मुलायम का धोबीपाट किस पर पड़ेगा भारी
   दिनांक 14-फ़रवरी-2019
समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव शुरूआती दौर में पहलवान रहे हैं। भारतीय कुश्ती परंपरा को जो जानते हैं, उन्हें पता है कि मंजा हुए पहलवान के जब सारे दांव निष्प्रभावी हो जाते हैं
तो आखिर में वह मौका देखकर धोबी पछाड़ दांव आजमाता है और अक्सर उसका यह दांव सफल रहता है। मौजूदा लोकसभा के आखिरी दिन समाजवादी पहलवान मुलायम सिंह ने जो दांव मारा, सियासत के अखाड़े में उसे धोबीपाट कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बनें, यह उम्मीद जताकर उन्होंने जहां विपक्षी गठबंधन के मैदान में उतरने से पहले ही हवा निकालने की कोशिश की है, वहीं भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदों को नए पंख लगा दिए हैं। 
मुलायम के आलोचक और महागठबंधन के हिमायत उनकी शिकायत करते नहीं थक रहे। कुछ तो यहां तक कह रहे हैं कि समाजवादी पार्टी में उनकी नहीं चल रही, इसलिए उनके इस बयान का कोई मतलब नहीं है। लेकिन जिनकी मुलायम के राजनीतिक सफर पर निगाह रही है, उन्हें पता है कि मुलायम सिंह यादव राजनीतिक हवा का रूख भांपने में गलती नहीं करते। इसलिए उनका सियासी सफर उस हवा के समानांतर ही चलता रहा है। उन्हें लग गया है कि राफेल सौदे में भ्रष्टाचार दिखाने की कांग्रेसी कोशिशें परवान नहीं चढ़ पा रही हैं। देश की जनता यह स्वीकार नहीं कर सकती कि नरेंद्र मोदी पर बेईमान का आरोप लगाए। जनता को मोदी सरकार में विश्वास है।
जाहिर है कि इसका असर चुनावी नतीजों पर पड़े बिना नहीं रहेगा। याद कीजिए 2014 के आम चुनावों को, तब बेशक नरेंद्र मोदी की लहर चल रही थी, लेकिन गैरभाजपा दल यह मानने को तैयार नहीं थे। मोदी की लहर चली और जमकर चली। बेशक तब महागठबंधन की बात नहीं हुई थी, लेकिन यह भी हकीकत है कि अपने-अपने प्रभाव वाले इलाकों में गैर भाजपा दलों ने मोदी से मोर्चा स्थानीय और रणनीतिक गठबंधन करके ही संभाला था।
2014 और 2019 के चुनावों में एक अंतर जरूर है। अंतर उत्तर प्रदेश की धरती पर आया है। जहां एक-दूसरे के धुर विरोधी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजपार्टी साथ आ गए हैं। इस गठबंधन बनने के ठीक पहले कांग्रेस ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया। इसकी वजह से मोदी विरोधी खेमे को लगने लगा है कि वे 2019 के चुनावी अखाड़े में वे मोदी को पछाड़ देंगे।
 
ऐसे माहौल में मुलायम का मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनने की शुभकामना व्यक्त करना एक संदेश भी है। यह संदेश उन समाजवादियों के लिए है, जो अब भी मुलायम सिंह यादव में आस्था व्यक्त करते हैं। 2017 के विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन हुआ था तो उसे मुलायम स्वीकार नहीं कर पाए थे। गैरकांग्रेसवाद के सिद्धांतों के बीच पले-बढ़े मुलायम के लिए वह गठबंधन स्वीकार्य नहीं था। तब भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि यह गलत हुआ है। इसका असर हुआ। बहुमत की सरकार चला रही समाजवादी पार्टी 48 सीटों पर सिमट गई और कांग्रेस के सिर्फ सात विधायक ही विधानसभा का मुंह देख पाए थे। यह स्थिति तब थी, जब मुलायम के एक दौर में नैसर्गिक उत्तराधिकारी समझे जा रहे उनके भाई शिवपाल यादव साथ थे। अब शिवपाल अलग हैं और उन्होंने अपनी अलग पार्टी बना ली है। मुलायम सिंह के सिपहसालार रहे अमर सिंह भी अलग हो चुके हैं और भाजपा का कमल खिलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
2017 की तरह मुलायम सिंह को समाजवादी-बुहजन गठबंधन भी पसंद नहीं आया है। इसलिए उन्होंने अपना यह दर्द ऐसे मौके पर जाहिर किया, जो बहुत महत्वपूर्ण है। संसद के आखिरी दिन उन्होंने अपना दर्द भी जाहिर कर दिया और अपने समर्थकों को प्रकारांतर से संदेश भी दे दिया। जाहिर है कि उनके अब भी खासे समर्थक समाजवादी पार्टी में हैं। इनमें से कई प्रतिबद्ध और पुराने समाजवादी हैं। जाहिर है कि मुलायम के बयान के बाद वे समाजवादी-बहुजन गठबंधन को समर्थन देने से हिचकेंगे। वैसे भी समाजवादी पार्टी के बारे में माना जाता है कि उसके समर्थक बहुजन समाजपार्टी के उम्मीदवारों को वोट नहीं देते। मुलायम के संसद में दिए बयान के बाद ऐसा होने की उम्मीद बढ़ गई है। इसलिए जिस उत्तर प्रदेश की भूमि पर भाजपा को कमजोर करने की कोशिश समाजवादी-बहुजन गठबंधन और कांग्रेस देने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें विपक्षी समर्थन का एक आधार छिजेगा। मुलायम के इस बयान से माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश का मुस्लिम मतदाता भ्रमित होगा। इसका असर यह होगा कि वह कांग्रेस की तरफ भी जाएगा। इससे वोटों का बंटवारा होगा, जाहिर है कि इसका फायदा भारतीय जनता पार्टी को ही मिल सकता है।