नक्सलियों से कांग्रेस का पुराना नाता !
   दिनांक 13-फ़रवरी-2019

सोमवार को केन्द्रीय मंत्री अरुण जेटली का एक ट्वीट काफी चर्चा में रहा. अमेरिका से स्वास्थ्य लाभ लेकर वापस आए जेटली ने लिखा- ‘छत्तीसगढ़ चुनाव में कांग्रेस ने माओवादियों के साथ गठबंधन किया.’ जेटली एक जिम्मेदार नेता और प्रख्यात वकील भी हैं. ज़ाहिर है ऐसा आरोप उन्होंने कोई पुख्ता इनपुट के आधार पर ही लगाया होगा.ऐसे में जेटली का पोस्ट वास्तव में कांग्रेस-नक्सल गठजोड़ के एक और साक्ष्य के तौर पर ही देखा जाना चाहिए. इस ट्वीट का जवाब देते हुए छग के सीएम भूपेश बघेल ने ट्वीट किया कि उनका गठजोड़ किसानों-आदिवासियों आदि से है. ट्वीट में व्यक्त भाषा यहां दुहराने का खैर कोई मतलब नहीं है, लेकिन इतना तो कहना ही होगा कि नक्सलवाद का बहाना भी आदिवासी, किसान आदि ही होते हैं. तो छग के सिस्टम में घुसे कथित नक्सल रहनुमा लोगों पर संदेह होना लाजिमी ही है.
जेटली के ट्वीट पर भरोसा करने के अनेक कारणों में सबसे बड़ा कारण नक्सली-आतंकी इतिहास है जिसके आधार पर आप निष्कर्ष निकाल सकते हैं. कुछ तथ्यों पर गौर कीजिये. आप पाएंगे कि नक्सलवाद को जन्म देने और उसके बाद उसे पालने पोसने में कांग्रेस की भूमिका हमेशा रही है। पश्चिम बंगाल के जिस नक्सलवाड़ी से इसकी शुरुआत हुई, वहां उस समय कांग्रेस की ही सत्ता थी. जिस अविभाजित मध्य प्रदेश के बस्तर-सरगुजा आदि में नक्सलियों ने पांव फैलाए, वहां भी कांग्रेस ही सत्तासीन थी. जिस छत्तीसगढ़ में बाद में उसे आश्रय मिला तब नए छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस के अजीत जोगी की सरकार थी, यहां तक की आश्रय की तलाश में जब वे कोंडापल्ली सीतारमैया के नेतृत्व में बस्तर में घुसे तब भी आंध्र में भी कांग्रेस की ही सरकार तो थी. और तो और... बस्तर में विकास नहीं होने, आदिवासियों के शोषण और उनके पिछड़ेपन को बहाना बनाकर जब नक्सली छत्तीसगढ़ में आये, तो उन्हें पिछड़ेपन का ‘बहाना’ भी तो कांग्रेस ने ही उपलब्ध कराया न? कौन नहीं जानता कि केंद्र में विभिन्न कांगेसी सरकारों, मध्य प्रदेश की भी इसी दल की सरकारों ने हमेशा उपनिवेश जैसा बना कर रखा था तब के इस आदिवासी अंचल को, छग के संसाधनों को लूट कर भोपाल और दिल्ली में कांग्रेसियों के बंगले सजते रहे और बस्तर और ज्यादा वंचित होता गया.
 
