खूंटे से कांग्रेस बंधी है, जनता नहीं
   दिनांक 21-फ़रवरी-2019
 
भारत विश्व का सबसे युवा देश और सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इन दो स्थापित तथ्यों के साथ एक बात और जोड़ लें-इस विशाल लोकतंत्र का सबसे बुजुर्ग दल फिर से जवान होने को बेताब है। कांग्रेस में राहुल के लिए राह बनाते हुए सोनिया गांधी का अध्यक्ष की गद्दी से सरकना इसका कथित संकेत था और प्रियंका वाड्रा की ‘एंट्री’ के साथ इसकी मुनादी हो गई है। युवाओं को आगे बढ़ाना जरूरी है और इस तरफ होने वाले स्वस्थ प्रयासों का स्वागत होना चाहिये। पर कांग्रेस का मामला विलग है—राहुल या प्रियंका का कद बढ़ाने की कांग्रेसी चाहत परिवार को पूजने वाली पार्टी की परम्परा तो है, किन्तु लोकतंत्र के लिहाज से इसे ‘स्वस्थ’ नहीं कहा जा सकता। जहां कुनबा ही केंद्र हो और परिवार के हित ही परिधि, वहां राष्ट्रीय सरोकारों की गुंजाइश कहां रह जाती है। कांग्रेस को हर दोष से परे मानने वालों की संख्या अब बहुत बची नहीं, किन्तु भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण दल के रूप में इसका विश्लेषण करने वाले यह जरूर मानेंगे कि एक खास उपनाम के खूंटे से बंधे रहकर पार्टी में दोतरफा खोट पैदा हुई है।
पहली—ऊपर से चीजें कैसी भी दिखें किन्तु यहां वास्तव में युवाओं के लिये कोई जगह नहीं है। हाल यह है कि एक ही परिवार में राजयोग तलाशते हुए पार्टी अगली पीढ़ी को (भले ही जिसकी आयु 50 वर्ष छूने जा रही हो) बढ़ाती तो है मगर इस बीच उन युवाओं का मोहभंग कर देती है जो नेतृत्व क्षमता में इन वारिसों के मुकाबले ज्यादा प्रतिभाशाली हैं या फिर किसी कृपादृष्टि के लिए दशकों धैर्य बनाए नहीं रख सकते।
दूसरी खोट यह कि पारिवारिक भ्रष्टाचार के चलते कांग्रेस जनता का भरोसा तोड़ने वाली पार्टी बन चुकी है। पार्टी का पूरा तंत्र एक परिवार की हसरतों को पूरा करने में ही इस कदर चकरघिन्नी काटता रहता है कि उसे यह फिक्र ही नहीं होती कि सत्ता की कुंजी सौंपने वाली जनता की भी कुछ इच्छाएं हो सकती हैं। मसलन, कांग्रेस शासित राज्यों के कुछ पूर्व मुख्यमंत्री, जिन पर परोक्ष आरोप है कि उन्होंने ‘परिवार’ से जुड़ी कम्पनियों के लिये जमीन जुटाने के चक्कर में कायदे-कानून ताक पर रख छोड़े! ऐसे में प्रियंका वाड्रा की आमद को कैसे देखा जाए-कोई चौंकाने वाला पैंतरा या अद्भुत राजनीतिक क्षमता!
यकीनन नहीं! पार्टी के पिट्टू और प्रवक्ता इसे विरोधियों को चौंकाने वाला कदम कहते हैं मगर इसमें विरोधियों या जनता के चौंकने वाली क्या बात है! हैरानी तो तब होती जब परिवार से बाहर का कोई नाम आता और उसे किसी ‘वारिसों’ के मुकाबले आगे की जगह मिलती। पर बात उलटी है। राजनीति के भीतर यह उस दुकानदार का-सा काम है जो काम करने के लिए चाहे जितने नौकर रखे, गल्ले पर अपने लड़के को ही बैठाता है। रही बात क्षमता की, तो कह सकते हैं कि कांग्रेस के पूरे तंत्र में ही ‘परिवार’ की क्षमता को नापने वाली ना तो कोई कसौटी है, ना ही साहस। इसलिये जिन प्रियंका के लिए कपिल सिब्बल सरीखे नेता द्वारा पहले दो जगह से चुनाव लड़ने के संकेत दिए गए, उन्होंने एक सीट के लिए भी मना कर दिया। साथ ही उनके बचाव में राहुल का ऐसा बयान भी आया जिसका मंतव्य था कि 2019 उनकी बहन को आंकने का वर्ष नहीं है और वे बाद के विधानसभा चुनाव में निखरेंगी। बहरहाल, कुनबे से बंधी कांग्रेस प्रियंका-राहुल के रोड शो के बाद सकते में है। क्योंकि पंजाब से खासतौर पर मंगाई गई कैप्टन अमरिंदर सिंह की ‘लक्की’ बस भी लखनऊ के लोगों में भाई-बहन के लिए जादू नहीं जगा सकी। यह तो पार्टी के मीडिया मैनेजमेंट की बलिहारी कि कोई कैमरा ‘हाथ हिलाते सुंदर चेहरों’ को छोड़ सड़क पर मौजूद जनता की सही संख्या दिखाने के लिए नहीं घूमा।
जनता किसी खूंटे से नहीं बंधी होती, भीड़ पर किसी का बस नहीं है। बूढ़ी कांग्रेस का परिवार की हसरतों पर बस नहीं है। यह उस बूढ़े की कहानी है जो अपनी हसरतों के आगे बेबस है। भीड़ जा चुकी है, कहानी जारी रहेगी।