कांग्रेस के लिए एजेंडा पत्रकारिता क्यों ?
   दिनांक 10-फ़रवरी-2019
 
आम चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहे हैं, आम लोग भी मानने लगे हैं कि राजनीतिक दल आने वाले दिनों में एक-दूसरे को पछाड़ने के लिए राजनीतिक तौर पर ऐसे-ऐसे शिगूफे छोड़ सकते हैं, जो हक़ीकत से कोसों दूर होंगे। इसका सहज निशाना सत्ता में होने के चलते नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली केंद्र सरकार ही होगी। जिस तरह एक जिम्मेदार समझे जाने वाले अखबार द हिंदू और उसके गंभीर संपादक एन राम ने बहुचर्चिच राफेल सौदे पर रक्षा मंत्रालय की नोटिंग का खुलासा करके केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया, उससे तो यह सोच सही साबित होती है।
पता नहीं एन राम ने जानबूझकर राफेल सौदे वाली नोटिंग को आधा-अधूरा छापा या फिर उनके समाचार स्रोत ने जानबूझकर उन्हें अधूरी नोटिंग ही मुहैया कराई। अगर एन राम ने जानबूझकर ऐसा किया तो यह उनकी पत्रकारीय साख ही नहीं, प्रैक्टिस पर भी सवाल उठाता है। ढाई दशक पहले जब हमने पत्रकारिता की पढ़ाई की थी तो हमें एक तथ्य सिखाया गया था, वह कि अपने स्रोत पर भी हमेशा आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए। उसके दिए तथ्यों की जांच दूसरे तरीकों से भी कर लेनी चाहिए। चलिए एकबारगी मान लेते हैं कि एन राम को उनके स्रोत ने जानबूझकर एक तरफा नोटिंग ही मुहैया कराई तो उसमें उसकी कोई गलती नहीं है। निश्चित तौर पर उसका उद्देश्य इसके जरिए मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा करना होगा। अब यह सवाल हो सकता है कि आखिर वह स्रोत कौन हो सकता है? इस सवाल का जवाब खुला रहस्य है। इसे जाहिर करने के लिए कुछ और शब्द खर्च करने की जरूरत नहीं है।
यह घटना भारतीय पत्रकारिता के उस स्वरूप को भी जाहिर करती है, जिसे लेकर आज खूब चर्चा हो रही है। आज माना जा रहा है कि भारतीय पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा एजेंडा आधारित रिपोर्टिंग कर रहा है। वैसे सरकार ने अगर जानबूझकर कुछ गड़बड़ी की है, उसने किसी एक पक्ष को जानबूझकर फायदा पहुंचाया है तो ये तथ्य जनता के सामने आने चाहिए। तब भी पत्रकारिता का एक एजेंडा होता है सार्वजनिक निधि के दुरूपयोग को जनता के सामने लाना। लेकिन उसमें व्यापक हित का संदेश छुपा होता है, ऐसा नहीं कि उससे किसी एक पक्ष को फायदा पहुंचता है। लेकिन अगर किसी रिपोर्टिंग से किसी एक पक्ष को बेजा फायदा मिलता है तो इसे एजेंडा पत्रकारिता कहेंगे और दुर्भाग्यवश एन राम की राफेल फाइल की नोटिंग से संबंधित रिपोर्टिंग इसी श्रेणी में आती है। यह बात और है कि सरकारी सूत्रों ने जिस तरह पूरी नोटिंग को सार्वजनिक मंचों पर पेश करने में फुर्ती दिखाई, उससे शायद एन राम को अपनी साख का अहसास हुआ और अगले दिन द हिंदू ने पूरी नोटिंग छापी। लेकिन उसकी भाषा में कहीं से भी खेद या गलती होने का भाव नहीं है। अगर अगले दिन की रिपोर्ट खेदभाव लेकर प्रकाशित की गई होती तो निश्चित मानिए, इससे द हिंदू की और साख ही बढ़ती। क्योंकि किसी से भी गलती हो सकती है और किसी भी रिपोर्टर का स्रोत अपने निहित स्वार्थ के चलते अधूरी जानकारी पेश कर सकता है।
अपनी बहुचर्चित पुस्तक एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर में वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने एक महत्वपूर्ण बात लिखी है। उन्होंने लिखा है कि अगर चौबीस घंटे के भीतर सच का खंडन न किया जाए और उस सच की हक़ीकत ना बताई जाए तो वह झूठ सच के तौर पर स्थापित हो जाता है। लगता है कि द हिंदू द्वारा राफेल सौदे की अधूरी नोटिंग की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते वक्त केंद्र सरकार के सूत्रों ने संजय बारू की स्थापना को समझा। जिस तरह आनन-फानन में केंद्र सरकार के सूत्रों की ओर से पूरी नोटिंग प्रेस को मुहैया कराई गई, उससे यही साबित होता है। जब सार्वजनिक मंचों पर राफेल सौदे से जुड़ी फाइल की पूरी नोटिंग आ गई तो लोगों को पता चला कि हक़ीकत क्या है। इस संदर्भ में एन राम की रिपोर्टिंग से इस फाइल को लेकर जो कुहासा छाया हुआ था, वह साफ होता नजर आया। यह दुखद ही है कि इससे एन राम की छवि पर ही बट्टा लगा है। उन जैसे गंभीर और प्रतिष्ठित संपादक की शख्सियत पर ऐसे सवाल उठना, निश्चित तौर पर निराशाजनक है।