सियासी अखाड़े के शुरुआती रुझान में सपा-बसपा गठबंधन की खिसकती बुनियाद
   दिनांक 13-मार्च-2019
चुनाव के नतीजे तो 23 मई को सामने आयेंगे पर चुनावी अखाड़े के शुरुआती रुझान मिलने शुरू हो गये हैं। कुछ सर्वे एजेंसियों ने अंकगणित के आधार पर अपने अनुमान मीडिया में जारी किये हैं। पर जमीनी हकीकत इस अंकगणित के विपरीत जाती दिखायी देने लगी है। खास तौर पर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन को बहुत प्रभावी मानने वालों का आंकड़ा व्यवहारिक धरातल पर छितराता हुआ नजर आ रहा है। कांग्रेस और शिवपाल यादव की पार्टी इस गठबंधन में शामिल न होने से इसकी बुनियाद दरकने लगी है।
 
दिल्ली और नोएडा में बैठकर जनता के मूड का अनुमान लगाने वाले जो दिग्गज पत्रकार जातीय आंकड़ों और पुराने वोटबैंक की अंकगणित के आधार पर उत्तर प्रदेश की सीटों का अनुमान लगा रहे हैं वो पारंपरिक गणित मैदान में इस बार नदारद है। ढाई दशक पहले उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था। उस समय जाति विशेष पर आधारित इन पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं में वैसी खलिस और दूरी नहीं थी, जैसी आज है। जून 1995 में लखनऊ में हुए “गेस्टहाउस कांड” के बाद उत्तर प्रदेश का समाजशास्त्र काफी बदलता चला गया। सूबे में अधिकांश समय तक सपा और बसपा में किसी एक की सरकार रही तो दूसरा मुख्य विपक्षी दल रहा। इस नाते दोनों ही पार्टियों की शहरों में तो कम पर ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में नेताओं और कार्यकर्ताओं की प्रतिद्वंदिता लगातार बढ़ती गयी है। ये प्रतिद्वंदिता अनेक स्थानों पर शत्रुता का रूप भी लेती चली गयी। भारतीय जनता पार्टी जहां एक ओर सोशल इंजीनियरिंग के जरिए अपनी पैठ बनाने में कामयाब रही तो वहीं समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के नारों और चरित्र में भी काफी बदलाव आया। “तिलक, तराजू और तलवार,, इनको मारो जूते चार” जैसे नारे लगाने वाली बसपा ने ‘सर्व समाज’ का नारा देते हुए अपनी छवि को बदलने की लगातार कोशिश की। उसी तरह से समाजवादी पार्टी में जैसे-जैसे अखिलेश यादव का प्रभाव बढ़ा, उन्होंने सपा को अपराधियों वाली पार्टी की छवि से मुक्त कराने की कोशिश की। पहले इस पार्टी की छवि सबसे ज्यादा अपराधी तत्वों को शरण देने वाले दल के रूप में थी। इसी कारण सपा की मुख्य प्रतिद्वंदी रही बहुजन समाज पार्टी का वो नारा तीन-चार चुनावों में सर्वाधिक लोकप्रिय होता चला गया जिसमें कहा गया कि “चढ़ गुंडों की छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर”। अखिलेश यादव जब मुख्यमंत्री बने थे, उस बार उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक सजातीय बाहुबली को टिकट देने का कड़ा विरोध किया था। इस मुद्दे को मीडिया ने काफी उछाला और अखिलेश यादव की छवि अपराधियों को संरक्षण न देने वाले युवा की बन गयी। इसका बहुत फायदा भी चुनाव में पार्टी को हुआ। खासे बहुमत के साथ अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बन गये। पर पांच साल तक अपनी सरकार के दौरान पार्टी की इस बदलती छवि के अनुरूप शासन प्रशासन को दिशा न दे पाने के कारण सपा की छवि फिर से पहले जैसी ही होती चली गयी। अपराधियों का महत्व और दखल शासन-प्रशासन में वैसा ही रहा जैसा पहले मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में रहा करता था। कुछ मामलों में तो अखिलेश यादव का शासन उससे भी ज्यादा अराजकता के लिए जाना गया। रामवृक्ष यादव ने अपने गुंडों के साथ जिस तरह से प्रशासनिक अमले पर जानलेवा हमला किया, उसे सरकार से संरक्षण प्राप्त बाहुबली की अराजकता का ही विशेष नमूना माना गया।
