जींद ने कांग्रेस की उड़ाई नींद
   दिनांक 01-फ़रवरी-2019

 मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के साथ जींद से जीतने वाले विधायक कृष्णा मिड्ढा
मध्य प्रदेश, राजस्थान औरर छत्तीसगढ़ की सत्ता गंवाने के बाद राजनीतिक पंडित भारतीय जनता पार्टी के अवसान की घोषणाएं इन दिनों कुछ ज्यादा ही करने लगे हैं। उनके लिए हरियाणा के बांगर इलाके से निराश करने वाली खबर है। जींद जिस इलाके में आता है, उसे बांगर कहा जाता है। जींद की धरती पर अब से पहले तक कभी कमल नहीं खिला था, लेकिन यहां से कमल को खिलाकर राज्य के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने उस धारणा पर चोट पहुंचा दी है, जिसके मुताबिक वे भारतीय जनता पार्टी के सबसे कमजोर मुख्यमंत्रियों और नेताओं में शुमार किए जा रहे थे। अब उनका कहना सहज ही बनता है कि लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी राज्य की सभी दस सीटों पर जीत हासिल करेगी। जींद की जीत इसलिए भी भारतीय जनता पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह राज्य के कद्दावर नेता और राज्य में जननायक कहे जाने वाले देवीलाल के प्रभाव वाला इलाका है। वहां से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर पंजाबी समुदाय के कृष्ण मिड्ढा की जीत पार्टी को निश्चित तौर पर मनोबल बढ़ाने का मौका है। यह जीत इसलिए भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके पहले ही राज्य के नगर निगमों के चुनावों में भी भारतीय जनता पार्टी ने एक तरफा जीत हासिल की है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राफेल के मुद्दे पर जितना कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मंच दर मंच घेरने की कोशिश कर रहे हैं, उतना ही इस मोर्चे पर सक्रिय पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला भी हैं। सुरजेवाला मौजूदा हरियाणा विधानसभा में कैथल से विधायक हैं, लेकिन कांग्रेस ने जींद से उन्हें उतारकर हरियाणा में भी अपना प्रभाव दिखाने की कोशिश की। लेकिन जींद की जनता ने उन्हें दूसरे नंबर लायक भी नहीं माना। तीसरे नंबर पर पहुंचे रणदीप सुरजेवाला यह भूलकर अपनी हार के लिए ईवीएम पर सवाल उठा रहे हैं, कि उसी दिन हुई मतगणना में राजस्थान की रामगढ़ की सीट से उनकी ही पार्टी की उम्मीदवार सफिया खान जीतने में कामयाब रहीं। अगर ईवीएम का ही फार्मूला माना जाए तो ईवीएम का रामगढ़ में राजस्थान की सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी ने ने भी किया।
 
जींद में हार के बाद कांग्रेस की नींद उड़ना स्वाभाविक है। 2019 के पहले अपना विजय रथ चलाने के उसके अभियान पर ब्रेक लग गया है। कांग्रेस ने अपने राष्ट्रीय स्तर के नेता को इस उपचुनाव में सिर्फ बीजेपी को हराने के लिए ही नहीं उतारा था, बल्कि इस उपचुनाव को प्रभावी बनाने के लिए भी उतारा था। लेकिन कांग्रेस का दुर्भाग्य रहा कि वह इसमें कामयाब नहीं रही।
जींद में उपचुनाव वहां के इंडियन नेशनल लोकदल के विधायक हरिश्चंद्र मिड्ढा के निधन के चलते हुआ था। इन दिनों पारिवारिक लिमिटेड पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल में विभाजन हो गया है। जेल में बंद पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के बड़े बेटे जेल में ही बंद अजय चौटाला के बेटे दिग्विजय सिंह ने दादा और चाचा अभय चौटाला से विद्रोह करके अपनी अलग जननायक जनता पार्टी बना ली। उसके बैनर तले वे खुद मैदान में उतरे और बारह हजार से ज्यादा वोटों से उन्हें मात खानी पड़ी है। इस पूरी प्रक्रिया में उन्होंने साबित कर दिया है कि भले ही वे हारे हैं, लेकिन इंडियन नेशनल लोकदल से कहीं ज्यादा प्रभाव उनका है। क्योंकि इंडियन नेशनल लोकदल का प्रत्याशी चौथे स्थान पर रहा।
हर चुनाव, आने वाले अगले चुनाव पर कुछ न कुछ असर छोड़ता है। जींद उपचुनाव के नतीजों का संकेत साफ है। इंडियन नेशनल लोकदल और जननायक जनता पार्टी की वर्चस्व की जंग में हरियाणा के बहुमत वोटर यानी जाट समुदाय में विभाजन होगा। कांग्रेस की ओर उन वोटरों का लौटना संभव नहीं दिख रहा। हालांकि वह लगातार कोशिश कर रही है। आने वाले दिनों में अगर कांग्रेस अपने धुर विरोधी इंडियन नेशनल लोकदल या उससे निकली जननायक जनता पार्टी से गलबंहिया डालने की कोशिश करे तो हैरत नहीं होनी चाहिए। एक बात और ध्यान देनी होगी कि जननायक जनता पार्टी को इस उपचुनाव में आम आदमी पार्टी ने समर्थन दिया था। इससे साफ है कि राज्य में आम आदमी पार्टी तमाम कोशिशों के बावजूद जड़ें जमाने में कामयाब होती नजर नहीं आ रही है। बहुल जाट समुदाय के वोटरों में बिखराव, कांग्रेस की पतली हालत और आम आदमी की पस्त हालत का फायदा अगर भारतीय जनता पार्टी उठाने की कोशिश करेगी। हरियाणा की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल अक्टूबर में खत्म होने जा रहा है। ऐसे में हो सकता है कि राज्य सरकार लोकसभा चुनावों के साथ ही राज्य में चुनाव कराने की कोशिश करे।