35-एः लाखों जिंदगी तबाह कर देने वाला अवैध अनुच्छेद
   दिनांक 24-फ़रवरी-2019

35-एः सवाल देश और संविधान का है.संविधान में नया कानून जोड़ने की प्रक्रिया क्या है. इसके लिए संविधान विशेषज्ञ होने की जरूरत नहीं. सामान्य ज्ञान का सवाल है. संसद से पारित होने के बाद कोई नया कानून बनता है. कोई संवैधानिक अनुच्छेद जोड़ने या संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है. लेकिन भारतीय संविधान के सर पर अनुच्छेद 35-ए बिना किसी प्रक्रिया के सवार है. एक ऐसा काला कानून जिसे चुपके से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सौजन्य से राष्ट्रपति के आदेश के जरिये संविधान का हिस्सा बना दिया गया. हवाला दिया गया अनुच्छेद 370 का.
अनुच्छेद को असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण बताते हुए दिल्ली के एनजीओ 'वी द सिटिजन' ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. इस पर सोमवार को सुनवाई है. सोमवार भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण तारीख बन सकता है. सुप्रीम कोर्ट में पहला मौका है, जब अनुच्छेद 35 ए को संविधान की कसौटी पर कसा जा रहा है. साथ ही, बड़ी पुख्ता दलील के साथ. दलील ये कि 35 ए संविधान का हिस्सा नहीं है. सुप्रीम कोर्ट में मामला टल भी जाए, लेकिन कानून के जानकारों का एक बड़ा वर्ग कहता है कि अगर राष्ट्रपति के आदेश से कोई अनुच्छेद जोड़ दिया गया है, तो यह राष्ट्रपति के आदेश से खारिज भी किया जा सकता है. भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी तो ऐलान कर चुके हैं कि अनुच्छेद 35 ए अगर सुप्रीम कोर्ट से खत्म नहीं होता, तो राष्ट्रपति के आदेश से खत्म कर दिया जाएगा. घाटी में कई गई तैयारियां भी इसी ओर इशारा कर रही हैं. सुरक्षाबलों की सौ से अधिक कंपनियों की तैनाती हो चुकी है. जो इशारा करती है कि मौजूदा व्यवस्था में किसी बदलाव की सूरत में होने वाली किसी भी किस्म की घटना को सख्ती के साथ कुचला जाएगा.
अवैध रूप से लागू किया 35 ए
दरअसल अनुच्छेद 35 ए जम्मू-कश्मीर की विधान सभा को स्थाई नागरिक की परिभाषा तय करने का अधिकार देता है. यह अनुच्छेद आपको संविधान में नहीं मिलेगा. तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने धारा 35-ए को लागू करने के लिए बहुत बड़ी चाल चली. संविधान सभा में अस्थायी प्रावधान के रूप में अंगिकार धारा 370 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल (दुरुपयोग या अवैध उपयोग) किया गया. असहमति के बावजूद नेहरू तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के आदेश के जरिये 35 ए को लागू कराने में कामयाब रहे. मूल रूप से धारा 370 का हिस्सा न होते हुए भी अनुच्छेद 35 ए को इसका अंग करार दे दिया गया. भारतीय संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ देना सीधे-सीधे संविधान को संशोधित करना है. यह अधिकार सिर्फ अनुच्छेद 368 के तहत भारतीय संसद को है. सुप्रीम कोर्ट को इसी बात की सुनवाई करनी है कि भारतीय संसद से पारित हुए बगैर संविधान को संशोधित करने वाला अनुच्छेद 35 ए कैसे जायज है. भारतीय संविधान में आज तक जितने भी संशोधन हुए हैं, सबका जिक्र संविधान की किताबों में होता है. लेकिन 35ए का जिक्र संविधान संशोधन के मुख्य भाग में नहीं, बल्कि परिशिष्ट में किया गया है. मायने ये कि आपको एक नजर में पता ही नहीं चलेगा कि संविधान में कोई 35 ए नाम का संशोधन है.
क्या है इसका असर
इस धारा के तहत जम्मू-कश्मीर के अलावा भारत के किसी भी राज्य का नागरिक जम्मू-कश्मीर का नागरिक नहीं माना जाएगा.
इसी धारा की वजह से वह राज्य में कोई संपत्ति नहीं खरीद सकता.
जम्मू कश्मीर का नागरिक वही होगा, जो कि 14 मई 1954 से 10 वर्ष पहले तक राज्य का नागरिक हो.
इसके साथ ही अगर जम्मू-कश्मीर की लड़की किसी बाहरी लड़के से शादी करती है तो उसके सारे अधिकार समाप्त हो जाएंगे. इसके साथ ही उसके बच्चों को भी किसी तरह के अधिकार नहीं मिलेंगे.
क्या हुआ असर
भारत के बंटवारे के समय देश में लाखो शरणार्थी आए. सबको भारत की नागरिकता मिली. लेकिन जम्मू-कश्मीर में ऐसा न हो सका. यहां बंटवारे के समय आए लोगों की आज की पीढ़ी भी शरणार्थी की हैसियत में ही है. इन्हें किसी किस्म के मौलिक अधिकार हासिल नहीं हैं. आजादी के समय अकेले जम्मू में छह हजार से ज्यादा हिंदू परिवार आकर बसे. इनमें अधिकतर दलित थे. इन्हें आज तक शरणार्थी ही माना जाता है. जम्मू-कश्मीर की हिंदू विरोधी बहुमत ने कश्मीर में आने वाले मुसलमानों को फरजी कागजों के जरिये यहां का नागरिक बना लिया.
मानवाधिकारों का हनन करता है 35 ए
अपने ही देश में भारतीयों को शरणार्थी बना देने वाला ये अवैध कानून मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है. 1944 के बाद आए किसी भी शख्स को यहां वोट देने तक का अधिकार नहीं है. जमीन खरीदने पर तो रोक है ही, सरकारी नौकरी तक इनके परिवार को नहीं मिल सकती. राज्य की किसी कल्याणकारी योजना का ये हिस्सा नहीं बन सकते. यहां तक कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली से मिलने वाले अनाज तक पर इनका हक नहीं है. केंद्र सरकार की भी कोई योजना इनके लिए लागू नहीं होती.
सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल
सुप्रीम कोर्ट के सामने सिर्फ इसकी संवैधानिकता का ही सवाल नहीं है. इसकी सुनवाई में पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के मूल अधिकारों और मानवाधिकारों का सवाल भी शामिल है. साथ ही लाखों परिवारों के भविष्य का फैसला भी इसी याचिका के तहत होना है. यह पहला मौका है, जब संसद या सुप्रीम कोर्ट में 35 ए की संवैधानिकता का सवाल परीक्षण के लिए सामने आया है. उम्मीद यही की जा सकती है कि कम से कम संविधान की खातिर ही, सुप्रीम कोर्ट इस मामले का निपटारा जल्द से जल्द करेगा.
 
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)