मजहबी उन्मादियों को कन्वर्जन से रोका तो मार डाला
   दिनांक 18-फ़रवरी-2019
तमिलनाडु के कुंभकोणम में 42 वर्षीय रामलिंगम की मजहबी उन्मादियों ने हत्या कर दी। उनका कसूर सिर्फ इतना था कि वह कट्टरपंथियों को कन्वर्जन न करने के लिए समझा रहे थे
 एक मजहबी को कन्जर्वन रोकने को कहते हुए रामलिंगम( यह फोटो वीडियो से लिया गया है।) प्रकोष्ठ में रामलिंगम
गोपालरत्नम, तमिलनाडु से साथ में आदित्य भारद्वाज
तमिलनाडु में तंजावुर के कुंभकोणम में 5 फरवरी को 42 वर्षीय रामलिंगम की बर्बर हत्या कर दी गई। हत्या की वजह थी कन्वर्जन का विरोध। हत्या के सिलसिले में कुल आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया है और उनकी पहचान एस. निजाम अली, सरबुद्दीन, मोहम्मद रिजवान, मोहम्मद अजरुद्दीन और मोहम्मद रय्याज, मोहम्मद तौफीक, मोहम्मद परवेज और तौहीद बाशा के रूप में हुई। इनमें से पांच कट्टरपंथी संगठन पॉपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया से जुड़े हुए हैं।
स्थानीय मीडिया में खबर आई। राष्ट्रीय मीडिया में भी खबर आई लेकिन इस खबर को बड़े सामान्य तरीके से प्रस्तुत किया गया। क्यों? क्योंकि मरने वाला एक हिंदू था और वह कट्टरपंथियों को कन्वर्जन करने से रोक रहा था।
अब जरा दिल्ली के नजदीक बल्लभगढ़ जाते हुए ट्रेन में सीट के विवाद को लेकर हुई जुनैद की हत्या को याद करिए। अपराध-अपराध है। वजह कोई भी हो। लेकिन किसी की हत्या किए जाने की पैरवी नहीं की जा सकती। जुनैद की हत्या के बाद मीडिया की सुर्खियां क्या थीं? मीडिया ने इसे एक तरफा ‘हेट क्राइम’ बताया। लोगों के बीच यह धारणा बनाने की कोशिश की गई कि भीड़ ने एक मुसलमान युवक की ‘नफरत’ के कारण हत्या कर दी गई। अखलाक और पहलू खान की हत्या के मामले में भी ऐसा ही हुआ। मीडिया ने पूरे मामले को हिंदू बनाम मुस्लिम बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन रामलिंगम की जिस बर्बरता से हत्या हुई उसके बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने तो उन्हें इंसाफ दिलाने की मुहिम छेड़ी, लेकिन कथित सेकुलर मीडिया इस पर खामोश ही रहा।
मजहबी उन्मादियों ने रामलिंगम की तालिबानी अंदाज में क्रूरतम तरीके से हत्या की। घटना के चश्मदीद उनके बेटे बालाजी के मुताबिक रामलिंगम 5 फरवरी की सुबह लगभग 9 बजे उनके साथ पास के गांव में अपने व्यवसाय के सिलसिले में किसी ग्राहक से मिलने गए थे। उस गांव में उन्होंने कुछ मजहबी कट्टरपंथियों को हिंदुओं पर कन्वर्जन का दबाव बनाते देखा। स्थानीय होने के कारण सभी उनके पूर्व परिचित थे। उन्होंने बड़े नम्र स्वर में उन लोगों से कहा कि ‘अरे भाई, जबरन किसी को अपने मत में आने का दवाब क्यों बनाते हो। खुद भी अपने मत का अनुसरण करो और दूसरों को भी उनके धर्म का पालन करने दो। आप लोग क्यों दूसरों का कन्वर्जन करना चाहते हो।’ उनमें से एक व्यक्ति ने कहा कि ‘हम तो आपसी भाईचारे की ही बात कर रहे हैं। अगर सभी लोग इस्लाम में आ जाएं तो इससे एकता और भाईचारा ही बढ़ेगा।’ उस व्यक्ति की बात सुनकर रामलिंगम ने कहा कि ‘आप लोग आपसी भाईचारे और समरसता की बात करते हो, क्या आपकी बस्ती में एक हिंदु के लिए घर दिलवाओगे? हम तुम्हारी ईद-रमजान की सेवइंया दिल से स्वीकार करते हैं। क्या तुम हमारे भगवान को चढ़ाया प्रसाद स्वीकार करोगे?’ यह कहने के दौरान ही उन्होंने एक मुसलमान के सर पर पहनी जालीदार टोपी को उठा कर अपने सर पर पहन लिया और उससे पूछा कि ‘लो मैंने तुम्हारी टोपी पहन ली, क्या तुम हमारे भगवान को चढ़ी भस्म को अपने माथे से लगाओगे?’ यह कहते हुए रामलिंगम ने पास के एक हिंदू घर के मंदिर से भस्म मांगकर उस मुसलमान के माथे पर लगा दी। इस घटना से वहां तनाव चरम पर पहुंच गया। एक व्यक्ति ने इस बहस में शामिल मुसलमानों का गुस्सा बढ़ता देख रामलिंगम को वहां से खींच कर हटा लिया। उस समय ऐसा लगा कि मारपीट की घटना में परिवर्तित होने से पहले ही विवाद का अंत हो गया। विवाद के खत्म हो जाने पर वहां मौजूद लोगों ने राहत की सांस ली। रामलिंगम की हत्या से जुड़े इस विवाद को उनके बेटे बालाजी ने इस पूरी घटना को मोबाइल फोन में रिकॉर्ड कर लिया था।
 
हत्या के आरोप में पकड़े गए पीएफआई के सदस्य 
उसी दिन शाम जब पिता-पुत्र वापस अपने घर लौट रहे थे। रास्ते में कस्बे की बड़ी मस्जिद के पास से गुजरते हुए दोनों को चार लोगों ने रोक लिया और उनसे बहस करने लगे। दो व्यक्तियों ने अचानक उनके बेटे के गले पर हमला किया। बेटे को बचाने के लिए उन्होने अपना हाथ आगे कर दिया। इस वार से बेटे का गला तो बच गया पर उनका बायां हाथ कट गया। दूसरे शख्स ने उनके दूसरे हाथ पर यह कहते हुए वार किया कि ‘इसी हाथ से तुमने भस्म लगाई थी न,’ इसी वार से उनका दूसरा हाथ कटकर झूल गया। उन्होंने बचने की कोशिश की लेकिन कट्टरपंथियों ने उनकी आंखों में लाल मिर्च झोंक दी। इसके बाद बर्बरता दिखाते हुए अन्य दो लोगों ने धारदार हथियारों से उनकी पीठ पर ताबड़तोड़ वार किए। खून से लथपथ रामलिंगम नीचे गिर गए। सभी लोग पहले से स्टार्ट खड़ी गाड़ी में बैठ कर भाग गए। इस जानलेवा हमले में बुरी तरह घायल हुए रामलिंगम को उनका बेटा पास के अस्पताल ले कर भागा। अस्तपाल के डॉक्टरों ने बुरी तरह घायल रामलिंगम का ईलाज करने में यह कहते हुए असमर्थता जताई कि यहां उनके ईलाज की समुचित व्यवस्था नहीं है। आप इन्हें बड़े सरकारी अस्पताल ले जाएं। रामलिंगम ने अस्पताल जाते समय शरीर से अधिक मात्रा में खून बह जाने के कारण उन्होंने रास्ते में ही दम तोड़ दिया।
अकेले कमाने वाले थे रामलिंगम
रामलिंगम घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी निभाने के लिए कुंभकोणम के पास ही स्थित त्रिभुवनम नाम के कस्बे में कैटरिंग का व्यवसाय किया करते थे। परिवार में पत्नी चित्रा रामलिंगम के अलावा तीन बेटे और हैं। अपने परिवार में वह अकेले कमाने वाले थे। राजनीतिक और सामाजिक तौर पर जागरूक रामलिंगम सामाजिक कार्यों में भागीदारी करने के साथ साथ ही राजनीति में रुचि रखने की वजह से पट्टाली मक्कल काट्ची (पीएमके) नामक राजनीतिक पार्टी से भी सक्रिय तौर पर जुड़े हुए थे। वह पार्टी में जिला सचिव पद की जिम्मेदारी वहन कर रहे थे। रामलिंगम की पत्नी ने कहा कि उनकी किसी ने कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी। उन्हें सिर्फ इसलिए मारा गया क्योंकि उन्होंने कन्वर्जन का विरोध किया था।
सेकुलर साध लेते हैं चुप्पी
