‘हमने भ्रष्टाचार को कम कर जनहित में काम किया’
   दिनांक 11-फ़रवरी-2019
देश की राजधानी से सटा हरियाणा। छोटा लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद सजग राज्य। खेती-किसानी और उद्योगों में देश में प्रमुख स्थान रखने वाला। पिछले साढ़े चार साल से यहां भाजपा की सरकार है। हरियाणा में विकास, रोजगार, स्वास्थ्य, सुविधाएं जैसे तमाम मुद्दों को लेकर पाञ्चजन्य संपादक हितेश शंकर और डिप्टी न्यूज एडीटर आदित्य भारद्वाज ने राज्य के मुख्यमंत्री मनोहर लाल से विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:-
 
हरियाणा भूगोल के लिहाज और राजनीतिक सीटों के हिसाब से बहुत छोटा नहीं है लेकिन बहुत बड़ा भी नहीं है। ऐसी स्थिति में राजनीतिक चुनौतियां बहुत बड़ी हैं। इन चुनौतियों को आप कैसे देखते हैं ?
देखिए, चुनौतियां हमारे लिए कोई खास नहीं हैं। हम पिछले साढ़े चार साल से जनहित योजनाओं और हमारे लक्ष्यों को पूरा करने के लिए लगातार काम कर रहे हैं। इसलिए हरियाणा में बहुत बड़ी चुनौतियां हैं, ऐसा नहीं है। कुछ चुनौतियां हैं जिसमें विपक्ष के लोग बंटे हुए हैं। बिखरे हुए हैं। इसलिए ऐसी चुनौतियों से हैरान होने वाली कोई बात नहीं है।
हाल ही में पांच राज्यों के चुनाव, हुए जिसे विपक्ष द्वारा चुनौती की तरह देखा गया। ऐसा माहौल बनाया गया जैसे कि भाजपा का किला ढह रहा हो। ऐसे में हरियाणा में हुए पांच निगमों के चुनाव में भाजपा प्रचंड बहुमत से जीती। फिर जींद उप-चुनाव भी जीती। इसे आप कैसे देखते हैं?
देखिए, काम करने का सबका अपना-अपना तरीका होता है। मैं किसी दूसरे राज्य के बारे में टिप्पणी नहीं करूंगा। हमारे अपने राज्य के बारे में हमें पता है कि पिछली सरकार का काम करने का तरीका और हमारी सरकार का काम करने का तरीका अलग है। हमने अपने काम करने के तरीके को जिस तरह से बदला, उस बदलाव के कारण जनता को लगता है कि शासन ऐसे ही होना चाहिए जैसा अब हो रहा है। जनता को शासन से, सरकार से जो अपेक्षाएं थीं, वे पूरी हो रही हैं, ऐसा पहले नहीं होता था। पहले समाज भय से त्रस्त रहता था। अपराध राजनीतिक लोगों के संरक्षण में पलता था। भ्रष्टाचार चरम सीमा पर था। हमने इन सब चीजों को बंद किया है। जींद का जो उपचुनाव भाजपा जीती, उसने भाजपा के शासन, उसके काम करने के तरीके पर मुहर लगाई है। भ्रष्टाचार खत्म हुआ है और लोगों को लगने लगा है कि सरकार निष्पक्ष तरीके से सही काम कर रही है।
वैसे, शासन करना इतना आसान तो नहीं था। कई सारे मुद्दे आपके यहां आए। जैसे, आपके यहां रामपाल वाला मुद्दा आया। डेरे का मुद्दा आया। जाट आरक्षण का मुद्दा आया। एक के बाद एक मुद्दे आते रहे। आपने इनका सामना कैसे किया?
