पुलवामा हमला: अब ठोस प्रहार का वक्त है
   दिनांक 15-फ़रवरी-2019
                                                                                                                                                   -सुमन कुमार
एक बार फ‍िर हमारी धरती वीरों के रक्त से रंजित कर दी गई है। कायराना तरीके से पीठ पर हमलाकर पाकिस्तान परस्त आतंकवादियों ने भारत माता के सपूतों की जान ले ली। जिन 40 वीरों ने शहादत दी है उनके साथ-साथ पूरे देश के हर घर में शोक पसरा है। इस शोक के नीचे स्वाभाविक रूप से गुस्सा भी है और यह गुस्सा बदला मांग रहा है। हम जिस दुश्मन से मुकाबला कर रहे हैं वो प्यार की भाषा नहीं समझता। उसे उसी के अंदाज में जवाब देना होगा
मगर क्‍या सीधा युद्ध कोई विकल्प हो सकता है? कोई भी विचारवान व्यक्ति कभी भी सीधे युद्ध की हिमायत नहीं कर सकता। युद्ध केवल अपरिहार्य स्थिति में किया जा सकता है और किया जाना भी चाहिए। ऐसे में सीमा पार पाकिस्तान में छिपकर बैठे कायरों को ‘जैसे को तैसा’ वाला जवाब उसी तरह से दिया जा सकता है जैसे इस सरकार ने उरी हमले के बाद दिया था। शर्त बस इतनी है कि इस बार इस देश को मौलाना मसूद अजहर का सिर चाहिए।
सर्जिकल स्ट्राइक के दावों पर सवालिया निशान उठाने वाले राजनीतिक दलों को भले ही जनता गंभीरता से नहीं लेती हो मगर गोएबल्स के सिद्धांत के अनुसार एक ही झूठ को बार-बार दोहराया जाए तो एक समय के बाद जनता उसे सच मानने लगती है। सर्जिकल स्ट्राइक और राफेल के मामले में विपक्ष यही रणनीति अपना रहा है। ऐसे में सरकार यदि सीधे मसूद अजहर का सर देश को जनता को सौंपती है तभी गोएबल्स के सिद्धांत का यह सिद्धांत हवा में उड़ सकता है।
दुश्मन को उसी के अंदाज में जवाब देने वाली सरकार से लोगों ने इस बार भी सख्त जवाब देने की उम्मीद लगा रखी है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। आखिर हम जानते हैं कि इस सरकार के पिछले पांच वर्षों के दौरान कश्मी्र के बाहर एक भी बड़ा आतंकी हमला नहीं हुआ है। यहां तक कि देश का पूर्वोत्तर भाग भी आज जितना शांत है उतना अतीत में कभी नहीं रहा। ऐसे में इस हमले के बाद भी हम यह उम्मीद करते हैं कि जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )