आखिर क्यों बौखलाई हैं ममता !
   दिनांक 04-फ़रवरी-2019
- सुमन कुमार                          
ममता बनर्जी की सरपरस्तीे में चलने वाली दो कंपनियों ने जनता के 20 हजार करोड़ से अधिक रुपए हड़प लिए। तब भी वह चैन से चित्रकारी करती रहीं और उन चित्रों को घोटालेबाज करोड़ों में खरीदते रहे। अब जब जांच आगे बढ़ी और ममता को कार्रवाई का डर हुआ तो वह दागी पुलिस अधिकारी को बचाने के लिए धरने पर बैठ रही हैं
दागी पुलिस अधिकारी को बचाने के लिए धरने पर बैठी ममता
ममता बनर्जी फ‍िर से धरना प्रदर्शन की राजनीति में लौट रही हैं। 2009 में केंद्रीय रेल मंत्री बनने के बाद से इस तरह की राजनीति उन्होंने नहीं की। जरूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि बंगाल में उनकी सत्ता निर्विवाद रूप से चल रही थी। उनके सामने खड़ा होने की किसी की हिम्मत नहीं थी। शायद इसलिए उनकी पार्टी की सरपरस्तीे में चलने वाली दो कंपनियों ने जब जनता के 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक हड़प लिए तब भी वो चैन से चित्रकारी करती रहीं और उन चित्रों को घोटालेबाज करोड़ों में खरीदते रहे। मगर अब ममता बौखला गई हैं।
भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल के उन इलाकों में अपनी पैठ बना ली है जहां पहले तृणमूल कांग्रेस का अच्छा खासा वजूद हुआ करता था। अब पश्चिमी बंगाल के किसी भी इलाके में भाजपा नेताओं की सभा हो, वहां भीड़ उमड़ रही है। ममता बनर्जी को अपनी सत्ता जाने का डर सता रहा है।
सीबीआई के पास सबूत हैं लेकिन ममता अपने खासमखास पुलिस अधिकारी को बचाने के लिए धरने पर बैठती हैं। दागी पुलिस अधिकारी उनके साथ धरने पर बैठे हैं। यह चौंकाने वाली बात है। दरअसल जैसे—जैसे पश्चिमी बंगाल में भाजपा की स्थिति मजबूत हो रही है ममता बनर्जी को भय है कि उनके शासनकाल में हुए घोटालों में उन पर भी कार्रवाई होगी। यह भी संभव है कि साक्ष्य मिलने पर उन्हें जेल जाना पड़ेगा ।
बंगाल में वाम मोर्चा सरकार को हटाकर ममता बनर्जी को 2011 में सत्ता सौंपने वाली जनता ने तब खुद को ठगा महसूस किया जब ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की छत्रछाया में बंगाल हाल के दिनों में जनता के खरबों रुपये हड़पने का अड्डा बन गया।
ममता सरकार के शुरुआती दो सालों में ही पहले सारदा चिटफंड घोटाला और उसके बाद रोजवैली चिटफंड घोटाला ममता बनर्जी की पार्टी के नेताओं की सरपरस्तीे में हुआ। इन दोनों घोटालों में कुल मिलाकर करीब 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक का चूना प्रदेश की गरीब जनता को लगा।
कोलकाता में राज्य सरकार के सचिवालय रायटर्स बिल्डिंग में तैनात एक अधिकारी के अनुसार ममता बनर्जी के डर की असली वजह इन दोनों घोटालों में ही छिपी है क्योंकि इनमें उनकी पार्टी के लोग सीधे जुड़े हैं। घोटाले में खुद ममता पर भी सवालिया निशान हैं क्योंंकि घोटालेबाजों ने उनके बनाए औसत दर्जे के चित्रों को करोड़ों रुपये में खरीदा गया।