ये सारे के सारे मुद्दे हमें विरासत में मिले हैं। यहां हमारा खड़ा किया हुआ कोई मुद्दा नहीं था। हां, हमने इन मुद्दों को किसी राजनीतिक लाभ के लिए दबाने की कोशिश नहीं की। और जिस एजेंसी को जो काम करना था, वह अपना काम करती रही। उसमें हमने दखलंदाजी नहीं की। अदालत ने कहा कि रामपाल को पेश करो। न्यायालय का आदेश था यह। हमारी सरकार को बने 15 दिन ही हुए थे तब की बात है। हमने बिना लापरवाही बरते, बिना एक भी गोली चलाए समझबूझ से रामपाल को कानून के हवाले कर दिया। हमारा काम खत्म। इसके बात जहां तक विषय है जाट आरक्षण का, दुनिया में और ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलेगा जिसमें किसी की मांग को पूरा कर दिया जाए मगर उसी मांग को लेकर फिर आंदोलन खड़ा हो जाए। मांग तो यह थी न कि उनको दस प्रतिशत आरक्षण चाहिए। हमने मांग को स्वीकार किया और सर्वसम्मति से विधानसभा में एक्ट बना दिया। एक्ट बनाने के बाद अदालत से उस पर रोक लगाई गई। हमने तो पूरा प्रयास किया था आरक्षण देने का। अदालत ने इसको रोक दिया और मामला अभी तक चल रहा है। इसका मतलब यह कि इसके पीछे कोई मुद्दा नहीं था बल्कि इसके पीछे राजनीति थी। अभी धीरे-धीरे इसकी कई परतें खुल रही हैं। इसके लिए जांच कमीशन बैठा है। उसकी रिपोर्ट सामने आएगी। दूसरी पार्टियों ने अगर इसमें राजनीति करने की कोशिश की, तो मुझे लगता है, कहीं न कहीं वे असफल रहे हैं। इस तरह की राजनीति नहीं करनी चाहिए, मुझे लगता है, कहीं न कहीं नुक्सान उन्हीं को हुआ है।
आपने जब हरियाणा की सत्ता संभाली थी उस समय राज्य में बिल्डर लॉबी, प्रॉपर्टी डीलरों का गठजोड़-सा था। जमीन के भाव आसमान छू रहे थे। अब जबकि हरियाणा में आम आदमी मकान बनाने की सोचने लगा है, जमीन के दाम कम हुए हैं। यह सब आपने कैसे किया?
जिन लोगों का यह उद्देश्य था कि हमें जमीन को हथियाना है, जमीन पर जबरन कब्जा करना है, जमीन में कोई न कोई भ्रष्टाचार करना है। जमीन को इधर से उधर करके धन संग्रह करना है— वे सब लोग उस प्रकार के धंधे करते रहे। अंदर-अंदर मिलीभगत करना। दामों को इधर-उधर करना। बिल्डरों के साथ सांठ-गांठ करना। बिल्डरों को लाइसेंस देना। अधिग्रहण का डर दिखाना। अधिग्रहण करना, फिर छोड़ देना। आज हम गुरुग्राम में देखते हैं कि उन्होंने लाइसेंस तो दिए। पिछली सरकार ने अपने 10 साल के कार्यकाल में 1500 लाइसेंस दिये। हमने अपने पांच साल के कार्यकाल में 150 भी नहीं दिये। जबकि हमने लाइसेंस देने में पारदर्शिता बरती। लाइसेंस उतने ही दिए गए जितने दिए जाने चाहिए। आज आप गुरुग्राम में देखते हैं, बिल्डरों ने जो बिल्डिंग बनार्इं वे खाली पड़ी हैं। बिल्डर की बनाई बिल्डिंग बिकी नहीं। इसलिए दामों में उतार-चढ़ाव भी उतना ही ठीक है जितनी संभावना हो। संभावना से दूर जाकर काम करेंगे तो नुक्सान तो होगा ही।
एक सवाल यह भी आता है कि हरियाणा में जो घुमंतू जातियां हैं उनकी काफी संख्या है। उसमें बहुत सारे लोगों के ‘येलो कार्ड’ नहीं बने हैं। पेंशन का काम नहीं हुआ। क्या उसके लिए कुछ अतिरिक्त प्रयास आपके द्वारा किए गए ?
यह हमें पता है। यहां कई छोटे-छोटे समूह हैं जिन पर आज तक किसी ने ध्यान नहीं दिया। पहले की सरकारें हमेशा बड़े समूह को वोट बैंक के नाते ही देखती रहीं। हमने किसी को वोट बैंक के नाते नहीं देखा। हमने कहा कि जो वंचित वर्ग है, जो पात्रता रखता है उसकी सहायता होनी चाहिए। समाज के छोटे-छोटे वर्गों को कैसे सहयोग किया जाए। हमने सत्ता में आने के बाद घुमंतू समाज के कल्याण के लिए एक बोर्ड बनाया। इस तरह से हमने साढ़े नौ हजार परिवारों को चुना। उनके पास कार्ड है या नहीं है तो भी उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत आवास मिलना चाहिए, ऐसी हमने योजना बनाई। बहुत जल्द उनको किसी योजना के तहत मकान बनाकर दिए जाएंगे, उन्हें समझाया गया कि एक जगह टिक कर रहेंगे तो बच्चे पढ़ेंगे-लिखेंगे, अच्छा रोजगार मिलेगा तो परिवार में खुशहाली आएगी।
यह समाज कन्वर्जन के निशाने पर भी है। हरियाणा में इस पर चर्चा नहीं होती, लेकिन बाकी के कुछ राज्यों में, जैसे झारखंड में कन्जर्वन के लिए सख्त कानून बने हैं। इस विषय में हरियाणा में आप क्या कर रहे हैं।
हरियाणा में ऐसा विषय नहीं है अभी। यहां पर बाहर के लोग आकर कुछ गड़बड़ करना तो चाहते हैं, जैसे रोहिंग्या कुछ जगहों पर आ गये हैं। और वह आबादी जो दूसरे प्रांत से रोजगार के लिए आती है परंतु हरियाणा में कन्वर्जन कोई मसला नहीं है जिसके लिए हमें चिंता करनी हो।
आपने कहा कि अखिल भारतीय स्तर की जो योजनाएं हैं, लोगों (वंचितों) को उसका लाभ मिलेगा। अब जैसे आयुष्मान योजना की बात करें तो इसका जो पैमाना है वह 2011 की जनगणना है। इसके आगे एक बड़ी संख्या छूट जाती है। इसके लिए कोई योजना है?
