जयंती विशेष: महाराजा सूरजमल जिनके नाम से ही कांपते थे मुगल
   दिनांक 13-फ़रवरी-2019
आज जाट राजा महाराज सूरजमल की जयंती है। वह कभी मुगलों के सामने नहीं झुके। सूरजमल का मुगलों में इतना खौफ था कि उनके नाम से ही उनकी नींद उड़ जाया करती थी। उनके नाम का मुगलों में कितना डर था तब एक कहावत प्रचलित हुई थी-
'तीर चले तलवार चले, चाहे इशारे से, अल्लाह अबकी बार बचाए जाट भरतपुर वारे से'

सूरजमल त्याग, बलिदान, वीरता कि साक्षात् मूर्ति थेू। मुगलों से दिल्ली जीतने वाले एक मात्र हिन्दू राजा थे। उनके खौफ के कारण ही मुगल बादशाहों ने अपने राज्य में हिंदुओं की आस्था का केंद्र बने पीपल के पेड़ को काटने और गाय काटने पर प्रतिबन्ध लगाया था।
सूरजमल का जन्म
सूरजमल का जन्म तब हुआ था, जब हिन्दुस्थान मुगल बादशाह औरंगज़ेब के अत्याचारों से पीड़ित था। तब सनातन धर्म के मानने वाले लोगों की नित हत्या हो रही थी, जबरन हिंदुओं की लड़कियों को उठा लिया जाता था। तब भरतपुर में 13 फरवरी 1707 को महाराजा सूरजमल का जन्म हुआ था। उनका बचपन में नाम सुजान सिंह था, जो बाद में अपने तेज और रोबीले व्यक्तित्व के कारण महाराजा सूरजमल नाम से प्रसिद्ध हुए।
उनके जन्म के संबंध में लोक गायन और सामान्य जन मानस में एक लोकगीत प्रचलित है-
'आखा' गढ़ गोमुखी बाजी, मां भई देख मुख राजी।
धन्य धन्य गंगिया माजी, जिन जायो सूरज मल गाजी।
भइयन को राख्यो राजी, चाकी चहुं दिस नौबत बाजी।
सूरजमल का साम्राज्य
हिंदू महाराजा सूरजमल की रियासत का नक़्शा राजस्थान सरकार के सूचना एवं जन संपर्क विभाग द्वारा प्रकाशित की जाने वाली बुक सूजस के पेज नंबर 1160 के अनुसार, आगरा, अलीगढ़, मथुरा, हाथरस, मेरठ, बागपत, एटा, बुलंदशहर, फ़िरोज़ाबाद, फर्रुखाबाद, हापुड़ जिले हरियाणा के पलवल, मेवात, फरीदाबाद, महेंद्रगढ़, गुड़गांव, रोहतक, रेवाड़ी, झज्जर राजस्थान के भरतपुर, अलवर, करौली जिले का हिंडौन, दौसा जिले का महुवा क्षेत्र आता था।
महाराजा सूरजमल ने अपने जीवन में कई युद्ध लड़े और सभी जीते। युद्ध के दौरान हजारों दुश्मनों को नरक का रास्ता सूरजमल की तलवार ने दिखाया। चन्दौस का युद्ध 1746, बगरू का युद्ध 20 अगस्त 1748, मेवात का युद्ध 1 जनवरी 1750, घासेड़ा का युद्ध 1753 में हुआ, दिल्ली विजय 10 मई 1753 समेत ऐसे कई युद्ध हैं, जो सूरजमल के पराक्रम को दर्शाते हैं।
महाराजा सूरजमल को युद्ध में दोनों हाथो में तलवार से लड़ते देख राजपूत रानियों ने उनका परिचय पूछा, तब सूर्यमल्ल मिश्रण ने जवाब दिया यह वीर लोहागढ़ का जाट वीर है। इस पर राजपुतानियों ने कहा कि.
"नहीं जाटनी ने सही व्यर्थ प्रसव की पीर
जन्मा उसके गर्भ से सूरजमल सा वीर"
 
