कश्मीर: नेहरू की कारस्तानी, जख्म बना नासूर
   दिनांक 19-फ़रवरी-2019
जम्मू—कश्मीर में लागू अनुच्छेद 370 लागू करने को सरदार पटेल राजी नहीं थे लेकिन 1938 से शेख अब्दुल्ला के जादू की गिरफ्त में नेहरू उनके हर इशारे पर नाच रहे थे। उन्होंने पटेल पर दबाव बनाया और अनिच्छा के बावजूद इसके विरोध से पीछे हट गए
देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के निजी सचिव रहे वी शंकर (आईएएस) ने अपने कार्यकाल के हर महत्वपूर्ण घटनाक्रम को दर्ज किया. संविधान के अनुच्छेद 370 पर
ए. शंकर लिखते हैं- सरदार पटेल ने कहा था-जवाहरलाल रोएंगे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल रोए या नहीं, ये तो नहीं पता. लेकिन देश रो रहा है. बात एक मूल सवाल से शुरू करते हैं. जम्मू-कश्मीर के रूप में किसी राज्य को विशेष दर्जा क्यों ? क्या ये एक तरह से इस बात का इकबालिया बयान नहीं है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अन्य रियासतों की तरह अभिन्न अंग नहीं बन सका. क्या ये पाकिस्तान, दहशतगर्दों को आमंत्रण नहीं देता. जी हां, ये संविधान में किया गया एक अस्थायी प्रावधान कश्मीर समस्या का मूल है. एक अलग मुल्क पर हुकूमत करने की शेख अब्दुल्ला (फारूख अब्दुल्ला के पिता व उमर अब्दुल्ला के दादा) की इच्छा का भारतीय संविधान में इंतजाम धारा 370 के रूप में है.
17 अक्टूबर 1949 को संविधान सभा में मौलाना हसरत मोहिनी ने ये सवाल उठाया-इस तरह का भेदभाव क्यों ? बाकी रियासतें भी तो भारत में शामिल हुई हैं फिर जम्मू-कश्मीर को ही विशेष दर्जा क्यों ? इसका जवाब गोपाल स्वामी अयंगर ने दिया. वह नेहरू की कैबिनेट में बिना विभाग के मंत्री थे. जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह के दीवान रहे अयंगर को नेहरू खासतौर पर जम्मू-कश्मीर के लिए ही कैबिनेट में लाए थे. अयंगर ने असेंबली को बताया कि जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के हालात अभी नहीं हैं. भारत पाकिस्तान के साथ कश्मीर को लेकर जंग लड़ चुका है. वहां हालात अभी भी अस्थिर और असामान्य हैं.
1938 से शेख अब्दुल्ला के जादू की गिरफ्त में नेहरू उनके हर इशारे पर नाच रहे थे. शेख अब्दुल्ला को पता था कि मिनिस्ट्री आफ स्टेट्स देख रहे सरदार पटेल के रहते उसकी दाल गलनी संभव नहीं है. ऐसे हालात में नेहरू ने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के मामले को अपने हाथ मे ले लिया, तो समझा जा सकता है कि ऐसा क्यों किया गया होगा. इस पर जब विवाद खड़ा हुआ तो नेहरू ने कहा था-कश्मीर मे जो भी गलत या सही होगा, उसका जिम्मेदार मैं होऊंगा. जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जे के प्रस्ताव को लेकर नेहरू संविधान सभा में भी घिर गए थे. विरोध इतना मुखर था कि इसकी मंजूरी मिलनी असंभव दिखाई दे रही थी. तब नेहरू ने हथियार डालते हुए सरदार पटेल को विदेश से फोन किया. वह अनिच्छा के बावजूद नेहरू की बात मानते हुए इसके विरोध से पीछे हट गए. उन्होंने कांग्रेस नेताओं को समझाया कि इस तरह का विरोध देश के प्रधानमंत्री को नीचा दिखाने का काम करेगा. नतीजा ये हुआ कि संविधान सभा में इसकी ज्यादा चर्चा ही नहीं हुई. शंकर लिखते हैं कि सरदार को इसका बहुत अफसोस हुआ. उन्हें अपने सिद्धांतों से हटकर काम करने से गहरा सदमा लगा था. 24 जुलाई 1952 को सरदार पटेल का देहांत हो गया. वही नेहरू जो ताल ठोककर कहते थे कि कश्मीर को विशेष दर्जे के जो नतीजे होंगे, उनका जिम्मेदार मैं होऊंगा, अपनी बात से पलट गए. पटेल की मौत के बाद संसद में कश्मीर पर विस्तृत बयान में नेहरू इस झूठ को बोलने से भी बाज नहीं आए कि कश्मीर का मामला सरदार पटेल देख रहे थे.
क्या है धारा 370
धारा 370 भारतीय संविधान का एक विशेष अनुच्छेद है. यह आर्टिकल 21 के अंतर्गत आता है. जिसका शीर्षक है अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्ध. इसी के जरिये जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा हासिल है. इसका प्रारूप नेहरू के खास शेख अब्दुल्ला ने तैयार किया था. जिसे संविधान सभा में आयंगर ने धारा 306-ए का प्रारूप पेश किया, यही बाद में धारा 370 बनी. इसी के चलते 1951 में राज्य को अलग संविधान सभा बैठाने की इजाजत मिली. 26 जनवरी 1957 से राज्य में विशेष संविधान लागू है.
जम्मू कश्मीर के पास क्या विशेष अधिकार हैं
- धारा 370 के प्रावधानों के मुताबिक संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है।
- किसी अन्य विषय से संबंधित कानून को लागू करवाने के लिए केंद्र को राज्य सरकार की सहमति लेनी पड़ती है।
- इसी विशेष दर्जे के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती। राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं है।
- 1976 का शहरी भूमि कानून भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता।
- भारत के अन्य राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते हैं। धारा 370 के तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कहीं भी भूमि खरीदने का अधिकार है।
- भारतीय संविधान की धारा 360 यानी देश में इमरजेंसी और वित्तीय आपातकाल लगाने वाला प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता.
नतीजा क्या है
- जम्मू-कश्मीर का झंडा अलग होता है।
- जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है।
- जम्मू-कश्मीर में भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय को भी यहां के उच्च न्यायालय के फैसलों के खिलाफ अपील स्वीकार करने का अधिकार बाद में संशोधन के जरिये दिया गया.
- जम्मू-कश्मीर की कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से शादी कर ले तो उस महिला की जम्मू-कश्मीर की नागरिकता खत्म हो जाएगी।
- यदि कोई कश्मीरी महिला पाकिस्तान के किसी व्यक्ति से शादी करती है, तो उसके पति को भी जम्मू-कश्मीर की नागरिकता मिल जाती है।
- जम्मू-कश्मीर में बाहर के लोग जमीन नहीं खरीद सकते हैं।
- जम्मू-कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 साल होता है। जबकि भारत के अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल 5 साल होता है।
- भारत की संसद जम्मू-कश्मीर के संबंध में बहुत ही सीमित दायरे में कानून बना सकती है।
- कश्मीर में अल्पसंख्यक हिन्दुओं और सिखों को 16 फीसदी आरक्षण नहीं मिलता है।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सर्वोच्च बलिदान
जम्मू-कश्मीर के संविधान में व्यवस्था था कि भारत से आने वाले किसी भी व्यक्ति को यहां पहचान पत्र के साथ ही एंट्री मिलेगी. अपने जन्म के समय से ही जनसंघ जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जे का विरोध करता रहा. जनसंघ संस्थापक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का मानना था कि यह धारा शेख अब्दुल्ला के ‘तीन राष्ट्रों के सिद्धांत’ को लागू करने की एक योजना है. इसी के विरोध में श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1953 में कश्मीर यात्रा पर निकले. लेकिन उन्हें जम्मू-कश्मीर के भीतर घुसने नहीं दिया गया. मुखर्जी को गिरफ्तार कर लिया गया. 23 जून 1953 को हिरासत के दौरान संदिग्ध हालात में उनकी मौत हो गई. जिसकी आज तक कोई पुख्ता जांच नहीं हुई. मुखर्जी के बलिदान का नतीजा था कि पहचान पत्र के प्रावधान को बाद में रद्द कर दिया गया. साथ ही सदर ए रियासत जैसे विभाजनकारी पदनाम को बदलकर मुख्यमंत्री किया गया. लेकिन जो आशंका मुखर्जी ने जताई थी, वह आज सच साबित हो रही है. कश्मीर को जब तक शेष भारत के जैसा ही संवैधानिक दर्जा नहीं होगा, मुट्ठी भर कश्मीरी पाकिस्तान की शह पर मौत का खेल खेलते रहेंगे.