हां, इस विषय में हमारी बात केंद्र सरकार से हुई। वहां से कहा गया है कि अब जो 2021 की गणना होगी, उस हिसाब से उसमें नए लोग जोड़े जाएंगे। फिर भी उसमें हमने कुछ वर्ग जो हमें लगता है कि जैसे इस योजना से जोड़ा जाना चाहिए, उन्हें हमने उसमें जोड़ा है। जैसे चौकीदारों का परिवार। इस तरह हमने पत्रकारों को भी जोड़ा है। जैसे-जैसे आवश्यकता पड़ेगी उन्हें और जोड़ा जाएगा। हरियाणा में इस योजना में साढ़े पन्द्रह लाख परिवार कवर हो रहे हैं। इसमें सामान्यत: लगभग सभी परिवार आ ही जाते हैं। यदि कुछ रह जाएंगे तो कोई विशेष योजना बनाकर केन्द्र की योजना से अलग हरियणा सरकार की ओर से उन्हें जोड़कर काम किया जाएगा।
अभी कुछ राज्यों में जहां कांग्रेस ने सरकारें बनाईं, जैसे मध्य प्रदेश की बात करें। मीसाबंदियों की पेंशन बंद कर दी गई। मीसाबंदियों को आप कैसे देखते हैं और हरियाणा में उनके लिए क्या प्रावधान है?
ऐसा कर उन्होंने अच्छा नहीं किया। वे लोग लोकतंत्र के प्रहरी हैं। किसी पार्टी के नाते उनका मूल्यांकन किया जाए, यह ठीक नहीं है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी ने जो भी निर्णय लिया, वह मानकर यह चलते हैं कि वह लोकतंत्र पर एक प्रहार था। जो लोग आजादी के लिए जेल में रहे, उनका मान-सम्मान होना आवश्यक है। हमारी पार्टी ने जो मीसाबंदियों को पेंशन लागू की थी वह रहनी चाहिए। इसमें राजनीति नहीं होनी चाहिए। हमने हरियाणा में उनके लिए पेंशन लागू कर दी। इसमें लगभग 800-900 लोग हैं।
आप एक सख्त प्रशासक और स्वच्छ छवि वाले नेता हैं। हर दल के कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं और आकांक्षाएं होती हैं। पहली बार हरियाणा में भाजपा की सरकार बनी है तो जाहिर है, पार्टी कार्यकर्ताओं की कुछ अधिक अपेक्षाएं और आकांक्षाएं भी होती होंगी। कार्यकर्ताओं की चिंता करना और स्वच्छ पारदर्शी छवि भी बनाकर रखना आसान नहीं है। आप ऐसा कैसे करते हैं?