 
जब हराया था सलामत खान को
सूरजमल ने दिल्ली के मुस्लिम शासक बख्शी सलामत खान को मेवात के युद्ध, 1 जनवरी 1750 में हरा दिया। सलामत उस वक्त मेवात में हिंदुओं को जबरन इस्लाम स्वीकार करा रहा था। हारे हुए सलामत से सूरजमल शर्तें रखीं, जिनको मजबूर होकर मीरबख्शी ने स्वीकार कर लिया -
(1) मीरबख्शी की रियासत में कोई भी व्यक्ति उनके प्रदेश में पीपल का वृक्ष नहीं काटेगा, न ही गाय को काटा जाएगा।
(2) क्षेत्र के किसी भी मन्दिर का अपमान नहीं किया जायेगा, न हिन्दुओं की उपासना के सम्बन्ध में किसी तरह की कभी आपत्ति की जायेगी।
एक बार अहमद शाह नाम के मुगल ने हिन्दुओ को काटते हुए मथुरा की और आगे बढ़ रहा था, तब उसको सूरजमल ने बल्लबगढ़ और मथुरा के चोमुहा में चुनौती दी। जहां पर उसको धूल चटा दी। अहमदशाह अब्दाली के साथ युद्ध में महाराजा सूरजमल के 5000 सैनिक शहीद हुए, लेकिन सूरजमल जीते और अब्दाली से हज़ारों ब्राह्मण और लड़कियों को मुक्त करवाया गया। इसका वर्णन प्रो. गेंडासिंह राजपूत ने अपनी किताब अहमद शाह अब्दाली में किया है।
महाराजा सूरजमल के नेतृत्व में ही 9 मई से 4 जून 1753 के बीच जाटों ने मुगलों के कब्जे वाली पुरानी दिल्ली को खूब लूटा। जिसका कारण वज़ीर सफरजंग द्वारा हिन्दुओं की लड़कियों को उठा लेना जाना था। 'तारीख-ए-अहमदशाही' के लेखक के अनुसार, जाटों ने दिल्ली के दरवाजों तक लूटपाट की, लाखों-लाख लूटे गये, मकान गिरा दिये गये और सब उपनगरों (पुरों) में, चुरनिया और वकीलपुरा में तो कोई दिया ही नहीं दिखता था। सूरजमल दिल्ली के बादशाह के यहां से लाखों रुपये की सम्पत्ति के साथ एक संगमरमर का झूला भी लाए थे, जो डीग के मुख्य महल 'गोपाल भवन' के सामने आज भी रखा हुआ है।
पानीपत के तीसरे युद्ध 14 जनवरी 1761 में जब मराठे युद्ध हार गए थे, तब अहमदशाह अब्दाली के डर से देश के किसी राजा ने उनकी मदद नहीं की। ऐसे समय में घायल मराठों को अपने दुर्ग में महाराजा सूरजमल ने शरण दिया था। महाराष्ट्र के पेशवा बाजीराव का पुत्र शमशेर बहादुर घायल अवस्था में डीग पहुंचा। सूरजमल ने उसका उपचार करवाया, किन्तु वह बच नहीं सका। जाट राजा ने बयाना में उसकी समाधि बनवाई।
 
युद्ध में ही मिली वीरगति
हर महान योद्धा की तरह भरतपुर के महाराजा सूरजमल को भी युद्धभामि में ही वीरगति का सुख प्राप्त हुआ। 25 दिसम्बर सन 1763 को नजीबुद्दौला के साथ हिंडन नदी के तट पर हुए युद्ध में अपने ही लोगों के धोखे के कारण सूरजमल वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी वीरता, साहस और पराक्रम का वर्णन सूदन कवि ने 'सुजान चरित्र' नामक रचना में किया है।