पुलवामा के बाद... भारत की त्रिशूल नीति
   दिनांक 16-फ़रवरी-2019

पुलवामा में आतंकवादी हमले के बाद पूरा देश बेचैन है. हर शख्स सरकार से कह रहा है, जवाब दो. बदला लो. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कह दिया, बदला लिया जाएगा. बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी ऐसा करने वालों को. लेकिन सवाल सबके सामने यही है कि भारत के पास क्या विकल्प हैं. क्या करेगी नई दिल्ली. ऐसा कि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज आए. बाज न भी आए उसे पता चले कि नुकसान उसका कई गुना ज्यादा है. अभी तक के संकेत हैं कि भारत तीन सूत्री नीति पर चल रहा है.
1. सेना का प्रहार
भारतीय सेना को सरकार ने खुली छूट दे दी है. खुली छूट का मतलब है कि पाकिस्तान के खिलाफ कब, कहां, कैसी और कितनी कार्रवाई करनी है, ये भारतीय सेना तय करेगी. लेकिन सवाल सबके सामने है. उड़ी में 2016 में सेना पर हुए आतंकवादी हमले के बाद भी सबके सामने यही सस्पेंस था. भारत कैसे जवाब देगा. ये रणनीतिक मामले हैं. इस तरह की कार्रवाई प्रचार करके नहीं की जातीं. इसमें सबसे अहम है एलिमेंट आफ सरप्राइज. ऐसा कदम की दुश्मन भौचका रह जाए. भारत की सर्जिकल स्ट्राइक के समय यही तो हुआ था. पाकिस्तान भौचक रह गया. भारतीय जवान अपने काम को अंजाम देकर सुरक्षित वापस लौट आए. लेकिन सर्जिकल स्ट्राइक एक विकल्प के तौर पर इस्तेमाल हो चुकी है. पाकिस्तान की सेना और आतंकवादी चौकस हैं. इसलिए यह इतना दमदार विकल्प नहीं रह गया है. दूसरा विकल्प ये है कि भारतीय सेना नियंत्रण रेखा से कम से कम पचास किलोमीटर अंदर तक पाकिस्तान में घुस जाए. इस कार्रवाई के दायरे में नियंत्रण रेखा पर बने आतंकवादी कैंप और उनकी सहायता करने वाले पाकिस्तानी फौज के ठिकाने आ जाएंगे. इसे आप लो इंटेंसिटी कान्फ्लिक्ट या सीमित युद्ध कह सकते हैं. पाकिस्तान ने 1965 में इसी तरह का हमला कश्मीर पर किया था. 1962 में चीन से जंग हारे भारत से पाकिस्तान को ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी. भारत ने पंजाब में जवाबी मोर्चा खोल दिया और पाकिस्तान की सीमित युद्ध की कोशिश को तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने फेल कर दिया. भारत यदि नियंत्रण रेखा पर ये कार्रवाई करता है, तो उसे इस बात के लिए तैयार रहना होगा कि ये पूर्ण परंपरागत युद्ध की शक्ल ले सकता है. वैसे आज देश का जो माहौल है, मुझे लगता है कि हम ये खतरा मोल लेने के लिए तैयार हैं. ऐसे किसी युद्ध की सूरत में पाकिस्तान का तबाह हो जाना तय है. तीसरा विकल्प गुलाम कश्मीर में आतंकवादी शिविरों पर हवाई हमले का है. फिलहाल ये विकल्प सबसे ज्यादा मुफीद माना जा रहा है. मिराज, सुखोई एमकेआई और जगुआर की मदद से ये हमला किया जा सकता है. इस हमले में ब्रह्मोस मिसाइल भी सहयोगी के रूप में शामिल हो सकती हैं. इन विकल्पों के बीच ये अंदाजा लगाना मुश्किल है कि वार रूम में भारतीय जनरल क्या रास्ता चुनते हैं.

 
2. दुनिया में अलग-थलग करो
नरेंद्र मोदी सरकार प्रो एक्टिव तरीके से इस काम में जुटी हुई है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर पुलवामा हमले के जरिये पाकिस्तान को आतंकवादी देश के रूप में अलग-थलग किया जाए. साठ से अधिक देशों के राजनयिक मिशनों को इस बात के सुबूत सौंपे जा चुके हैं कि पुलवामा पर हमला पाकिस्तान प्रायोजित था. पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और पाकिस्तान में पनाह पाया दहशतगर्द सरगना मसूद अजहर इस घटना के मास्टर माइंड हैं. जवाब में अमेरिका, रूस समेत दुनिया के तमाम देशों ने पाकिस्तान को सलाह दी है कि वह आतंकवाद को प्रायोजित करने की नीति से बाज आए. भारत की कोशिश है कि जैश ए मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कराया जाए. हालांकि इसमें चीन का अडंगा है. अब नई दिल्ली इस कोशिश में है कि चीन मसूद अजहर के मामले पर खुलकर एक्सपोज हो. दुनिया को नजर आए कि आतंकवाद पर चीन की नीति दोमुही है. फिर भी इस तरह पाकिस्तान को एक्सपोज करने से भारत को भविष्य में पाकिस्तान के खिलाफ की जाने कार्रवाई में किसी अंतरराष्ट्रीय विरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा.

 
3. आर्थिक घेराबंदी
पाकिस्तान अपने सबसे भीषण आर्थिक संकट से गुजर रहा है. इस समय पाकिस्तान को विश्व बैंक समेत तमाम अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों ने आईना दिखा दिया है. पुलवामा हमले के बाद भारत ने मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएफएन) का दर्जा वापस ले लिया. हालांकि भारत का निर्यात पाकिस्तान से होने वाले आयात के मुकाबले कई गुना ज्यादा था. इसके बावजूद पाकिस्तान के लिए ये बड़ा झटका है. पाकिस्तान के पास डॉलर कमाने के सीमित जरिये हैं. मुख्य रूप से पाकिस्तान दुनिया भर से मिलने वाली मदद पर ही जिंदा है. अब जबकि अमेरिका सीधे तालिबान से बातचीत कर रहा है, उसे पाकिस्तान की बहुत ज्यादा जरूरत नहीं रह गई है. हालांकि इस आर्थिक घेराबंदी में चीन के पाकिस्तान पर आधिपत्य का खतरा बढ़ जाएगा. चीन ने कर्ज और निवेश के बल पर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को फिलहाल गिरवी रख रखा है.
 
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)