देखिए, मैं स्वयंसेवक रहा हूं। इसलिए मेरे कार्यकर्ताओं से हमेशा अच्छे संबंध रहे हैं। आज भी मैं जब उनसे बातचीत करता हूं, अच्छी, सच्ची-कड़वी सभी तरह की बात कर लेता हूं। अभी कुछ समय पहले जिलों में प्रवास के दौरान मैंने एक बात पूछी कि सरकार बनाने का श्रेय किसको? यह श्रेय भारतीय जनता पार्टी के सभी कार्यकर्ताओं को जाता है। समर्थकों, मतदाताओं, नेताओं सबको यह श्रेय जाता है। तब मैंने कहा यह सरकार किनकी? उनकी, इनकी या सबकी तो सबने एक स्वर में कहा कि सरकार सबकी। जब सरकार सबकी है तो सरकार सबके हित में सोचेगी। इसमें कार्यकर्ता भी आते हैं। सरकार के कामों का लाभ सबको मिले, यह हमारा उद्देश्य रहता है। यदि कोई समाज के लिए अपेक्षाएं रखता है तो यह ठीक है, लेकिन यदि कोई अपने लिए व्यक्तिगत अपेक्षा रखता है तो यह ठीक नहीं है। व्यक्ति से बड़ा दल, दल से बड़ा देश। इसलिए ऐसी बात हम भी करते हैं। हमारे ऊपर के लोग भी कहते हैं। इसका मतलब इसमें वास्तविकता है। हम इसी भावना को लेकर काम करते हैं। हमने जो योजनाएं बनार्इं वह सबके लिए बनार्इं। हमने कहा मैरिट पर नौकरियां मिलेंगी, तो मिल रही हैं मेरिट में, कार्यकर्ता भी आते हैं। पहले लोगों के मन में भय रहता था कि कहीं मेरिट वाला कार्यकर्ता भी नौकरी पाने से न रह जाए। यह भय हमने लोगों के मन से निकाला है। हमारा कार्यकर्ता हमारे इस कदम को सही बताता है।
हम हमेशा हरियाणा की दो तरह की छवि देखते हैं। पहले यह कि खेती-किसानी वाला हरियाणा है। दूसरी तरफ औद्योगिकीकरण वाला, बड़ी-बड़ी बहुमंजिली इमारतों वाला हरियाणा है। दोनों जगह दो चुनौतियां हैं। आपने अपने कार्यकाल के दौरान खेती-किसानी और पानी और बिजली के लिए क्या किया?
ये दो अलग-अलग बातें हैं। ऐसा नहीं है, हरियाणा में सब मिला-जुला है। वह सब ऐसे ही चल रहा है। खेती में हम देश में अलग स्थान रखते हैं। हम सर्वाधिक उत्पादन करने वाले प्रदेशों में से एक हैं और सारे देश में हम अपने यहां से अन्न, दालें आदि सप्लाई करते हैं। हमारे यहां आॅटोमोबाइल इंडस्ट्री है। पूरे देश की आॅटोमोबाइल इंडस्ट्री में 52 प्रतिशत का योगदान हरियाणा का है, अन्य भी कई बड़े उद्योग हैं। खासकर दिल्ली के नजदीक होने के कारण हमें बहुत लाभ होता है। हम हर क्षेत्र के लिए अलग-अलग योजनाएं बनाते हैं। जहां तक उद्योगों की बात है तो ‘ ईज आॅफ डूइंग बिजनेस’ इस विषय को लेकर काम शुरू किया कि ताकि लोगों को उद्योग लगाने के लिए ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं मिलें। उद्योगों के मामले में 2014 में हमारी 14वीं रैंक थी। हमने उसे सुधारा और 2016 में छठी रैंक पर आ गए और अब 2018 में हम तीसरे नंबर पर हैं। उत्तर भारत में तो हम पहले स्थान पर हैं। जहां तक खेती की बात है तो किसानों की जो कठिनाइयां हैं वह हमने समझीं, उनको ठीक पानी, खाद, बिजली आदि मिले। और उनको फसल के सही दाम मिलें। फसल बिक जाए। ये सारी चीजें हमने की हैं। कृषि के लिए हम 10 पैसे यूनिट, 15 पैसे यूनिट में बिजली देते हैं। लगभग मुफ्त है।
हमने किसानों के लिए 15,000 सोलर पंप लगाने की अनुमति दी है कि जो भी कोई सोलर पंप लगवाना चाहे वह लगवाए, हम उस पर सब्सिडी दे रहे हैं। कुछ ऐसे इलाके भी हैं जहां सारा पैसा हम ही खर्च कर रहे हैं। जितना पानी हमारे पास था, उस पानी का ठीक तरीके से बंटवारा करने के बाद हमने ऐसी जगहों पर पानी पहुंचाया। दक्षिणी हरियाणा का वह इलाका जहां पानी के लिए आंदोलन होते थे, वहां तक भी पानी पहुंच गया है। जहां तक किसानों को मुआवजा देने की बात है तो पूरे देश में हमारे द्वारा दिए जाना वाला मुआवजा सबसे ज्यादा है। गन्ने का रेट देश में सर्वाधिक है। किसानों को लेकर हमारे यहां उतनी समस्याएं नहीं हैं जितनी दूसरे प्रदेशों में हैं।