सिख दंगा: मनमोहन जानते हैं गांधी परिवार के हित में कब बोलना है कब खामोश रहना है
   दिनांक 08-दिसंबर-2019
मनमोहन सिंह ने ये आरोप ऐसे व्यक्ति पर चस्पा किया है, जो आज अपना बचाव करने या उस समय का घटनाक्रम बताने के लिए जीवित नहीं है. क्या यही स्टेट्समैनशिप है. क्या किसी दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री पर बिना किसी साक्ष्य के इस तरह का आरोप लगा देना घटियापन नहीं है

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नेहरू गांधी परिवार के कंधे पर 1984 के सिख नरसंहार का बोझ कम करने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कर भी क्या कर सकते थे. दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हाराव पर उन्होंने इस नरसंहार को न रोकने का आरोप उछाल दिया. कुछ लोगों के लिए मनमोहन भले ही महान अर्थशास्त्री और स्टेट्समैन रहे हों, लेकिन उनकी असलियत मौका परस्त और पाला बदल की है. जिसने साथ दिया, उसी को दगा दिया. वो नरसिम्हाराव जो, उनके मेंटोर थे, जिन्हें वह सार्वजनिक रूप से गुरू कहते थे, अब मनमोहन के किसी काम के नहीं हैं. भारतीय लोकतंत्र की सबसे कलंकित सरकार को रिमोट चालित पीएम के तौर पर चलाने के कुख्यात मनमोहन कुछ भी बोल सकते हैं.
पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल की 100वीं जयंती का मौका था. इस मौके पर बोलने के लिए मनमोहन सिंह को बुलाया गया था. मनमोहन सिंह ने इस मंच का इस्तेमाल निहायत सस्ते और घटिया तरीके से किया. उन्होंने कहा कि जब 1984 की दर्दनाक घटना हुई, तो इंद्र कुमार गुजराल उसी शाम तत्कालीन गृह मंत्री पी.वी. नरसिम्हाराव के पास गए थे. उन्होंने राव से कहा था कि स्थिति बेहद नाजुक है. सरकार को तुरंत सेना बुला लेनी चाहिए. अगर गुजराल की सलाह सुनी गई होती, तो 1984 के सिख नरसंहार को टाला जा सकता था. मनमोहन के इस कथित रहस्योद्घाटन पर हंगामा तो बरपा होना ही था. लेकिन जरा उस सोच के पीछे चलते हैं, जिसके चलते मनमोहन सिंह ने ये आरोप ऐसे व्यक्ति पर चस्पा किया है, जो आज अपना बचाव करने या उस समय का घटनाक्रम बताने के लिए जीवित नहीं है. क्या यही स्टेट्समैनशिप है. क्या किसी दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री पर बिना किसी सुबूत के इस तरह का आरोप लगा देना घटियापन नहीं है. लेकिन मनमोहन को इससे कोई लेना देना नहीं. उनके बयान का एकमात्र उद्देश्य यही है कि सिख नरसंहार का जो भूत गांधी-नेहरू परिवार का पीछा नहीं छोड़ता, उसका जिम्मेदार किसी और को बना दिया जाए. वरिष्ठ अधिवक्ता एच. एस. फूल्का कहते हैं कि उस समय सेना बुलाई जानी चाहिए थी. नरसिम्हाराव सेना बुलाना भी चाहते थे. लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया. यदि फूल्का के बयान की रोशनी में देखा जाए, तो जिस नरसिम्हाराव को मनमोहन विलेन बनाना चाहते हैं, वह असल में उस नरसंहार को रोकने के लिए बहुत गंभीर थे.
इस सारे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण तथ्य है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी और खुद मनमोहन सिंह कई मौकों पर सिख नरसंहार के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांग चुके हैं. लेकिन किसी भी मौके पर इन नेताओं ने पूरे घटनाक्रम में नरसिम्हाराव वाले एंगिल का जिक्र नहीं किया. सवाल उठना लाजिमी है कि आज मनमोहन ये दाव क्यों खेल रहे हैं. यह राजनीति में प्रासंगिकता का सवाल है. मनमोहन उम्र के साथ अप्रासंगिक होते जा रहे हैं. सोनिया गांधी की टीम में उनके लिए सम्मान तो है, लेकिन स्थान नहीं है. वह चंद मौकों पर नुमाइश की वस्तु से ज्यादा नहीं रह गए हैं. ऐसे में कभी खुद की ध्वस्त की गई अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए जुमले उछालते हैं, तो अब एक नया पैतरा लेकर सामने आए हैं.
आप भले ही मनमोहन सिंह को आर्थिक उदारीकरण का माईबाप समझते रहें, लेकिन देश का सबसे बड़ा शेयर घोटाला उनके वित्त मंत्री रहते हुए हुआ था. उनकी नाक के नीचे इतना बड़ा घोटाला अंजाम दिया गया, लाखों लोग बर्बाद हो गए. मनमोहन सिंह ने इस्तीफे की पेशकश की, तो उस समय भी दीवार बनकर नरसिम्हाराव ही उनके साथ खड़े थे. उन्होंने इस्तीफा अस्वीकार कर दिया. उनका पोर्टफोलियो तक नहीं बदला. जबकि सीधे वित्त मंत्रालय पर घोटाले की आंच थी. मनमोहन सिंह सत्ता के साथ बदलते रहे. जब राव का जमाना गया और कांग्रेस सीताराम केसरी के हाथ में आ गई, तो मनमोहन सिंह ने नरसिम्हाराव को छोड़ दिया और केसरी का दामन थाम लिया. सीताराम केसरी ने उन्हें कांग्रेस कार्यसमिति में नामित कर दिया. 1996 के लोकसभा चुनाव में मनमोहन सिंह हार गए, तो केसरी ही थे, जिन्होंने उन्हें दोबारा राज्यसभा में पहुंचाया. लेकिन जब सोनिया गांधी कांग्रेस पर काबिज हुईं और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों ने केसरी से अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के लिए कहा, तो मनमोहन सिंह उनमें सबसे आगे थे. केसरी को मनमोहन सिंह के इस बर्ताव से काफी धक्का लगा. उन्होंने अपने तमाम सहयोगियों से मनमोहन के यूं पाला बदल जाने का शिकवा भी किया.
दस साल तक रिमोट से संचालित रहे मनमोहन सिंह ने कभी इस बात प्रकाश नहीं डाला कि उनके महान अर्थशास्त्र ज्ञान के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था का बंटाधार कैसे हो गया. कभी मनमोहन सिंह ये भी बताएंगे कि हिंदू आतंकवाद का फर्जी नैरेटिव तैयार करने के लिए कौन जिम्मेदार है. क्या वह कभी बताएंगे कि टूजी से लेकर अगस्ता वेस्टलैंड तक दर्जनों घोटालों की फेहरिस्त के लिए कौन जिम्मेदार है. मनमोहन सिंह जानते हैं कि कब क्या बोलना है और कब खामोश रह जाना है. वह उस समय भी खामोश थे, जब उनकी सरकार के अध्यादेश को राहुल गांधी ने फाड़कर कूड़े की टोकरी में डाल दिया था.