अखिलेश यादव ने पिछला चुनाव आने पर पहले के अंदाज में ही फिर एक बार अपनी छवि चमकाने की कोशिश की, पर “काठ की हांडी दोबारा कहां चढ़ पाती है ?” पिछले चुनाव में छवि चमकाने के लिए उन्होंने मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद जैसे बाहुबलियों को टिकट न देने की घोषणा की। इस मुद्दे पर उनका अपने पिता मुलायम सिंह यादव से काफी मतभेद भी रहा। ये मतभेद बाद में बढ़ता गया। चाचा शिवपाल यादव भी मतभेद के कारण पार्टी से अलग हो गये।
उधर, अखिलेश यादव ने भले ही मुख्तार अंसारी {और उसके भाई} जैसे बाहुबली को टिकट नहीं दिया पर मायावती की पार्टी ने ऐसे बाहुबलियों का स्वागत किया। ऐसा करने पर बसपा की छवि खराब हुई। इस छवि के नतीजे चुनाव परिणामों में भी दिखाई पड़े। लोकसभा चुनाव में वो खाता तक नहीं खोल पाई। विधानसभा चुनाव में भी बसपा को ऐतिहासिक पराजय का मुंह देखना पड़ा।
कुछ चुनाव विश्लेषक पिछले चुनावों में सपा-बसपा को मिले वोट परसेंटज को सीधा-सीधा जोड़कर अंकगणित के हिसाब से गठबंधन को मजबूत बता रहे हैं। पर जमीनी हकीकत को देखने के लिए किसी भी एक चुनाव क्षेत्र पर नजर डालकर देखना चाहिए। उदाहरण के लिए गाजीपुर लोकसभा क्षेत्र की गणित को समझ सकते हैं। यहां से पिछली बार मनोज सिन्हा भाजपा के टिकट पर चुने गये थे, जो वर्तमान सरकार में रेल राज्यमंत्री हैं। इस बार भी भाजपा से मनोज सिन्हा ही मैदान में हैं। गठबंधन में ये सीट बसपा के हिस्से में आई है। बसपा यहां से उसी बाहुबली मुख्तार अंसारी के बड़े भाई अफजाल अंसारी को मैदान में उतार रही है। अफजाल और मुख्तार के मुद्दे पर ही पिछली बार मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के बीच इतना विवाद हुआ था। यहां से लोगों को उम्मीद है कि शिवपाल सिंह यादव यदि कोई अच्छा प्रत्याशी उतारते हैं तो करीब तीस से चालीस फीसदी तक मतदाताओं का झुकाव उसकी ओर हो जाएगा। यदि शिवपाल यादव ने कोई दमदार उम्मीदवार नहीं उतारा तब ऐसी स्थिति में करीब दो तिहाई तक मतदाताओं का झुकाव भाजपा की ओर घूम जाएगा। जानकारों का मानना है कि सिर्फ इस गणित से ही आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि जीत का पलड़ा किस तरह से भाजपा की ओर झुका हुआ है। कुछ ऐसी ही या इससे मिलती जुलती तस्वीर उत्तर प्रदेश के अनेक संसदीय क्षेत्र में उभरती हुई दिखने लगी है।
कुछ नये महत्वपूर्ण चुनावी परिवर्तन पिछले एक महीने के भीतर बहुत तेजी से उभरकर तमाम नये मतदाताओं को भाजपा से जोड़ने में कामयाब होते दिखने लगे हैं। पाकिस्तान में घुसकर आतंकियों के अड्डों पर की गयी एअर स्ट्राइक, अपने पुराने मिक-21 से उनके एफ-16 को मार गिराना, फिर दबाव बनाकर अपने पायलट अभिनंदन को तीन दिन के भीरत छुड़ा लेना भारत की ऐतिहासिक मजबूती मानी जा रही है। इसे सेना के पराक्रम के साथ ही वर्तमान नेतृत्व की सफल रणनीति का भी प्रत्यक्ष नमूना मानने वाला आम मतदाता हर बिरादारी और हर समाज का है। दूसरा, कुंभ मेले में सफाई कर्मचारियों का प्रधानमंत्री द्वारा पैर धोना ऐसा कारनामा रहा जिसने जन-जन का मन जीत लिया है। निम्न वर्ग के गरीब मतदाता मोदी के इस बड़प्पन से लहालोट हुए जा रहे हैं। जहां भी इसकी चर्चा चलती है मोदी के इस प्रेम और बड़प्पन का जिक्र आम आदमी का दिल जीत ले रहा है।