गांधी बहाना, राजनीतिक निशाना
   दिनांक 13-फ़रवरी-2019

गत 30 जनवरी को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से एक खबर आई। यह छोटी-सी खबर तेजी से सुलगी और राजनीतिक तंदूर की आग तेज हो गई। खबर किसी भगवावस्त्रधारी नेत्री द्वारा गांधी जी के पुतले को गोली मारने की थी। इस हरकत में शामिल लोग गांधी जी के बारे में क्या और कितना जानते हैं, कहना कठिन है। वे अपनी संस्कृति के कितने जानकार और संस्कारों पर कितने दृढ़ हैं, यह भी पता लगाने वाली बात है। गांधी जी अथवा किसी के भी कार्य और जीवन का मूल्यांकन, विवेचना और विमर्श का विषय तो हो सकता है किन्तु किसी मृत व्यक्ति का पुतला बनाकर उसे गोली मारना ...यह क्या है! निश्चित ही यह ऐसा काम है जिसे कदापि हिन्दू या भारतीय कृत्य नहीं कहा जा सकता। यह हमारी संस्कृति नहीं है। खुद को ‘हिन्दू’ कहते हुए यह काम करने वालों को यकीनन अपनी संस्कृति का, अपने महापुरुषों द्वारा स्थापित आचरण के श्रेष्ठ सिद्धांतों का स्मरण नहीं रहा।
धर्मशास्त्रों में कहा गया है-मरणांतानि वैरानि, अर्थात् मृत्यु के साथ हर वैर भाव का अंत। वैर और घृणा को मृत्यु के बाद तक ढोने और इस घृणा के प्रदर्शन को इस देश में कौन सही ठहराएगा! जिस देश में शिवाजी ने मृत्यु के बाद वैर भुला अफजल खां तक की कब्र बनवाई, जिस संस्कृति में जीवन मर्यादा के श्रेष्ठतम उदाहरण, प्रभु श्रीराम ने अपने सबसे बड़े शत्रु ‘रावण’ तक का मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार किया, उस देश में एक दिवंगत महापुरुष का पुतला बनाकर गोली चलाना! यह सर्वथा भर्त्सना योग्य है।
सवाल उठता है कि यह कौन-सा आवेश है जो कुछ लोगों को खास वेशभूषा में, हिन्दू ‘लेबल’ लगाकर अहिन्दू कृत्य करने को मजबूर कर रहा है! निश्चित ही हमारी परंपरा, मान्यता, इस संस्कृति के उदाहरण और हिन्दू धर्म जिसकी आज्ञा नहीं देते, उसकी प्रेरणा इन सबसे अलग कहीं और छिपी है। क्या यह ऐसी राजनीतिक खुराफात है जिस पर ‘भगवा’ लेबल चिपकाने का काम किया गया? संभवत: हां! इस घटना का समय भी ऐसा है कि इसके पीछे राजनीतिक उपद्रव पैदा करने की मंशा को नकारा नहीं जा सकता। महानगरों से दूर इस छोटी-सी घटना के बाद संबंधित ‘हिन्दू’ बैनर हाशिए पर था। किन्तु ‘राई’ को पहाड़ जैसा दिखाने के लिए ‘जनेऊधारी सेकुलर’ कांग्रेस पूरी तेजी से लपकी। इसके बाद जो बयान जारी हुए, जो विरोध प्रदर्शन हुए, उन्हें पूरी तरह भारतीय जनता पार्टी या संघ परिवार के प्रति आक्रोश जगाने-बढ़ाने के लिए प्रयुक्त किया गया। किसी अनाम या अल्पज्ञात-से हिन्दू संगठन की किसी उकसाऊ, निंदनीय कारगुजारी को इस पूरे समाज, इस समाज के सबसे बड़े और सकारात्मक संगठन, इस देश के राजनीतिक नेतृत्व, सबके खिलाफ एक झटके में इस्तेमाल करने का यह सफल राजनीतिक पैंतरा है। कांग्रेस के लिए यह पैंतरा नया नहीं है। उसने पीढ़ियों से इसे आजमाया है और हिन्दू समाज को लांछित कर, समाज को बांटकर, लड़ाकर और तो और, जनसंहार कराते हुए भी वह सत्ता पर काबिज रही है। संदर्भों की धूल झाड़कर स्मरण करें—गांधी हत्याकांड के बाद क्या हुआ था? महाराष्ट्र में चितपावन ब्राह्मणों की कांग्रेसी गुण्डों द्वारा खुलेआम निर्मम हत्या... इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में भी कांग्रेस नेता-कार्यकर्ता इसी तरह सिख नरसंहार में लिप्त पाए गए !
 
गांधी हत्याकांड के बाद के घटनाक्रम का राजनीतिक विश्लेषण और तथ्यों की खंगाल तो और भी महत्वपूर्ण है।
“मनोहर मुलगावकर की पुस्तक ‘द मैन हू किल्ड गांधी’ में एल.बी. भोपतकर के मुताबिक तत्कालीन विधि मंत्री डॉ. भीमराव आंबेडकर ने उन्हें स्वयं कहा था कि सबूत न होने के बावजूद नेहरू किसी भी कीमत पर सावरकर को इस हत्याकांड से जोड़ना चाहते थे।”
 
नहीं भूलना चाहिए कि अपने उस समय सीमित राजनीतिक हस्तक्षेप के बावजूद प्रखर सांस्कृतिक विचारक सावरकर जहां नेहरू को खल रहे थे वहीं सांस्कृतिक चेतना जगाने में जुटा तेजी से बढ़ता संघ उन्हें रास नहीं आ रहा था। यदि ऐसा न होता तो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस प्रकरण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को हर आरोप से परे ठहराए जाने पर भी प्रतिबंध क्यों लदा रहता ! यकीनन नेहरू की मंशा थी कि बेदाग लोगों पर भी गांधी जी की हत्या का ठप्पा लगा रहे और अंग्रेजी तर्ज पर उनकी ‘बांटो और राज करो’ की राजनीति चलती रहे। किसी भावनात्मक मुद्दे की आड़ में समाज को बांटने, काटने और राष्ट्रीय एकता के भाव का कत्ल करने वाली यह राजनीति ऐसी रही कि कुछ बरस पहले, अदालत में घसीटे जाने से पहले तक, कांग्रेसी युवराज राहुल संघ को गांधी हत्या के लिए कसूरवार ठहराने की धूर्तता करते रहे। बहरहाल, चुनावी राजनीति के इस दौर में भगवा की आड़ लेकर किए जाने वाले ऐसे ओछे हथकंडों से सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि एक का अज्ञान अथवा कौतुक पूरे समाज के लिए बड़ी परेशानी खड़ी कर सकता है।