यही परिस्थितयां थीं जिसके कारण भाजपा ने अलग प्रदेश बना कर इसे कांग्रेसी चंगुल से मुक्त करने की कोशिश की, बाद में अवसर मिलने पर न केवल पंद्रह वर्ष तक समूचे बस्तर का उल्लेखनीय विकास किया बल्कि सरगुजा संभाग से नक्सलियों का समूल विनष्ट भी संभव हुआ. आप आज बस्तर चले जायें, तो अनेक मामलों में वह आदिवासी अंचल आपको बड़े-बड़े नगरों से ज्यादा विकसित और मज़बूत नज़र आयेगा. यहां ख़ास तौर पर यह उल्लेखनीय है कि आज इस कथित गठजोड़ के कारण चुनाव जीत कर आये सीएम न केवल अजीत जोगी कार्यकाल की कारगुजारियों के तब जोगी कैबिनेट के मंत्री होने के कारण बराबर के जिम्मेदार थे बल्कि मध्य प्रदेश के ज़माने में भी इन नेताओं की भूमिका वही रही जैसे फिरंगी सल्तनत में जमींदारों-एजेंटों की भूमिका होती थी.
कुछ और उदाहरण देखें. कांग्रेस आज नक्सलवाद से अपने संबंध का विरोध करते हुए अक्सर झीरम हमले का उदाहरण देती है. यह सच है कि उस दर्दनाक और क्रूर हमले में कांग्रेस के दर्ज़न भर नेता समेत काफी लोग मारे गए थे . हालांकि उसी हमले में अनेक कांग्रेस नेताओं की भूमिका भी संदिग्ध पायी गई थी जिनमें से एक तो अभी प्रदेश के कैबिनेट में मंत्री हैं, तो कुछ और ने हाल में ही में कांग्रेस छोड़ा है. आपको जान कर आश्चर्य होगा कि कुछ माह पहले इस घटना के बारे में पूछने पर बिलासपुर में संपादकों के साथ बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने साफ़ तौर पर कहा था कि – ‘वे दावे से कह सकते हैं कि नन्द कुमार पटेल को माओवादियों ने नहीं मारा. हमारे मौजूदा लीडरशिप को भी यह पता है.’ जिस नृशंस घटना की जांच के लिए राहुल गांधी की ही मनमोहन सरकार ने एनआईए जांच का आदेश दिया था, उस मामले में कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा बिना जांच पूरी हुए ही माओवादियों को क्लीन चिट देना क्या माओवादी गठजोड़ का उदाहरण नहीं माना जाय?
 
राहुल द्वारा यह कहना कि ‘हमारे मौजूदा लीडरशिप को भी यह पता है’ पर खुद वर्तमान सीएम भूपेश बघेल ने बार-बार यह कहते हुए मुहर लगाई कि- झीरम के सबूत उनकी जेब में है. सवाल यह है कि ऐसे देशद्रोही हमले का सबूत जेब में रख कर घूमना और उसे घटना के इतने दिनों बाद भी जांच एजेंसी को नहीं सौंपना जुर्म नहीं है? साक्ष्य छिपाने के अपराध में इस हमले का सह-आरोपी नहीं बनाया जाना चाहिए भूपेश बघेल को ? सबूत नहीं सौंपना क्या माओवादियों से गठजोड़ का उदाहरण नहीं है ? इससे भी आगे जब आप झीरम के बारे में सोचेंगे तो यह पायेंगे कि अगर कांग्रेस के वे प्रातः स्मरणीय नेता लोग होते अभी तो भूपेश कभी अगली पंक्ति में नहीं आ पाते. जिस बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा जी की क्रूरतम हत्या के लिए इस घटना को अंजाम दिया बताया जाता है, उन्हें कांग्रेस में रहते हुए भी जितना आज के कांग्रेसियों ने अपमानित किया, उसकी याद कर हर व्यक्ति शर्मिन्दा हो सकता है. वरिष्ठ कांग्रेस नेता कर्मा जी को विपक्ष का नेता हुए कांग्रेसियों द्वारा ही ‘भाजपा सरकार का तेरहवां मंत्री’ कहा जाता था, ऐसा इसलिए क्योंकि वे नक्सलियों के खिलाफ समूची ताकत से जान की बाज़ी लगाकर कारवाई में जुटे थे. उनके द्वारा शुरू किये गए चर्चित आन्दोलन ‘सलवा जुडूम’ के कारण उन्हें कांग्रेसियों द्वारा नक्सलियों से भी ज्यादा लांछित किया जाता था. कांग्रेस के नक्सल गठजोड़ का इससे बड़ा संकेत आप और क्या पायेंगे कि जिस नक्सली विनायक सेन को राजद्रोह के अपराध में उम्र कैद की सज़ा मिली है, उसे कांग्रेस की सोनिया-मनमोहन सरकार में योजना आयोग की कमिटी का सदस्य बनाया गया, क्या ‘गठजोड़’ का इससे भी बड़ा कोई उदाहरण चाहिए? और तो और सोनिया नीत एनएसी तक में संदिग्ध लोगों को जगह मिली थी.

