हिंदुओं को भी मिले अल्पसंख्यक होने का लाभ
   दिनांक 12-फ़रवरी-2019
                - सुमन कुमार                            
देश के आठ राज्य ऐसे हैं जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं लेकिन 1992 में जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे तब राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कानून बनाया गया था। इसके कारण आज तक इन राज्यों के हिंदुओं को अल्पसंख्यक होने के बाद भी उनका अधिकार नहीं मिल रहा है
क्या इस देश में हिंदुओं के कल्याण से जुड़ा कोई विषय कभी चुनावी मुद्दा बनेगा? देश के आठ राज्यों में हिंदू अल्प़संख्यक हो चुके हैं मगर उन राज्यों में अल्पसंख्यकों को मिलने वाले सरकारी लाभ आज भी हिंदुओं को नहीं दिए जाते बल्कि उन राज्यों के बहुसंख्यक समुदाय को दिए जाते हैं।
आखिर ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वर्ष 1992 में नरसिम्हा राव सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कानून बनाया था जिसमें सिर्फ उन मत—पंथों के लोगों को ही अल्पसंख्यक चुनने की बात कही गई जिनकी आबादी देश की कुल जनसंख्या में हिंदुओं के मुकाबले कम थी। कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में बनाए गए इस कानून में परोक्ष रूप से हिंदुओं को देश का बहुसंख्यक वर्ग घोष‍ित कर किसी भी तरह के सरकारी लाभ से सीधे-सीधे वंचित कर दिया गया जबकि देश के आठ राज्यों में हिंदू तब भी अल्पसंख्यक थे।
इस कानून की धारा 2 (सी) के तहत केंद्र सरकार को ये असीमित अधिकार है कि वो हिंदुओं को छोड़कर किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक घोष‍ित कर दे। इसी अधिकार का फायदा उठाते हुए तब की नरसिम्हा‍ राव सरकार ने साल 1993 में गजट अधिसूचना जारी कर सिर्फ मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, पारसी और सिखों की आबादी को अल्पसंख्यक का दर्जा दे दिया। यानी देश में अल्पसंख्यकों को मिलने वाले सारे लाभ पर सिर्फ इन्हीं पांच मत—पंथों को मिलेंगे।
अब जरा आंकड़ों से समझें कि क्या यह सभी सही मायने में अल्पसंख्यक हैं। सबसे पहले मुस्लिम आबादी की बात करते हैं। देश के दो राज्यों जम्मू-कश्मीर और लक्षद्वीप में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं। जम्मू-कश्मीर में मुस्लिम आबादी 68.31 प्रतिशत जबकि हिंदुओं की आबादी 28.44 प्रतिशत है। लक्षद्वीप में हिंदू महज 2.77 प्रतिशत जबकि मुसलमान 96.58 प्रतिशत हैं। देश की कुल आबादी में मुस्लिम 17 करोड़ 22 लाख हैं फि‍र भी उन्हें अल्पसंख्यक घोष‍ित किया हुआ है।
इसी प्रकार देश में उत्तर पूर्व के चार राज्यों, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और मणिपुर में ईसाई बहुसंख्यक हैं इसके बावजूद अल्पसंख्यकों को मिलने वाले लाभ पर कब्जा जमाए बैठे हैं। अरुणाचल प्रदेश में भी ईसाईयों की संख्या हिंदुओं से अधिक है और वो वहां की सबसे बड़ी आबादी है। मेघालय में हिंदू 11.53 प्रतिशत, मिजोरम में मात्र 2.75 प्रतिशत, नगालैंड में 8.75 प्रतिशत और मणिपुर में 41.39 प्रतिशत हैं।
सवाल है कि आखिर इन आठ राज्यों में सही मायने में जो अल्पसंख्यक हैं उन्हें उनका हक क्यों नहीं मिल रहा है? भारतीय जनता पार्टी के नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय दो बार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर चुके हैं और दोनों बार सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का दरवाजा खटखटाने की सलाह दी है।
करीब दो साल पहले भी 2017 में जब वह इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे तब भी उन्हें अल्पसंख्यक आयोग को ज्ञापन देने को कहा गया था। उपाध्याय ने ऐसा ही किया लेकिन लेकिन इस विषय पर आगे कुछ नहीं हुआ। अब एक बार फ‍िर उपाध्याय सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। इस बार सुप्रीम कोर्ट ने आयोग के लिए समय सीमा जरूर तय कर दी है कि वो 90 दिनों के अंदर उपाध्याय के ज्ञापन पर फैसला लें। देखना यह है कि क्या इस बार इन राज्यों के हिंदुओं को उनका अधिकार मिलेगा।