद में करवाएं. बारू ने पूछा कि “दिल्ली में करने में कोई दिक्कत है क्या..?” अहमद पटेल ने कोई उत्तर नहीं दिया, लेकिन हुआ वही जो ‘हाईकमान’ मर्जी थी. ऐसे में, शाही खानदान के बला उतारने के लिए राव से बेहतर कौन होगा भला.
राज परिवार की भूमिका पर मौन मनमोहन
ज़ाहिर है कि जितने सीधे ढंग से मनमोहन सिंह ने ये बात कह दी, उतनी सीधी यह बात है नहीं. राजीव गाँधी और उनके करीबियों का अपराध राव के सर पर मढ़कर लोगों की आंखों में धूल नहीं झोंकी जा सकती. ऐसी लचर बहानेबाजी से 84 के नरसंहार के दाग धुलने वाले नहीं.