कर्नाटक जैसे राज्यों में तबलीगी जमात और मिशनरियां खुलेआम हिंदुओं का कन्वर्जन कराने का काम करती हैं। विशेष तौर पर इनके निशाने पर हिंदू समाज के वंचित समुदाय के लोग होते हैं। कथित सेकुलर राजनीतिक दल इस तरह की घटना पर चुप्पी साध लेते हैं। कथित बुद्धिजीवी और मीडिया की सेकुलर लॉबी भी इस तरह की घटनाओं पर मौन व्रत धारण कर लेती है। वहीं मामला यदि मुसलमानों से जुड़ा हो, चाहे वजह जो भी रही हो, तो मीडिया का रुख दूसरा होता है। कोई हिंदू मारा गया तो कोई बात नहीं लेकिन यदि किन्हीं कारणों से किसी मुसलमान के साथ कोई घटना हुई तो उसे पूरे लोकतंत्र की हत्या करार दे दिया जाता है। राष्ट्रीय चैनलों पर बहस होती हैं। मुसलमानों से जुड़ा हर मामला इनके लिए खास होता है। वोट बैंक की राजनीति करने के लिए हर मुमकिन कोशिश की जाती है। बड़े-बड़े मुआवजे दिए जाते हैं। घर, नौकरी सब कुछ दिया जाता है। वहीं रामलिंगम जैसे मामले को दबा दिया जाता है।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
शुरुआती दौर में कट्टरपंथियों द्वारा रामलिंगम की हत्या के मामले में सिर्फ भाजपा ने ही इस घटना की निंदा की थी। भाजपा के राष्ट्रीय सचिव एच. राजा ने रामलिंगम के घर का दौरा किया। उन्होंने उनके परिवार को सांत्वना दी। इसके बाद पीएमके के संस्थापक रामदास ने रामलिंगम की हत्या की निंदा की क्योंकि रामलिंगम पीएमके के जिला सचिव भी थे। डीएमके प्रमुख एम.के. स्टालिन ने घटना के दो दिन बाद इस अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से इस घटना की निंदा की लेकिन उन्होंने इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए एक शब्द भी नहीं बोला।
आरोपियों के हमदर्द कट्टरपंथी
रामलिंगम की हत्या के बाद कट्टरपंथी मुस्लिम न सिर्फ आरोपियों के समर्थन में आ गए, बल्कि उन्होंने खुले मंच ने आरोपियों के परिवार की आर्थिक मदद और आरोपियों को कानूनी मदद मुहैया कराने की घोषणा कर दी है। ऐसे ही एक संगठन तिरुभुवनम जमात ने एक पर्चा जारी कर अपनी कमाई का दो प्रतिशत अभियुक्तों और उनके परिवार के लिए देने की घोषणा की है। जमात ने आरोपियों को कानूनी और वित्तीय सहायता प्रदान करने का फैसला किया है।
सोशल मीडिया पर फूटा गुस्सा

 
सोशल मीडिया पर पोस्टर संदेश के जरिए आक्रोश प्रकट करते लोग  
रामलिंगम की हत्या को मुख्यधारा की मीडिया ने बेशक अखलाक या पहलू खान की हत्या पर दी गई बड़ी कवरेज लायक घटना न माना हो, पर सोशल मीडिया में इस लोमहर्षक घटना को लेकर खूब विरोध जताया गया फेसबुक पर लोगों ने इस संबंध में लिखा और राज्य सरकार से सख्त कार्रवाई करने की मांग की। लोगों ने फेसबुक ट्विटर पर रामलिंगम को न्याय दिलाने के लिए अभियान चलाया हुआ है।
लोग फेसबुक पर हाथ में बोर्ड लेकर तस्वीरें साझा कर रहे हैं जिसमें पूछा जा रहा है ‘जय भीम-जय मीम’ का नारा लगाने वाले कहां मुंह छिपा कर बैठे हैं? कन्वर्जन का विरोध करने वाले हमारे भाई रामलिंगम को कितनी बर्बरता से मारा है। अब चुप क्यों बैठे हो? लोग पूछ रहे हैं ‘भीम-मीम एकता’ का रात-दिन नारा लगाने वाले चिंतक और दल रामलिंगम के मामले में चुप क्यों हैं। क्या रामलिंगम दलित नहीं?
ट्विटर पर #JusticeForRamalingam अभियान चलाकर राज्य सरकार और कथित सेकुलर दलों से सवाल पूछे जा रहे हैं। यूट्यूब पर भी लोगों ने इस घटना के संबंध में वीडियो बना कर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए राज्य सरकार के रवैये पर पूछ किए हैं। लोग सवाल उठा रहे हैं कि वोट बैंक की राजनीति के चलते स्वयं को सेकुलर कहने वाले राजनीतिक दल और नामी पत्रकार ऐसी घटनाओं पर आंखें क्यों मूंद लेते हैं?