इस्लाम के नाम पर क्यों चुप हो जाते हैं कथित नारीवादी
   दिनांक 05-फ़रवरी-2019
यह हैशटैग किसी कुरीति के विरोध में नहीं था और न ही यह कोई ऐसा हैशटैग था जो स्त्रियों के हित के किसी मुद्दे से जुड़ा हुआ था। यह हैश टैग था हिजाब के समर्थन के लिए। इस हैश टैग को स्वयं को कथित नारीवादी चला रहे थे।
दरअसल इस्लाम के साथ एक समस्या यह है कि वह मानने को यह तैयार नहीं हैं कि बुर्का, या हिजाब या तीन तलाक कुरीतियां हैं। स्त्रियों के प्रति कुरीतियों का जश्न मनाने की परम्परा इनमें अजीब है, और यह और भी विस्मित करने वाला तथ्य है कि कुछ लोग चाहते हैं कि उनकी इन कुरीतियों का पालन बाकी भी लोग करें।
हाल ही में इस्लाम की कुरीतियों को हटाने के लिए महिलाएं आगे आई हैं। और जहां भारत में तीन तलाक के खिलाफ मुस्लिम महिलाएं लामबंद हो रही हैं वहीं विश्व में हिजाब पर बहस हो रही है। इसी क्रम में ईरान की महिलाएं आगे बढ़कर जबरदस्ती थोपे हुए इस नियम के खिलाफ आवाज़ उठा रही हैं। यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि आखिर हिजाब पहनने की अनिवार्यता पर स्त्री क्रांतिकारी मौन क्यों है? और इस विषय में सबसे शुतुरमुर्गी रवैया भारत में कथित स्त्री वादियों का है।
वह न तो मुस्लिम महिलाओं से जुड़े हुए मुद्दों पर बोलती हैं और न ही इस विषय पर कुछ पढ़ना पसंद करती हैं। बल्कि कई बार तो वह ऐसे ऐसे तर्क कुरीतियों के पक्ष में लाती हैं कि कट्टर से कट्टर मौलाना भी शर्मा जाए।
 
 इस तरह का कैंपेन चलाकर हिंदुओं की भावनाओं से किया जा रहा खिलवाड़
1 फरवरी को पूरे विश्व में ‘वर्ल्ड हिजाब डे मनाया गया। इस दिन पूरे विश्व में इस बात पर चर्चा की गयी कि आखिर हिजाब के क्या फायदे हैं, हिजाब को महिलाओं की पहचान से जोड़कर देखा गया और हिजाब के बहाने मुस्लिम स्त्रीवाद का विमर्श स्थापित करने का प्रयास किया गया।
भारत में सोशल मीडिया पर स्त्रीवाद का झंडा लहराने वाले भी वर्ल्ड हिजाब डे का समर्थन करते हुए देखे गए। हर बात पर हिन्दू धर्म पर सवाल उठाने वाले, हर बात पर कथित हिन्दू पितृसत्ता पर हजारों आंसू रोने वाली रुदालियां इस हिजाब दिवस का जश्न मनाते हुए दिखे।
इनमें फेमिज्म इन इंडिया (feminisminindia.com) प्रमुख है। इस वेबसाइट पर एक नहीं बल्कि कई लेख मिल जाएंगे जो भारत की आत्मा और हिन्दू समाज दोनों को ही तोड़ने के लिए पर्याप्त है। परन्तु एक भी लेख ऐसा नहीं मिलेगा जो इस्लामी कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाए। इतना ही नहीं अपने लेख में इस वेबसाईट ने अपनी सारी हदें पार करते हुए हिजाब दिवस को मनाते हुए असमानता का सम्मान करने का अवसर बना डाला!
इस लेख में बहुत ही बेशर्मी से हिजाब की तरफदारी की गई है. इसका शीर्षक ही अपने आप में स्त्री विरोधी है. यह कहता है कि आइये हिजाब दिवस का उत्सव मनाएं, जो अनजान हैं उससे नफरत न करें. (Celebrating World Hijab Day: Don’t Hate What’s Strange )
इस लेख में बहुत ही चालाकी से यह नैरेटिव स्थापित करने का प्रयास किया गया है कि हिजाब को केवल इसीलिए नहीं स्वीकारा जा रहा क्योंकि लोग इससे अपरिचित हैं। जबकि यह बात पूरी तरह से सत्य है कि हिजाब न केवल एक सामाजिक बुराई है बल्कि आदत के नाम पर थोपी गयी मानसिक गुलामी भी है।
इसके साथ यह प्रश्न भी विचारणीय है कि आखिर भारत में स्त्रीवाद इस्लाम के सामने दम क्यों तोड़ देता है? सारे नारीवादी केवल हिन्दू धर्म के खिलाफ क्यों बोलते हैं ? बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे बोलने वाले,  मुसलमानों और इस्लाम की बात आने पर गुलामी की बातें क्यों करने लगते हैं?
क्या स्त्रीवाद की नई परिभाषा शायद इस्लाम के नाम पर चादर ओढ़ना ही है क्या? यदि नहीं तो वर्ल्ड हिजाब डे मनाने का दुस्साहस और स्त्रियों के जले पर नमक छिड़कने का अधिकार ऐसे कथित आन्दोलनकारियों को किसने दिया है? बस एक बेवकूफी भरा कदम उन हज़ारों स्त्रियों के बरसों के संघर्ष की ज़मीन दरकाने के लिए पर्याप्त है, जो इस अनिवार्यता के खिलाफ आवाज़ उठा रही हैं, जिनका मुंह बंद करने के लिए तेज़ाब के हमले हो रहे हैं और जो वाकई में स्वतंत्र हवा में सांस लेना चाहती हैं।