 
और तथ्य देखिये. हाल में भीमा-कोरेगांव में शहरी नक्सली गिरोह का उद्भेदन हुआ. सुप्रीम कोर्ट तक ने उस कारवाई को जायज़ ठहराया लेकिन, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर भीमा-कोरेगांव मामले में अर्बन नक्सलियों को जी-जान से समर्थन दिया था. और उन आरोपियों को पकड़ने के लिए शासन की भर्त्सना की थी. इसी भीमा-कोरेगांव हिंसा के संबंध में एक पत्र के सामने आया था जिसमें अर्बन नक्सलियों की मदद के लिए कांग्रेस पार्टी के जिक्र के साथ एक मोबाइल नंबर लिखा था, यह फोन नंबर कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का था. भारत तोड़ने की साजिश करने वालों के साथ सांठगांठ, इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है भला? सवाल यही है कि एक परिवार को सत्ता दिलाने के लिए मातृभूमि से धोखा देश बर्दाश्त नहीं करेगा.?
आन्ध्र में पीपुल्स वार ग्रुप का कांग्रेस के साथ कथित समझौता. झारखण्ड में कई दुर्दांत नक्सली कांग्रेस समर्थित झामुमो से सांसद/विधायक बने. जेएनयू में जा कर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ गिरोह को राहुल गांधी द्वारा समर्थन देने पहुंच जाना.... आखिर कितने उदाहरण गिनाये जायें इस नक्सल/आतंकी गठजोड़ के भला? जिस बिहार में माओवादियों द्वारा जातीय आधार पर गांव का गांव साफ़ कर दिया जाता था, उस समय कथित ‘समाजिक न्याय’ को शह देते लालू यादव के साथ कांग्रेस के सतत समर्थन और गठजोड़ को भी आप मद्देनज़र रखना चाहेंगे या नहीं? कुछ वर्ष पहले कांग्रेस महासचिव महासचिव दिग्विजय सिंह ने ही झारखंड में स्पष्ट तौर पर कांग्रेस मुख्यालय में प्रेस वार्ता कर नक्सलियों से ये अपील की थी कि वे कांग्रेस का समर्थन कर भाजपा को हराने में अपनी भूमिका निभाये. झीरम हमले के समय भी दिग्विजय ने नक्सलियों को आतंकवादी के बदले भ्रमित विचारक कहा था. वाम उग्रवादियों के मुद्दे को वास्तविक और प्रासंगिक कहा था. यहां तक कि उन्हें जनता का प्रतिनिधि ही कहा था. एक तरफ जहां खुद कांग्रेस इस समस्या को आंतरिक सुरक्षा पर सबसे बड़ा ख़तरा मानती है वहीं उसी के एक गुट इसे सोशियो-इक्नोमिकल समस्या मानते हैं. कांग्रेस की इन ‘ढुलमुल’ नीतियों को गठजोड़ नहीं तो क्या कहेंगे आप?

 
झीरम में हुआ नक्सल हमला वास्तव में भारत के इतिहास में एक सबसे ज्यादा नृशंस नरसंहार के रूप में जाना जाएगा. यह सच है कि उस हमले में कांग्रेस की एक पुरी पीढ़ी ख़त्म हो गयी थी. आप यह कह सकते हैं कि छग में कांग्रेस ही खत्म हो गयी थी. अब की कांग्रेस तो बस उतनी ही कांग्रेस बची है जितना दिल्ली में कथित ‘गांधी’ असली गांधी बचे हैं. तथ्य यह भी है कि अभी तक नक्सल हमलों में भाजपा के भी सैकड़ों कार्यकर्ताओं की हत्या लगातार हुई है, सो यह सवाल भाजपा-कांग्रेस का है ही नहीं. फिर भी कांग्रेस को यह समझना होगा कि बात चाहे भिंडरावाले को पहले समर्थन देने और बाद में श्रीमती इंदिरा गांधी का उन्हीं आतंकियों का शिकार होने की हो या फिर राजीव जी की नृशंस हत्या के जिम्मेदार प्रभाकरण को पहले राजीव द्वारा ही समर्थन देने की हो, या फिर झीरम का नक्सल हमला .... हर बार यह साबित हुआ है कि आतंकियों से किसी भी तरह की सहानुभूति, उनका समर्थन, उनसे गठजोड़ अंततः आत्घाती ही होता है. हर आतंकी अपने आपमें भस्मासुर होता है जिसे ताकत मिलने पर अपने ही रहनुमाओं को निपटाना होता है. लेकिन सत्ता के लोभ में अगर आप ऐसे तत्वों को प्रश्रय देंगे तो अंततः वह विनष्ट पहले आपको ही करेगा. चुनावों में हार-जीत लगा रहता है लेकिन, यह सबक सीख लेना कांग्रेस के लिए ज्यादा ज़रूरी है. अरुण जेटली के ट्वीट को एक चेतावनी के बतौर ही लेना चाहिए कांग्रेस को जबकि उलटे वह इस पर आगबबूला हो रही है. नीरज की पंक्तियां ख़ास कर कांग्रेस के लिए ही है – आग लेकर हाथ में पगले जलाता है किसे, जब न ये बस्ती रहेगी तू कहां रह पायेगा. इक सिसकते आसूंओं का कारवां रह जाएगा.