सारदा घोटाले को अंजाम देने वाले सारदा समूह के चेयरमैन सुदीप्तो सेन ने सीबीआई को लिखी अपनी चिट्ठी में साफ-साफ कहा है कि इस घोटाले में तृणमूल के सांसदों कुणाल घोष और श्रींजय बोस सीधे-सीधे शामिल थे। घोष को हर महीने सारदा समूह से 16 लाख रुपये बतौर वेतन मिलते थे जबकि बोस समूह का पूरा मीडिया संचालन संभालते थे। आरोप है कि सेन ने ममता को भी परोक्ष रूप से लाभ पहुंचाने के लिए उनके औसत दर्ज के चित्रों को एक करोड़ 86 लाख रुपये में खरीदा था।
इन चित्रों की खरीद के बाद ममता बनर्जी ने सरकारी आदेश निकलवा दिया कि बंगाल के सभी पुस्तकालयों में सारदा समूह के अखबार ही खरीदे और प्रदर्शित किए जाएंगे। यही नहीं, ममता सरकार के परिवहन मंत्री मदन मित्रा सारदा समूह के कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष थे और बंगाल की जनता को इस समूह में निवेश करने के लिए प्रेरित करते थे।
 
ममता बनर्जी की सरकार बनने के बाद 2013 में समूह ने निवेशकों का पैसा लौटाने में आनाकानी शुरू की तब इस घोटाले का पर्दाफाश हुआ और पता चला कि तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने सुदीप्तो सेन से करोड़ों रुपये की रिश्वत और अन्य कई लाभ लिए हैं। खुद सेन ने जो चिट्ठी सीबीआई को लिखी थी उसमें उपरोक्त नेताओं के अलावा ममता सरकार के कपड़ा मंत्री श्याम पद मुखर्जी का नाम लिया जिनके सह स्वामित्व वाली कंपनी लैंडमार्क सीमेंट को ऊंची कीमत पर खरीदने के लिए सारदा समूह को मजबूर किया गया जबकि ये एक घाटे वाली कंपनी थी।
जाहिर है कि अपने इतने करीब‍ियों की संलिप्तता और चित्रों के जरिए खुद अपनी संलिप्तता को नकारना ममता बनर्जी के लिए संभव नहीं था इसलिए उन्होंंने जांच से बचने के लिए अपने चहेते अधिकारियों को इसकी जांच का जिम्मा सौंपा।
2013 में जब घोटाले का पर्दाफाश हुआ तो पहले तो उन्होंने न्यायिक जांच की घोषणा की मगर जब लगा कि न्यायिक जांच में बच पाना मुश्किल होगा तो उन्होंने कोलकाता के वर्तमान पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार की अगुआई में विशेष जांच दल बना दिया। जैसी की उम्मीद थी इस जांच दल ने सत्ताधारी दल के किसी नेता को छुआ तक नहीं। इस टीम पर आरोप है कि इसने दोषियों को पकड़ने की बजाय महत्वपूर्ण सबूतों को नष्ट करने में ज्यादा दिलचस्पी ली।
ऐसे में घोटाले के पीड़‍ितों ने सुप्रीम कोर्ट से न्याय की गुहार लगाई जिसने सीबीआई तथा अन्य केंद्रीय एजेंसियों जैसे कि ईडी और आयकर विभाग को मामले की जांच करने को कहा। सीबीआई की जांच 2014 में शुरू हुई और इसके बाद तृणमूल के कई नेताओं को जांच के दौरान गिरफ्तार किया गया जिनमें मदन मित्रा भी शामिल हैं। जांच की आंच धीरे-धीरे ममता बनर्जी की ओर बढ़ रही है।
मगर पुख्ता सबूतों के लिए सीबीआई को पुलिस के विशेष जांच दल के अधिकारियों से पूछताछ करने की जरूरत है। कोलकाता में सीबीआई के संयुक्त निदेशक पंकज श्रीवास्तव कहते हैं, ‘विशेष जांच दल ने सीबीआई टीम को महत्वपूर्ण सबूत नहीं सौंपे, यहां तक कि सबूतों को नष्ट कर दिया गया।’ इन्हीं जरूरी सबूतों के बारे में जानने के लिए सीबीआई राजीव कुमार से पूछताछ करना चाहती है। जाहिर है कि जिन सबूतों में राज्य सरकार की जान अटकी हो उसे ममता बनर्जी सीबीआई के हवाले कैसे कर सकती हैं। इसलिए आधी रात को ही विशेष जांच दल के मुखिया को बचाने के लिए वो धरने पर बैठ गईं।