फरवरी 1931 जब कश्मीर में शुरू हुआ था हिंदुओं का कत्लेआम
   दिनांक 11-फ़रवरी-2019
 
कश्मीर घाटी में कश्मीरी हिंदूओं पर हमले 1989-90 में नहीं उससे कहीं पहले शुरू हो गये थे, आजादी से भी पहले। हिंदूओं को खदेड़ने की साजिश के तहत पहला नरसंहार हुआ था फरवरी 1931 में, बड़गाम के कनीकूट गांव में। जहां एक ही परिवार के 8 लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी
 आज भी कश्मीरी हिंदू अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन करने को मजबूर हैं ( फाइल फोटो )
दरअसल कनीकूट चडूरा तहसील के नगाम के पास एक गांव था, नगाम में काफी संख्या में कश्मीरी हिंदू थे। लेकिन कनीकूट में सिर्फ दो हिंदू परिवार थे। पं. ज़ना भट और जानकी नाथ परिवार। उनमें से एक ज़ना भट्ट परिवार में कुल 12 लोग थे जिनमें से 3 लोग श्रीनगर नगर में पढाई कर रहे थे, गांव में थे 9 सदस्य। जानकीनाथ का परिवार थोड़ी दूरी पर था।
पं ज़ना भट्ट के पूर्वज कभी उस गांव में आकर बसे थे। धीरे-धीरे उन्होंने गांव में काफी ज़मीन-जायदाद इकठ्ठा कर ली थी। उनके सेबों के कई बाग़ान थे, इलाके में रसूख था। उनके खेतों में मुस्लिम मजदूर काम करते थे, सब कुछ ठीक था। लेकिन इसी दौर में अग्रेंज घाटी में महाराजा हरि सिंह और कश्मीरी हिंदूओं के खिलाफ मुस्लिमों को भड़का रहे थे। गांव-गांव, शहर-शहर आग भड़ाकायी जा रही थी। जिसका नतीज़ा ये हुआ कि जना भट्ट का रसूख भी पड़ोसी गांव वाताकूल के मुस्लिमों को खटकने लगा और उनको खत्म करने की साजिश रच डाली।
फरवरी,1931 की एक रात जब वाताकूल गांव के कुछ मुस्लिम ज़ना भट के दरवाज़े पर आये और परिवार के सभी लोगो को बाहर आने को कहा। सब पहले से एक दूसरे को जानते थे तो परिवार वालों ने उन लोगों पर भरोसा करके उनकी बात सुनने के लिए बाहर भी गए। जैसे ही ज़ना भट परिवार के लोग बाहर निकले वैसे ही उन्होंने कुल्हाड़ी से सबको काटना शुरू किया, इससे बचने के लिए परिवार के तीन लोग ऊपर पहली मंज़िल पर बने कमरों की तरफ भागे। लेकिन हत्यारों की तादाद ज़्यादा होने के कारण वो नहीं बच पाए और पहली मंज़िल पर जाकर छुपे हुए परिवार के लोग भी मारे गए।
इस भयानक हत्याकांड में महिलाओं और बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया। हत्या करने बाद उन हत्यारों ने सभी सबूत मिटाने के लिए पहली मंज़िल पर आग लगा दी और वहां से फरार हो गये। उस नरसंहार में बस एक बच्चा जिन्दा रह गया था, जो उस समय गुर्जर नौकर के साथ सो रहा था और ज़ना भट के तीन पोते - प्रेम नाथ, राधाकृष्णन और जिया लाल बच गए क्योंकि वे नरसंहार के समय श्रीनगर में थे। वफादार नौकर अपने साथ परिवार के अकेले बचे हुए लड़के को लिया और घर की एक खिड़की से छलांग लगाकर भागने में कामयाब हो गया, नौकर भागकर एक पड़ोसी किसान परिवार के पास गया और उसने पूरी घटना सुनाई।

 
कश्मीर के शोपियां में खाली पड़े कश्मीरी हिंदुओं के घर ( फाइल फोटो)
इस नरसंहार के बाद पूरे गांव में हाहाकार मच गया। इससे बाद प्रशासन ने नरसंहार की जांच की। लेकिन हत्यारे इसकी तैयारी भी पहले ही कर चुके थे। उन्होंने पटवारी के साथ मिलकर इस वारदात की एक झूठी रिपोर्ट बनवाई। जिसमें पटवारी ने घर में अचानक आग लगने को 8 लोगों की हत्या की वजह बताया। चूंकि पटवारी भी कश्मीरी पंडित था, और नौकर जिसका कहना था कि हत्याकांड मुस्लिमों ने किया। तो पूरी संभावना थी कि प्रशासन पटवारी की रिपोर्ट की सही मान लें।
लेकिन इससे हिंदूओं में काफी रोष खड़ा हो गया। हत्याकांड के विरोध में घाटी के तमाम हिंदूओं ने विरोधस्वरूप 2 दिन का उपवास रखा। मामला बढ़ता देख नौकर की निशानदेही पर वाताकूल गांव के हत्यारों को गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया गया। मुकदमे का संचालन मुख्य न्यायाधीश अर्जन नाथ अटल ने किया। मुकदमे की अवधि के दौरान 13 आरोपियों को हिरासत में लिया गया जो सभी वातकूल गांव के रहने वाले मुसलमान थे। अकेले बच्चे और गुर्जर नौकर की गवाही के कारण न्यायाधीश ने 1933 में 9 मुख्य मुस्लिम आरोपियों को मौत की सजा सुनाई।